Shlok Gyan

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Shlok-gyan--62

प्रियवाक्यप्रदानेन  सर्वे  तुष्यन्ति  जन्तवः  |

तस्मात्तदेव  वक्तव्यं  वचने  का  दरिद्रता   ||

भावार्थ :-

यदि अन्य व्यक्तियों से  प्रिय लगने वाली भाषा में बातचीत की जाये तो सभी को सन्तोष  प्राप्त होता है | इस लिये सदैव मधुर भाषा का व्यवहार करना चाहिये और ऐसा करने  में अपनी दरिद्रता क्यों प्रदर्शित की जाय ?


Shlok-gyan--63

व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं।

आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥

भावार्थ :-

व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं॥

Shlok-gyan--64

आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति।।

भावार्थ :-

मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है, मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र परिश्रम है जो हमेशा उसके साथ रहता है इसलिए वह दुःखी नहीं रहता।


Shlok-gyan--65

क्षमावशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते।

शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः।।

भावार्थ :-

संसार में क्षमा (सबसे बड़ा) वशीकरण है, क्षमा से सर्व कार्य सिद्ध हो सकता है | जिस व्यक्ति के पास शांति रूपी तलवार है दुष्ट उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता है |

Shlok-gyan--66

सरस्वतीं च तां नौमि वागधिष्ठातृदेवताम्।

देवत्वं प्रतिपद्यन्ते यदनुग्रहतो जना:॥

भावार्थ :-

वाणी की अधिष्ठात्री उन देवी सरस्वती को मैं प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा से मनुष्य देवता बन जाता है।


Shlok-gyan--72

मातृदेवीम नमस्तुभ्यं मम जन्मदात्रिम त्वम् नमो नमः।

बाल्यकाले मां पालन कृत्वा मातृकाभ्यो त्वम् नमाम्यहम॥

भावार्थ :-

मैं अपनी माँ को प्रणाम करता हूँ जिसने मुझे जन्म दिया; मैं अपनी अन्य माताओं को भी प्रणाम करता हूं, जिसने मुझे एक अच्छा इंसान बनाने के लिए अपने कार्यों और जीवन में ज्ञान और बुद्धि को जोड़ा।

Shlok-gyan--25

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

भावार्थ :-

जिसने अपनी बुद्धि को भगवान् के साथ युक्त कर दिया है वह इस द्वन्द्वमय लोक में ही शुभ कर्म और अशुभ कर्म इन दोनों का परित्याग कर देता है; इसलिए समत्व बुद्धिरूप योग के लिए प्रयत्न कर; समत्व बुद्धि रूप योग ही कर्म का कौशल है।


Shlok-gyan--68

प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः।

किं नु मे पशुभिस्तुल्यं किं नु सत्पुरुषैरिति॥

भावार्थ :-

मनुष्य को चाहिये कि वह सदैव अपने चरित्र का निरीक्षण करता रहे। यह ध्यान बनाये रखे कि वह जो विचार कार्य और व्यवहार कर रहा है वह मानवीय हैं या पशुओं जैसा ?

Shlok-gyan--26

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।

न हि कल्याणकृत्कश्चिद् दुर्गतिं तात गच्छति॥

भावार्थ :-

हे पृथापुत्र अर्जुन ! उसका न इस लोक में और न परलोक में ही विनाश होता है। क्योंकि हे प्रिय ! कल्याणकारी कर्म करने वाला (योग पथ में चलने वाला) कोई भी मनुष्य दुर्गति को नहीं प्राप्त होता।


Shlok-gyan--27

यस्मिन् देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च बान्धवाः।

न च विद्यागमोऽप्यस्ति वासस्तत्र न कारयेत् ॥

भावार्थ :-

जिस देश में सम्मान न हो, जहाँ कोई आजीविका न मिले , जहाँ अपना कोई भाई-बन्धु न रहता हो और जहाँ विद्या-अध्ययन सम्भव न हो, ऐसे स्थान पर नहीं रहना चाहिए ।