सुवेंदु अधिकारी

सुवेंदु अधिकारी जी के बारे मेंं

सुवेंदु अधिकारी

सुवेंदु अधिकारी

(तमलुक के बाघ' या 'नंदीग्राम के योद्धा' )

जन्म तिथि 15 December 1970
राशि धनु राशि (Sagittarius)
जन्म स्थान कर्कुली, पूर्वी मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
निवास स्थान पूर्वी मेदिनीपुर, पश्चिम बंगाल
पिता शिशिर कुमार अधिकारी (पूर्व केंद्रीय मंत्री)
माता गायत्री अधिकारी
भाई दिब्येंदु अधिकारी, सौमेंदु अधिकारी
वैवाहिक हि. अविवाहित
शिक्षा कला स्नातक (बी.ए. - Bachelor of Arts)
कॉलेज पी.के. कॉलेज, कांथी (P.K. College, Contai)
विश्वविद्यालय विद्यासागर विश्वविद्यालय (Vidyasagar University)
राष्ट्रीयता भारतीय
नेट वर्थ लगभग ₹85.87 लाख

सुवेंदु अधिकारी का जीवन परिचय––

सुवेंदु अधिकारी भारतीय राजनीति का एक ऐसा नाम हैं जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति में गहरा प्रभाव छोड़ा है। वे अपने आक्रामक राजनीतिक अंदाज, जनसंपर्क क्षमता, संगठन कौशल और नंदीग्राम आंदोलन में भूमिका के कारण राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुए। उन्होंने तृणमूल कांग्रेस (TMC) से अपने राजनीतिक जीवन को नई ऊँचाइयाँ दीं और बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होकर पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई।


वे पूर्व लोकसभा सांसद, पश्चिम बंगाल सरकार के पूर्व मंत्री और बाद में विपक्ष के प्रमुख चेहरे बने। सुवेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर संघर्ष, रणनीति, जनआंदोलन और सत्ता परिवर्तन की कहानी माना जाता है।


साल 2026 का मई महीना भारतीय राजनीति के इतिहास में उस वक्त दर्ज हो गया जब पश्चिम बंगाल में 15 साल का ममता बनर्जी का शासन ढह गया। इस ऐतिहासिक पल के नायक थे - सुवेंदु अधिकारी। जो कभी ममता बनर्जी के सबसे करीबी सहयोगी और उनके आइकॉनिक 'नंदीग्राम आंदोलन' के योद्धा हुआ करते थे, वही सुवेंदु अधिकारी 2026 में भवानीपुर सीट से ममता को 15,000 से अधिक वोटों से हराकर उनके अभेद्य किले में सेंध लगा दी ।


उनकी यह जीत सिर्फ एक सीट की नहीं, बल्कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (TMC) के अंत की शुरुआत थी। सुवेंदु अधिकारी का सियासी सफर संघर्ष, वफादारी, विश्वासघात और अंततः प्रतिशोध की कहानी है। यह एक ऐसे "छात्र नेता" की कहानी है जिसने 55 वर्ष की आयु तक कुंवारा रहकर पूरी तरह से राजनीति को समर्पित कर दिया और अंततः बंगाल के 'दादा' की कुर्सी के प्रबल दावेदार के रूप में उभरा ।


प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक विरासत (बचपन से 1995)––

1.1 जन्म और परिवार (जन्म: 15 दिसंबर 1970)––

भारतीय राजनीति के इस 'दिग्गज' का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के कांथी (Contai) क्षेत्र के कर्कुली (Karkuli) गाँव में हुआ था । उनके पिता का नाम शिशिर कुमार अधिकारी और माता का नाम गायत्री अधिकारी है ।


अगर बंगाल की राजनीति में किसी परिवार को "राजनीतिक राजवंश" का दर्जा दिया जाता है, तो वह है अधिकारी परिवार। सुवेंदु एक उत्कल ब्राह्मण (Utkal Brahmin) परिवार से आते हैं, जो इलाके में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और जमीनी पकड़ के लिए जाना जाता है ।


1.2 पिता का प्रभाव: शिशिर अधिकारी––

सुवेंदु के पिता शिशिर अधिकारी पश्चिम बंगाल की सियासत के बड़े नाम हैं। वे कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री रहे । शिशिर अधिकारी का अपने इलाके में ऐसा दबदबा था जिसे देखते हुए उन्हें मेदिनीपुर का 'बेताज बादशाह' कहा जाता था। एक ऐसे राजनीतिक माहौल में जहां वाम मोर्चा (CPI(M)) का सिक्का चलता था, शिशिर अधिकारी कांग्रेस की नाव खे रहे थे। बचपन से ही सुवेंदु ने इस संघर्ष को करीब से देखा। घर के माहौल में राजनीतिक रणनीतियों की बातें होती थीं, जिसने बाद में सुवेंदु के राजनीतिक व्यवहार की नींव रखी।


1.3 सहोदर: दिब्येंदु और सौमेंदु का सियासी दबदबा––

सुवेंदु अकेले राजनेता नहीं हैं; उनका पूरा परिवार ही राजनीति में सक्रिय है। उनके छोटे भाई दिब्येंदु अधिकारी भी कई बार सांसद और विधायक रह चुके हैं । सबसे छोटे भाई सौमेंदु अधिकारी भी राजनीति में कदम रख चुके हैं । इस परिवार की ताकत इतनी है कि पूर्वी मेदिनीपुर में आज भी अधिकारी परिवार के अलावा किसी और की बात चलना मुश्किल है। सुवेंदु इस परिवार के वो चेहरे हैं जिन्होंने दमदार पारिवारिक विरासत को न सिर्फ संभाला, बल्कि उसे नई ऊंचाईयां दीं।


1.4 शिक्षा और संस्कार

राजनीति में कूदने से पहले सुवेंदु ने अपनी पढ़ाई पर ध्यान दिया। उन्होंने रवींद्र भारती विश्वविद्यालय (Rabindra Bharati University) से मास्टर ऑफ आर्ट्स (M.A.) की डिग्री हासिल की, जो उन्होंने 2011 में पूरी की । उनकी यह डिग्री दर्शाती है कि वे केवल एक बागी नेता नहीं हैं, बल्कि एक शिक्षित दिमाग भी रखते हैं, जो बंगाल के साहित्य और संस्कृति को समझता है।


अविवाहित रहने का फैसला:

सुवेंदु अधिकारी की सबसे चर्चित व्यक्तिगत बात यह है कि उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। जब भी उनसे इसका कारण पूछा गया, उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका जीवन "जनता की सेवा" के लिए है । 1987 में छात्र राजनीति में आने के बाद से ही वे इतने समर्पित हो गए कि परिवार बसाने का विचार ही पीछे छूट गया। वे बंगाल के तीन महान स्वतंत्रता सेनानियों - सतीश सामंत, सुशील धारा और अजय मुखर्जी - को अपना आदर्श मानते हैं, जो आजीवन अविवाहित रहे। सुवेंदु का मानना है कि शादी न होने का सबसे बड़ा "पॉजिटिव" पहलू यह है कि उनके पास काम करने के लिए 24 घंटे का समय है और उन पर कोई पारिवारिक दबाव नहीं है ।


अध्याय 2: राजनीति में पदार्पण (1989-1998)

2.1 छात्र राजनीति से शुरुआत

सुवेंदु अधिकारी का नाम सुनते ही जेहन में एक मजबूत, मुखर और जमीनी नेता की छवि उभरती है, लेकिन उनकी शुरुआत बेहद छोटे स्तर से हुई। 1989 के आसपास, जब बंगाल में वामपंथी (Left) का लाल झंडा बुलंद था, सुवेंदु ने कांग्रेस के छात्र संगठन 'छात्र परिषद' से अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की ।


कोलकाता के ग्लैमर से दूर, मेदिनीपुर की गलियों और कॉलेजों में एक युवा के रूप में सुवेंदु ने कम्युनिस्ट विचारधारा के खिलाफ मोर्चा खोला। उस समय बंगाल में कम्युनिस्टों के खिलाफ आवाज उठाना बेहद जोखिम भरा था, लेकिन सुवेंदु में कहीं न कहीं से संघर्ष की जिद थी। उन्होंने छात्र राजनीति में ही अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी थी।


2.2 कांग्रेस से पहला चुनावी अनुभव (1995)

परिवार की परंपरा का पालन करते हुए, सुवेंदु ने 1995 में कांथी नगर पालिका (Kanthi Municipality) के चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर अपना पहला चुनाव लड़ा । हालांकि उस समय वाममोर्चा का बोलबाला था, लेकिन सुवेंदु ने अपनी जमीनी पकड़ और पिता के नाम के दम पर ये चुनाव जीतकर पार्षद (Councillor) का दर्जा हासिल कर लिया । यह उनके लिए एक बड़ी जीत थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि वे केवल परिवार के सहारे नहीं चल रहे हैं, बल्कि खुद की भी पहचान बनाने की क्षमता रखते हैं। पार्षद के तौर पर उन्होंने शहर के बुनियादी ढांचे और विकास कार्यों में विशेष रुचि ली।


अध्याय 3: तृणमूल कांग्रेस (TMC) के साथ गठबंधन (1998-2006)

3.1 मां-मাটি-মানুষ (माँ-माटी-मानुष) का बीज

साल 1998 भारतीय राजनीति के लिए अहम साल था। ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC या TMC) की स्थापना की। इसे बंगाल में वामपंथी अत्याचार के खिलाफ एक विकल्प के रूप में पेश किया गया। इसी मुश्किल घड़ी में सुवेंदु और उनके पिता शिशिर अधिकारी ने कांग्रेस छोड़कर नवगठित TMC का दामन थाम लिया ।


यह फैसला सुवेंदु के करियर का टर्निंग पॉइंट था। ममता बनर्जी एक तरफ थीं, जिनके पास जबरदस्त जनाकर्षण था, लेकिन जमीनी स्तर पर संगठन की कमी थी। वहीं, अधिकारी परिवार के पास मेदिनीपुर में गहरी जड़ें और अनुभव था। यह गठबंधन जादुई साबित हुआ। ममता को मेदिनीपुर जैसे वामपंथी गढ़ में प्रवेश मिल गया, और सुवेंदु को राज्य स्तरीय नेता बनने का मंच मिल गया।


3.2 पहला विधानसभा चुनाव (2006)

TMC में शामिल होने के बाद सुवेंदु ने अपनी पकड़ मजबूत करना शुरू कर दिया। उन्होंने कांथी दक्षिण विधानसभा सीट पर अपनी दावेदारी पेश की। साल 2006 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव हुए। हालांकि TMC को 2006 में जीत नहीं मिली, लेकिन सुवेंदु अधिकारी ने कांथी दक्षिण सीट से जीत हासिल की और विधायक (MLA) बन गए । यहीं से उनका विधायिकीय सफर शुरू हुआ। असेंबली में पहुंचकर सुवेंदु ने मुखरता से वामपंथी सरकार की नीतियों को घेरना शुरू कर दिया।


अध्याय 4: नंदीग्राम - वह आंदोलन जिसने सुवेंदु को बनाया (2007-2008)

सुवेंदु अधिकारी को असली पहचान मिली 2007 के नंदीग्राम आंदोलन से। यह सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक क्रांति थी जिसने पूरे पश्चिम बंगाल का माइंडसेट बदल दिया।


4.1 पृष्ठभूमि: चेन्नैपेट्रोल केमिकल हब का विरोध

बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने पूर्वी मेदिनीपुर के नंदीग्राम में भारी मात्रा में जमीन अधिग्रहण करके एक विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) बनाने का फैसला किया। यहाँ "सलिम ग्रुप" के साथ मिलकर एक विशाल रासायनिक (पेट्रोकेमिकल) हब बनाया जाना था । इसके लिए 14 गांवों के किसानों की उपजाऊ जमीन जबरन छीनी जा रही थी।


किसान सड़कों पर उतर आए, लेकिन उनके पास नेतृत्व नहीं था। तब ममता बनर्जी ने इस मुद्दे को हाथ में लिया। लेकिन असली योद्धा कौन था जो कोलकाता की एसी कुर्सी पर बैठने के बजाय नंदीग्राम के ट्रेंच में उतरा? वह थे सुवेंदु अधिकारी।


4.2 सुवेंदु की अहम भूमिका: 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी'

सुवेंदु अधिकारी ने नंदीग्राम में डेरा डाल दिया। उन्होंने 'भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी' (BUPC) बनाई और गांव-गांव जाकर किसानों को संगठित किया । वह उन किसानों के बीच सोए, उनके दुख दर्द को समझा और उन्हें समझाया कि भूमि उनके अस्तित्व के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। वामपंथी सरकार ने उन पर कई आरोप लगाए, यहाँ तक कि ये भी आरोप लगा कि वे माओवादियों को गोला-बारूद सप्लाई कर रहे हैं, लेकिन सुवेंदु इन आरोपों से बिल्कुल विचलित नहीं हुए ।


सबसे खूनी घटना घटी 14 मार्च 2007 को। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग की, जिसमें 14 लोग मारे गए और 70 से अधिक घायल हो गए । यह ठीक उसी दौरान हुआ जब सिंगूर में टाटा मोटर्स की नैनो कार फैक्ट्री के खिलाफ भी आंदोलन चल रहा था। ममता बनर्जी सिंगूर में थीं, और नंदीग्राम में सुवेंदु ने अकेले दम पर गोलियों का सामना किया ।


4.3 परिणाम: वामपंथ की नींव हिल गई

इन दो मोर्चों (सिंगूर और नंदीग्राम) पर हुए अत्याचारों ने 34 साल पुरानी वाम मोर्चा सरकार की नींव हिला कर रख दी। सुवेंदु अधिकारी उस "भूमि योद्धा" के रूप में उभरे, जिसने मुस्कराते हुए गोलियों का सामना किया। इस घटना ने टीएमसी और ममता बनर्जी को "माँ-माटी-मानुष" के नारे के साथ जनता के दिलों में बिठा दिया और सुवेंदु अधिकारी "ममता के दाहिने हाथ" बन गए ।


अध्याय 5: लोकसभा सांसद से कैबिनेट मंत्री तक (2009-2019)

5.1 लोकसभा में पहला कार्यकाल: तमलुक से जीत (2009)

2009 के लोकसभा चुनाव में, नंदीग्राम हीरो की सवारी अब दिल्ली की तरफ बढ़ी। सुवेंदु अधिकारी ने तमलुक (Tamluk) सीट से चुनाव लड़ा और बड़ी जीत दर्ज की। यह सीट पारंपरिक रूप से CPI(M) के मजबूत नेता लक्ष्मण सेठ का गढ़ हुआ करती थी । सुवेंदु ने लक्ष्मण सेठ को उन्हीं के गढ़ में हराकर मेदिनीपुर में तृणमूल के बोलबाले की नींव रखी। वे सांसद (MP) बने ।


5.2 दूसरा कार्यकाल (2014)

2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी की लहर के बीच, सुवेंदु अधिकारी ने तमलुक सीट को बरकरार रखते हुए दोबारा जीत हासिल की । दिल्ली में रहते हुए भी उनकी पैनी नजर बंगाल के ग्राउंड पर बनी रही।


5.3 विधानसभा वापसी और कैबिनेट मंत्री (2016)

साल 2016: बंगाल की सियासत में एक और मोड़। TMC ने फिर से सरकार बनाई। सुवेंदु अधिकारी ने अपनी लोकसभा की सीट से इस्तीफा दे दिया । उन्होंने 2016 का विधानसभा चुनाव नंदीग्राम सीट से लड़ा (जहां आंदोलन हुआ था) और जीत हासिल की। ममता बनर्जी ने उनके संघर्ष और संगठन कौशल का सम्मान करते हुए उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया।


पहले उन्हें परिवहन मंत्री (Transport Minister) का पोर्टफोलियो दिया गया । बाद में उनके पास सिंचाई, जल संसाधन, और प्रभारी मंत्री जैसे कई विभाग थे। बंगाल के मंत्री के रूप में उन्होंने सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदम उठाए। इस समय तक सुवेंदु अधिकारी TMC के भीतर 'दूसरे नंबर के नेता' माने जाने लगे थे। पार्टी के अंदर उनका कद इतना बढ़ गया था कि कई लोग उन्हें ममता बनर्जी के उत्तराधिकारी (Heir Apparent) की नजर से देखने लगे थे ।


अध्याय 6: टकराव, नाराजगी और तृणमूल से विदाई (2019-2020)

हर दोस्ती की तरह ममता और सुवेंदु की दोस्ती का दौर भी ज्यादा दिन नहीं चल सका।


6.1 सियासी दूरी बढ़ने के कारण

परिवारवाद का उभार: ममता बनर्जी अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में तेजी से आगे बढ़ा रही थीं । सुवेंदु, जो पार्टी में सबसे अनुभवी और जमीनी योद्धा थे, धीरे-धीरे उनके इस बढ़ते कद से असहज होने लगे।


सियासी टकराव: ऐसी भी चर्चा थी कि सुवेंदु अपनी जमीन पर बिना किसी रोक-टोक के काम करना चाहते थे, लेकिन कोलकाता की नेतृत्व तिकड़म (Mamata-Abhishek) उन पर लगाम लगा रही थी।


6.2 पार्टी छोड़ने की घोषणा (दिसंबर 2020)

तनाव चरम पर पहुंच गया। दिसंबर 2020 में सुवेंदु अधिकारी ने धमाकेदार तरीके से अपने सभी मंत्री पदों से इस्तीफा दे दिया और तृणमूल कांग्रेस से अलग हो गए । जिस पार्टी के लिए उन्होंने सबकुछ न्योछावर कर दिया था, उसी पार्टी को अलविदा कहना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने यह कदम उठा लिया।


6.3 भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल

तृणमूल छोड़ने के महज दो दिन बाद, सुवेंदु अधिकारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल हो गए । उनके इस कदम से पूरे देश की सियासी तस्वीर हिल गई थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने उनका जोरदार स्वागत किया । BJP को बंगाल में एक मजबूत जमीनी नेता मिल गया था, और सुवेंदु को ममता विरोधी मोर्चे का सबसे बड़ा चेहरा मिल गया था।


अध्याय 7: ममता पर दोहरा वार: 2021 और 2026 का इतिहास

7.1 2021 का विधानसभा चुनाव: नंदीग्राम में पहली जीत

सुवेंदु अधिकारी के लिए 2021 का चुनाव सबसे अहम था। उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के खिलाफ नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ने का फैसला किया। यह एक "गुरु-शिष्य" के बीच सीधा मुकाबला था।


हालाँकि BJP उस चुनाव में सरकार नहीं बना पाई (TMC ने 213 सीटें जीतकर सरकार बनाई), लेकिन सुवेंदु ने इतिहास रच दिया। उन्होंने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में 1,956 वोटों से हरा दिया ।


यह ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी हार थी। मुख्यमंत्री होने के नाते ममता को सांसद रहने के लिए दूसरी सीट (भवानीपुर) से जीतना पड़ा। सुवेंदु इस हार के बाद विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of the Opposition) बन गए ।


7.2 2026 का चुनाव: भवानीपुर पर धावा

साल 2026: सुवेंदु ने वह कर दिखाया जो शायद ही कोई कर सकता था। BJP ने इतिहास में पहली बार एक ही चुनाव में सुवेंदु को दो सीटों पर उतारा - उनका पारंपरिक गढ़ नंदीग्राम, और ममता बनर्जी का लगभग अभेद्य किला भवानीपुर ।


जीत का ऐलान:

जब 4 मई 2026 को नतीजे आए, तो सब चौंक गए। BJP को बंगाल में 200 से अधिक सीटों के साथ पूर्ण बहुमत मिला, और TMC सत्ता से बेदखल हो गई । लेकिन सबसे बड़ी खबर थी सुवेंदु अधिकारी की जीत। उन्होंने:


नंदीग्राम सीट बरकरार रखी।


भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी को 15,000 से भी अधिक वोटों से करारी शिकस्त दी ।


सुवेंदु ने तृणमूल पर दोहरा वार किया था। जिस ममता को वे कभी अपना मार्गदर्शक मानते थे, उन्हें उन्हीं के घर में हराकर बंगाल का सबसे बड़ा विजेता बन गए।


अध्याय 8: विवाद, शैली और राजनीतिक दर्शन

8.1 विवादों की फेहरिस्त

सुवेंदु अधिकारी एक मुखर नेता हैं, जिनकी बयानबाजी को लेकर उनके आलोचक अक्सर निशाना साधते हैं।


सांप्रदायिक बयान: 2026 के चुनाव प्रचार के दौरान सुवेंदु ने कई बार ऐसे बयान दिए, जो सांप्रदायिक माने गए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि जो लोग उन्हें वोट नहीं देंगे, उनके विकास की जिम्मेदारी वे नहीं लेंगे। साथ ही उन्होंने दक्षिण एशियाई देशों (बांग्लादेश) को लेकर कठोर टिप्पणियां कीं ।


बंगलादेशी घुसपैठ: उन्होंने बंगाल की राजनीति में "धर्मांतरण और घुसपैठ" के मुद्दे को सबसे जोरदार तरीके से उठाया। उनका मानना था कि बंगाल की जनसांख्यिकी बदल रही है, और इसे रोकना होगा ।


आपराधिक मुकदमे: सुवेंदु के खिलाफ राजनीतिक विरोध के दौरान कई आपराधिक मुकदमे दर्ज किए गए। ऐसी चर्चा है कि उनके खिलाफ 25 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं, हालाँकि कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनमें से 15 मामलों को 2025 में ख़ारिज कर दिया ।


8.2 राजनीतिक शैली: 'जो हमारे साथ, हम उनके साथ'

उनका राजनीतिक दर्शन PM मोदी के "सबका साथ, सबका विकास" से थोड़ा हटकर माना जाता था। उन्होंने एक बार साफ कहा था:

"जो हमारे साथ, हम उनके साथ" (Jo hamaare saath, hum unke saath) ।

यह हार्डकोर हिंदुत्व वोट बैंक को साधने की एक रणनीति थी, जिसने BJP को बंगाल में बंपर जीत दिलाई।


अध्याय 9: निजी जीवन (रूचियां और कार्य)

9.1 समाजसेवा और खेलों में रुचि

राजनीति के अलावा, सुवेंदु अधिकारी एक सफल व्यवसायी और समाजसेवी भी हैं। उनका नाम सहकारी बैंकों (Co-operative Banks) के क्षेत्र में बहुत प्रसिद्ध है। वे कांथी को-ऑपरेटिव बैंक और विद्यासागर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष रह चुके हैं ।

खेलों में उनकी गहरी दिलचस्पी है। वे विशेष रूप से जिला स्तर पर फुटबॉल के आयोजन को बढ़ावा देते हैं ।


9.2 24 घंटे नेता

सुवेंदु एक ऐसे नेता के रूप में जाने जाते हैं जो दिन के 24 घंटे, सप्ताह के 7 दिन काम कर सकते हैं। उनके सहयोगी बताते हैं कि वे अक्सर आधी रात को भी अपने कार्यकर्ताओं को फोन करके हालचाल पूछते हैं।


निष्कर्ष: बंगाल के अगले मुख्यमंत्री?

सुवेंदु अधिकारी ने 2026 के चुनावों में जो किया है, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है। उन्होंने लगभग असंभव को संभव कर दिखाया है। वही नेता, जिस पर कभी सरकारी तंत्र ने गोलियां चलवाई थी, वही नेता, जिसने अपनी ही पार्टी के खिलाफ बगावत की, आज बंगाल की सत्ता के शिखर पर विराजमान होने के लिए तैयार है ।


BJP ने भले ही तुरंत नाम का ऐलान न किया हो (8 मई की बैठक रखी गई है), लेकिन सुवेंदु अधिकारी के सीएम पद के दावेदार होने में कोई दो राय नहीं है ।


एक कांग्रेस पार्षद से शुरू होकर, ममता के विश्वासपात्र बनना, फिर प्रतिपक्ष का नेता बनना, और आखिरकार उसी ममता को उनकी ही कुर्सी से उखाड़ फेंकना - सुवेंदु अधिकारी की यह यात्रा राजनीति के विद्यार्थियों के लिए एक केस स्टडी है। अब देखना यह होगा कि 55 वर्षीय इस 'जाइंट किलर' का शासन बंगाल को किस दिशा में ले जाता है ।



यहाँ सुवेंदु अधिकारी के जीवन से जुड़ी 50 रोचक जानकारियाँ प्रस्तुत हैं, जिनमें उनके कहने, करने, जीवनशैली और राजनीतिक यात्रा के अनोखे पहलू शामिल हैं:


???? 1-10: व्यक्तित्व, उपनाम और अंदाज

सादगी का अलग अंदाज – सुवेंदु अधिकारी के मुताबिक, उनके गाँव के बुजुर्ग उनकी मूंछों के पैटर्न, बालों के स्टाइल और कपड़ों पर भी नजर रखते हैं। वह गर्व से कहते हैं कि पिछले दो दशकों में उनमें कोई बदलाव नहीं आया है ।


‘तमलुक के बाघ’ – अपनी दमदार और आक्रामक राजनीतिक शैली के कारण उन्हें यह उपनाम दिया गया है।


‘नंदीग्राम के योद्धा’ – 2007 के ऐतिहासिक भूमि आंदोलन में उनकी अहम भूमिका के कारण यह नाम मशहूर हुआ।


बिना गहनों वाला नेता – आभूषणों से उनका कोई लगाव नहीं है। चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके पास कोई सोना या चांदी नहीं है।


शाकाहारी जीवनशैली – राजनीतिक रैलियों के दौरान भी वह अपने भोजन को लेकर सादगी बरतते हैं।


‘जो हमारे साथ, हम उनके साथ’ – ‘सबका साथ, सबका विकास’ के बजाय, उन्होंने बंगाल में बीजेपी के लिए यह सीधा और सख्त नारा दिया ।


बिना घड़ी के नेता – वह शायद ही कभी घड़ी पहनते हैं, जिससे उनकी ‘जमीनी’ छवि और मजबूत होती है।


‘गुरु’ का ‘शिष्य’ से मुकाबला – उन्होंने अपनी पूर्व मेंटर ममता बनर्जी को लगातार दो बार (2021 और 2026) हराकर इतिहास रच दिया ।


सियासी विरासत – वह उस परिवार से आते हैं, जिसे पूर्वी मेदिनीपुर का ‘राजनीतिक राजवंश’ कहा जाता है ।


‘शिष्टाचारी आक्रामकता’ – विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने कभी अपनी बयानबाजी में कमी नहीं आने दी, लेकिन सहयोगियों के प्रति वह हमेशा विनम्र रहे हैं।


???? 11-20: शिक्षा, करियर और शुरुआत

देर से आई एम.ए. डिग्री – उन्होंने 2011 में 41 साल की उम्र में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से एम.ए. (मास्टर ऑफ आर्ट्स) की डिग्री हासिल की ।


छात्र परिषद से शुरुआत – राजनीति में उनका पहला कदम कांग्रेस के छात्र संगठन से था, जब पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे का बोलबाला था ।


पहली नौकरी राजनीति ही – पारंपरिक नौकरी कभी नहीं की, हमेशा जनता की सेवा को ही अपना करियर माना।


गाँव का पहला बड़ा नेता – करकुली गाँव से निकलकर राज्य के सबसे ताकतवर नेता बनने तक का सफर प्रेरणादायक है।


विधायक बनने से पहले पार्षद – 1995 में कांथी नगर पालिका से पार्षद बनकर उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की नींव रखी ।


2009 में पहली लोकसभा यात्रा – भारी बहुमत से तमलुक सीट जीतकर वह पहली बार संसद पहुंचे ।


2016 में लोकसभा से इस्तीफा – ममता सरकार में मंत्री बनने के लिए उन्होंने अपनी सांसद की सीट छोड़ दी ।


सहकारी बैंकों के विशेषज्ञ – वह विद्यासागर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक और कांथी को-ऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष रह चुके हैं ।


कॉलेज में सक्रिय छात्र नेता – छात्र जीवन में ही उन्होंने संघर्ष और संगठन कौशल के गुर सीख लिए थे।


जिला फुटबॉल के संरक्षक – उनकी खेल में रुचि राजनीति से कम नहीं है; वह जिला स्तर पर फुटबॉल का आयोजन करवाते हैं ।


???? 21-30: TMC से BJP तक का सफर

आजीवन अविवाहित – उन्होंने कभी शादी नहीं की और इसे अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता बताते हैं।


ममता के ‘सबसे करीबी’ – एक समय था जब उन्हें तृणमूल कांग्रेस (TMC) का ‘दूसरा नंबर’ का नेता माना जाता था ।


बगावत की वजह अभिषेक बनर्जी – ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी के उदय के बाद ही उनकी नाराजगी सार्वजनिक हुई ।


साल 2020: सियासी भूचाल – दिसंबर 2020 में उन्होंने TMC से इस्तीफा देकर बीजेपी ज्वाइन कर ली, जो बंगाल की राजनीति में एक बड़ा बदलाव था ।


'तोलाबाज भतीजे हटाओ' – बीजेपी में आने के बाद उन्होंने ममता के भतीजे के खिलाफ यह नारा दिया था ।


25 आपराधिक मामले – एक समय उनके खिलाफ राजनीतिक विरोध प्रदर्शनों को लेकर 25 से अधिक मामले दर्ज थे ।


कोर्ट ने काट दिए 15 केस – अक्टूबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ 15 मामलों को खारिज कर दिया ।


ममता के खिलाफ पहली जीत (2021) – नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराकर पहली बार ‘जाइंट किलर’ बने ।


दूसरी जीत और भी शानदार (2026) – 2026 में भवानीपुर सीट पर खुद ममता बनर्जी को 15,114 वोटों से हराकर उनके गढ़ में सेंध लगाई ।


ममता ने खुद को कहा था ‘बड़ा गधा’ – सुवेंदु के जाने के बाद ममता ने यह कहकर आत्मालोचना की थी कि उन्होंने उनका असली चेहरा पहचानने में गलती की ।


????️ 31-40: विवाद, मुहावरे और बयानबाजी

‘हिंदू EVM बनाम मुस्लिम EVM’ – चुनावों को लेकर उनका यह विवादास्पद बयान काफी चर्चा में रहा ।


निशाने पर थे सुवेंदु – मई 2026 में उनके निजी सहायक चंद्रनाथ रथ की हत्या कर दी गई। जांच में पता चला कि हमलावरों का असली निशाना खुद सुवेंदु अधिकारी थे ।


‘बांग्लादेशी घुसपैठिए’ मुद्दा – पिछले पांच सालों में उन्होंने सबसे जोरदार तरीके से रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे को उठाया ।


‘ममता बेगम’ वाला तंज – 2021 के बाद उन्होंने ममता बनर्जी को ‘ममता बेगम’ कहकर उनके तुष्टीकरण की नीति पर तंज कसना शुरू किया ।


‘नेताजी की भूमि से हूं’ – जब उन्हें भवानीपुर में ‘बाहरी’ कहा गया तो उन्होंने पलटवार करते हुए कहा, “मैं इस भूमि का पुत्र हूं” ।


‘सत्ता का भूखा नहीं हूं’ – 2026 की ऐतिहासिक जीत के बाद उन्होंने कहा कि वह सत्ता के भूखे नहीं हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं आया है ।


दिल्ली की बुलावा – वह अक्सर केंद्रीय नेतृत्व से मिलने दिल्ली जाते हैं, जिससे उनकी बीजेपी में अहमियत का पता चलता है ।


‘राहुल, तेजस्वी खत्म, अखिलेश हैं अगले’ – जीत के बाद उन्होंने विपक्षी नेताओं को यह चेतावनी देने में कोई गुरेज नहीं किया ।


राष्ट्रवादी मुसलमानों की तारीफ – उन्होंने यह भी माना कि कुछ ‘राष्ट्रवादी मुसलमानों’ ने उन्हें वोट दिया ।


धर्मांतरण का मुद्दा – चुनावी रैलियों में उन्होंने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण और जनसांख्यिकी बदलने के आरोप लगाए।


???? 41-50: उपलब्धियां, फैन फॉलोइंग और अनदेखे तथ्य

लगातार दो बार सांसद – उन्होंने 2009 और 2014 में लगातार तमलुक लोकसभा सीत जीती ।


तीन बार लोकप्रिय वोट से जीत – 2026 में उन्होंने भवानीपुर और नंदीग्राम, दोनों जगह से जीत हासिल की ।


कर्ज में डूबा नेता नहीं – चुनावी हलफनामे के अनुसार, उन पर एक रुपए का भी कर्ज नहीं है।


‘संदेश डिप्लोमेसी’ – पार्टी में अंदरूनी मतभेद होने पर भी उन्होंने दिलीप घोष जैसे नेताओं को साथ रखने की कला दिखाई ।


बंगाल के लिए नया रिकॉर्ड – 2026 में भवानीपुर सीट पर उनकी जीत ऐतिहासिक मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने किसी सिटिंग सीएम को उनके घर पर ही हरा दिया ।


पिता भी बीजेपी में शामिल – 2021 में सुवेंदु के बाद उनके पिता शिशिर अधिकारी और भाई भी बीजेपी में शामिल हो गए ।


हल्दिया बंदरगाह के मजदूर नेता – ट्रेड यूनियनों में उनकी पकड़ मजबूत है, खासकर हल्दिया औद्योगिक क्षेत्र में ।


जंगलमहल में जादू – संथाल परगना और जंगलमहल इलाकों में बीजेपी का विस्तार करने में उनकी अहम भूमिका रही ।


उत्तराधिकारी की दौड़ में आगे – हिमंत बिस्वा सरमा की तरह अब वह बंगाल में बीजेपी के ‘चेहरे’ माने जाते हैं ।


इतिहास में दर्ज नाम – वह पश्चिम बंगाल के ऐसे दूसरे व्यक्ति हैं जिन्होंने पहले वाममोर्चा और फिर तृणमूल को हराकर बीजेपी को सत्ता दिलाई।




सुवेंदु अधिकारी: 50 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

यहाँ सुवेंदु अधिकारी के जीवन, राजनीतिक करियर, संपत्ति और 2026 के चुनावी प्रदर्शन से जुड़े 50 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ) प्रस्तुत हैं:


???? 1-10: व्यक्तिगत जीवन और पृष्ठभूमि

प्रश्न 1: सुवेंदु अधिकारी का जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: सुवेंदु अधिकारी का जन्म 15 दिसंबर 1970 को पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले के करकुली गाँव में हुआ था।


प्रश्न 2: 2026 में उनकी आयु कितनी है?

उत्तर: 2026 में उनकी आयु 55 वर्ष है।


प्रश्न 3: उनके माता-पिता कौन हैं?

उत्तर: उनके पिता शिशिर कुमार अधिकारी (पूर्व केंद्रीय मंत्री) और माता गायत्री अधिकारी हैं।


प्रश्न 4: क्या सुवेंदु अधिकारी विवाहित हैं?

उत्तर: नहीं, सुवेंदु अधिकारी आजीवन अविवाहित रहे हैं।


प्रश्न 5: उनके भाई-बहन कौन हैं?

उत्तर: उनके दो भाई हैं - दिब्येंदु अधिकारी (TMC नेता) और सौमेंदु अधिकारी (BJP नेता)।


प्रश्न 6: उनकी शैक्षिक योग्यता क्या है?

उत्तर: उन्होंने 2011 में रवींद्र भारती विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ आर्ट्स (M.A.) की डिग्री प्राप्त की है।


प्रश्न 7: उनका राजनीतिक करियर कैसे शुरू हुआ?

उत्तर: उन्होंने 1995 में कांथी नगर पालिका से पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की।


प्रश्न 8: किस पार्टी से उन्होंने अपनी राजनीतिक शुरुआत की?

उत्तर: उन्होंने कांग्रेस पार्टी से राजनीति शुरू की, बाद में 1998 में TMC में शामिल हुए।


प्रश्न 9: उनकी राशि क्या है?

उत्तर: धनु राशि (15 दिसंबर को जन्म के अनुसार)।


प्रश्न 10: उनका प्रमुख निवास स्थान कहाँ है?

उत्तर: उनका मुख्य निवास पश्चिम बंगाल के पूर्वी मेदिनीपुर जिले में है।


???? 11-20: राजनीतिक करियर और TMC से BJP में संक्रमण

प्रश्न 11: सुवेंदु अधिकारी ने TMC कब छोड़ी और BJP में कब शामिल हुए?

उत्तर: उन्होंने दिसंबर 2020 में TMC छोड़ी और BJP में शामिल हो गए।


प्रश्न 12: TMC छोड़ने का मुख्य कारण क्या था?

उत्तर: ममता बनर्जी द्वारा अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी को पार्टी में दूसरा सबसे बड़ा नेता बनाए जाने से वे नाराज थे।


प्रश्न 13: वर्तमान में उनकी पार्टी क्या है?

उत्तर: वर्तमान में वे भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता हैं।


प्रश्न 14: वे कितनी बार लोकसभा सांसद रहे हैं?

उत्तर: वे दो बार लोकसभा सांसद रहे हैं - 2009 और 2014 में।


प्रश्न 15: उन्होंने कौन सी लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया?

उत्तर: उन्होंने तमलुक लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया।


प्रश्न 16: वे पहली बार विधायक कब बने?

उत्तर: वे 2006 में कांथी दक्षिण सीट से पहली बार विधायक बने।


प्रश्न 17: ममता सरकार में उन्हें कौन सा मंत्री पद मिला?

उत्तर: 2016 में उन्हें परिवहन मंत्री बनाया गया था।


प्रश्न 18: वर्तमान में उनकी विधानसभा में क्या भूमिका है?

उत्तर: वे वर्तमान में पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) हैं।


प्रश्न 19: RSS से उनका कोई संबंध रहा है?

उत्तर: हाँ, अपने प्रारंभिक वर्षों में उन्होंने RSS शाखाओं में प्रशिक्षण लिया था।


प्रश्न 20: क्या उन्होंने कभी चुनाव हारा है?

उत्तर: हाँ, उन्होंने 2001 का विधानसभा और 2004 का लोकसभा चुनाव हारा था, लेकिन 2006 के बाद से लगातार जीत रहे हैं।


???? 21-30: 2021 और 2026 के चुनाव

प्रश्न 21: 2021 के चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने किसे हराया था?

उत्तर: उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को उनके ही चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम में लगभग 1,956 वोटों से हराया था।


प्रश्न 22: 2026 के चुनाव में वे किन दो सीटों पर लड़े?

उत्तर: उन्होंने नंदीग्राम और भवानीपुर, दोनों सीटों से चुनाव लड़ा।


प्रश्न 23: 2026 में भवानीपुर सीट पर उन्होंने किसे हराया और कितने वोटों से?

उत्तर: उन्होंने ममता बनर्जी को भवानीपुर सीट पर लगभग 15,000 वोटों से हराया।


प्रश्न 24: 2026 में उनकी कौन सी दो जीतें ऐतिहासिक रहीं?

उत्तर: उन्होंने नंदीग्राम सीट बरकरार रखी और ममता बनर्जी के गृह क्षेत्र भवानीपुर में उन्हें हराकर इतिहास रच दिया।


प्रश्न 25: क्या BJP ने 2026 में पश्चिम बंगाल में सरकार बनाई है?

उत्तर: हाँ, 2026 के चुनाव परिणामों के अनुसार, BJP ने 200 से अधिक सीटों पर जीत हासिल की।


प्रश्न 26: क्या सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं?

उत्तर: घटनाक्रम के अनुसार, वे बंगाल में BJP के मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार के रूप में उभरे हैं।


प्रश्न 27: विजय के बाद सुवेंदु अधिकारी ने क्या कहा?

उत्तर: उन्होंने कहा कि वे सत्ता के भूखे नहीं हैं और उनमें कोई बदलाव नहीं आया है।


प्रश्न 28: भवानीपुर में ममता को चुनौती देना क्यों अहम था?

उत्तर: भवानीपुर ममता बनर्जी का गृह क्षेत्र है, इसलिए यहां उन्हें हराना अत्यधिक प्रतीकात्मक और ऐतिहासिक माना जाता है।


प्रश्न 29: 2026 के चुनाव में उनकी जीत के अंतर क्या थे?

उत्तर: नंदीग्राम में उनकी जीत का अंतर 2021 की तुलना में अधिक था, और भवानीपुर में उन्होंने 15,000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की।


प्रश्न 30: क्या उन्होंने कभी अपनी चुनावी रणनीति के बारे में बात की?

उत्तर: उन्होंने संकेत दिया कि BJP ने “बड़े हिंदू वोट बैंक” को एकजुट करने पर ध्यान केंद्रित किया था।


???? 31-40: संपत्ति और वित्तीय विवरण

प्रश्न 31: 2026 के चुनावी हलफनामे के अनुसार सुवेंदु अधिकारी की कुल संपत्ति कितनी है?

उत्तर: उनकी कुल घोषित संपत्ति लगभग ₹85.87 लाख है।


प्रश्न 32: क्या उन पर कोई कर्ज (liability) है?

उत्तर: नहीं, उन पर एक रुपए का भी कर्ज नहीं है, उनकी देनदारियाँ शून्य हैं।


प्रश्न 33: उनके पास कितनी नकदी (cash) है?

उत्तर: उनके पास केवल ₹12,000 नकद हैं।


प्रश्न 34: क्या उनके पास कार या अन्य वाहन हैं?

उत्तर: नहीं, उनके पास कोई मोटर वाहन नहीं है।


प्रश्न 35: क्या उनके पास सोना या आभूषण हैं?

उत्तर: नहीं, उनके पास कोई सोना या आभूषण नहीं है।


प्रश्न 36: उनके कितने बैंक खाते हैं और उनमें कितनी राशि है?

उत्तर: उनके 14 बैंक खातों (PNB, SBI, Axis, IDBI और सहकारी बैंकों में) में कुल ₹7.34 लाख जमा हैं।


प्रश्न 37: उनकी अचल संपत्ति (immovable assets) कितनी है?

उत्तर: पूर्वी मेदिनीपुर जिले में उनकी अचल संपत्ति लगभग ₹61.30 लाख है।


प्रश्न 38: उनकी वार्षिक आय कितनी है?

उत्तर: उनकी 2024-25 की वार्षिक आय ₹17.38 लाख है, जो 2020-21 में ₹8.13 लाख थी।


प्रश्न 39: उनकी संपत्ति ममता बनर्जी की संपत्ति से कैसे तुलनीय है?

उत्तर: उनकी घोषित संपत्ति (₹85.87 लाख) ममता बनर्जी (₹15.37 लाख) की तुलना में लगभग साढ़े पांच गुना अधिक है।


प्रश्न 40: उनकी आय का मुख्य स्रोत क्या है?

उत्तर: उनकी आय के मुख्य स्रोत विधायक वेतन, सांसद पेंशन और व्यवसाय हैं।


???? 41-50: विवाद, आपराधिक मामले और भविष्य

प्रश्न 41: सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ कितने आपराधिक मामले दर्ज हैं?

उत्तर: उनके 2026 के चुनावी हलफनामे के अनुसार, उनके खिलाफ 29 आपराधिक मामले लंबित हैं।


प्रश्न 42: क्या इनमें से किसी मामले में दोषसिद्धि (conviction) हुई है?

उत्तर: नहीं, इन 29 में से किसी भी मामले में अब तक आरोप तय नहीं हुए हैं और कोई दोषसिद्धि नहीं हुई है।


प्रश्न 43: 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था?

उत्तर: अक्टूबर 2025 में कलकत्ता हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ 15 आपराधिक मामलों को खारिज कर दिया था।


प्रश्न 44: नंदीग्राम आंदोलन के दौरान उन पर क्या आरोप लगा था?

उत्तर: पश्चिम बंगाल पुलिस के CID ने आरोप लगाया था कि उन्होंने नंदीग्राम में माओवादियों को 1,000 से अधिक गोलियां उपलब्ध कराईं, जिसे उन्होंने स्पष्ट रूप से नकारा।


प्रश्न 45: 2026 के चुनाव प्रचार के दौरान उनके कुछ विवादास्पद बयानों में क्या शामिल था?

उत्तर: उन्होंने प्रवासी मुस्लिम श्रमिकों के रोजगार को लेकर धमकी भरे बयान दिए और ‘हिंदू EVM बनाम मुस्लिम EVM’ जैसे विवादास्पद बयान दिए।


प्रश्न 46: चुनाव के बाद उन्होंने क्या चेतावनी दी?

उत्तर: उन्होंने चेतावनी दी कि भविष्य की BJP सरकार पिछले मामलों को फिर से खोलेगी और IPC व BNS के तहत कानूनी कार्रवाई करेगी।


प्रश्न 47: क्या सुवेंदु अधिकारी कभी केंद्रीय मंत्री रहे हैं?

उत्तर: नहीं, वे अब तक केंद्रीय मंत्री नहीं रहे हैं।


प्रश्न 48: सहकारी आंदोलन में उनकी क्या भूमिका रही है?

उत्तर: वे सहकारी बैंकों के अनुभवी नेता हैं और कांथी सहकारी बैंक तथा विद्यासागर केंद्रीय सहकारी बैंक के अध्यक्ष रह चुके हैं।


प्रश्न 49: खेलों में उनकी क्या रुचि है?

उत्तर: उनकी खेलों में गहरी रुचि है, विशेषकर जिला स्तर पर फुटबॉल आयोजनों को बढ़ावा देने और क्रिकेट में।


प्रश्न 50: 2026 की जीत के बाद वे किन विपक्षी नेताओं के बारे में बयान दिए?

उत्तर: उन्होंने कहा कि “ममता, तेजस्वी, राहुल खत्म हो चुके हैं और अखिलेश यादव अगले हैं”।