शाकम्भरी देवी
October 27 2025
शाकम्भरी देवी – इतिहास, कथा, मेला, यात्रा गाइड
माता
शाकम्भरी देवी, आदिशक्ति जगदम्बा का एक सौम्य अवतार हैं। इनका प्रमुख मंदिर
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के शिवालिक पर्वत श्रृंखला में स्थित है।
यह मंदिर उत्तर भारत का सबसे प्राचीन सिद्ध शक्तिपीठों में से एक माना जाता
है, जहाँ सती का मस्तक गिरा था।
माँ शाकम्भरी देवी का इतिहास अत्यंत प्राचीन और पौराणिक महत्व से जुड़ा हुआ है। वे आदिशक्ति दुर्गा का ही एक अवतार मानी जाती हैं, जिन्होंने धरती पर अकाल और अन्न की कमी से त्रस्त जीवों की रक्षा के लिए अवतार लिया था।
माँ शाकम्भरी देवी का इतिहास (Shakambhari Devi History in Hindi)
1. नाम का अर्थ
“शाकम्भरी” शब्द दो भागों से बना है — ‘शाक’ (अर्थात् सब्ज़ियाँ, वनस्पतियाँ, अन्न) और ‘भरी’ (अर्थात् प्रदान करने वाली या धारण करने वाली)।
इसलिए, शाकम्भरी देवी का अर्थ हुआ — “जो अन्न, फल और सब्ज़ियों से संसार का पालन करती हैं।”
2. पौराणिक कथा
देवी भागवत पुराण और स्कंद पुराण के अनुसार, एक समय धरती पर दुर्गमासुर नामक दैत्य ने चारों वेदों की चोरी कर ली थी।
वेदों के लुप्त हो जाने से यज्ञ, वर्षा, और धर्म सभी समाप्त हो गए — जिससे पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ गया।
तब समस्त देवताओं ने आदिशक्ति से प्रार्थना की —
देवी ने शाकम्भरी रूप में प्रकट होकर सौ वर्षों तक तपस्या की और अपने शरीर से शाक, फल, और वनस्पतियाँ उत्पन्न कर सभी जीवों को अन्न प्रदान किया।
इसी कारण देवी को “शाकम्भरी माता” कहा गया।
3. शताक्षी अवतार
जब देवी ने मनुष्यों की पीड़ा देखी, तो उनके नेत्रों से करुणा के आँसू बहने लगे।
उन आँसुओं से वर्षा हुई और धरती पर पुनः जीवन लौट आया।
इसी कारण वे शताक्षी (सौ नेत्रों वाली) नाम से भी पूजित हुईं।
4. दुर्गमासुर का वध
अंत में देवी ने अपने क्रोधित रूप — भीमा देवी — को प्रकट किया और दुर्गमासुर का वध किया।
वध के पश्चात देवी ने पुनः सौम्य रूप धारण कर संसार को अन्न और जीवन से भर दिया।
5. मंदिर का इतिहास (सहारनपुर)
माँ शाकम्भरी देवी का प्रमुख मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में शिवालिक पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित है।
यह स्थान उन 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहाँ सती का मस्तक गिरा था।
यहाँ देवी की पूजा शाकेश्वर महादेव के साथ की जाती है।
मंदिर के आसपास कई अन्य सिद्धपीठ हैं, जैसे — भीमा देवी, भ्रामरी देवी, भूरादेव, आदि।
6. ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व
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सहारनपुर के इस शक्तिपीठ का उल्लेख कई पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
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यह स्थान शाकम्भरी क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध है।
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राजस्थान, हरियाणा और उत्तराखंड के अनेक मंदिरों में भी शाकम्भरी देवी की पूजा होती है।
7. शाकम्भरी देवी मेला
हर वर्ष आश्विन और चैत्र नवरात्रि में यहाँ लाखों श्रद्धालु आते हैं।
विशेषकर शाकम्भरी देवी मेला में दूर-दूर से भक्त माता के दर्शन हेतु एकत्र होते हैं।
भक्त देवी को शाक (सब्ज़ियाँ), फल और अन्न चढ़ाते हैं — जो उनके नाम और कृपा का प्रतीक है।
8. देवी के स्वरूप का वर्णन
देवी का वर्ण नीलवर्ण बताया गया है।
उनके चार भुजाएँ हैं —
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एक में कमल
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एक में शाक या फल
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एक में धनुष
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और एक में जल से भरा पात्र
वे कमलासन पर विराजमान हैं, और उनके पीछे तेजस्वी सूर्य मंडल (प्रभामंडल) होता है।
धार्मिक संदेश
माँ शाकम्भरी देवी यह सिखाती हैं कि प्रकृति ही जीवन का आधार है।
वे अन्न, जल और वनस्पति की देवी हैं — जो हमें यह संदेश देती हैं कि
“धरती और अन्न की रक्षा करना ही सच्ची भक्ति है।
माँ शाकम्भरी देवी की कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर दुर्गमासुर नाम का एक अत्याचारी दैत्य पैदा हुआ।
वह बहुत बुद्धिमान और चालाक था। उसने कठोर तप करके भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न किया और वर माँगा कि –
“हे प्रभु, चारों वेदों में जो भी ज्ञान है, वह किसी को प्राप्त न हो। कोई मनुष्य या देवता वेदों का पाठ या यज्ञ न कर सके।”
ब्रह्मा ने वरदान दे दिया।
इसके बाद दुर्गमासुर ने वेदों को चुरा लिया और उन्हें अपने अधीन कर लिया।
संसार में अकाल और अंधकार
वेदों के बिना यज्ञ बंद हो गए।
वर्षा होना बंद हो गई।
धरती पर भयंकर अकाल और दुर्भिक्ष फैल गया।
नदियाँ सूख गईं, पेड़-पौधे मुरझा गए, अन्न समाप्त हो गया।
लोग भूख से तड़पने लगे — पशु-पक्षी, मनुष्य, यहाँ तक कि देवता भी दुखी हो गए।
देवी का अवतार
जब सारे देवता विष्णु लोक, शिव लोक और ब्रह्मलोक में भटकने लगे, तो उन्होंने अंततः आदिशक्ति माँ भगवती की आराधना की।
देवताओं की प्रार्थना सुनकर माँ ने शाकम्भरी रूप धारण किया।
उनका स्वरूप अत्यंत दिव्य था —
नीलवर्णा, चार भुजाओं वाली, कमलासन पर विराजमान।
एक हाथ में शाक (सब्ज़ियाँ), दूसरे में फल, तीसरे में धनुष, और चौथे में पात्र धारण किए हुए थीं।
देवी की करुणा – शाक और वर्षा की उत्पत्ति
जब माँ ने देखा कि लोग भूख से मर रहे हैं, तो वे अत्यंत करुणामयी हो गईं।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले, और उन आँसुओं से वर्षा होने लगी।
धरती पर हरियाली लौट आई।
फिर देवी ने अपने शरीर से शाक, फल, कंद, मूल, धान्य और अन्न उत्पन्न किए —
और इस प्रकार उन्होंने सभी जीवों का पालन किया।
इसी कारण उन्हें कहा गया —
“शाकम्भरी” — अर्थात् ‘जो शाक (वनस्पति, अन्न) से संसार का भरण-पोषण करती हैं।’
दुर्गमासुर का वध
जब दुर्गमासुर को पता चला कि देवी ने लोगों की रक्षा की है, तो वह क्रोधित होकर अपनी विशाल सेना लेकर युद्ध के लिए आ गया।
देवी ने भी अपना भीषण रूप धारण किया —
उन्हीं का यह रूप भीमा देवी या भ्रामरी देवी कहलाया।
एक भयंकर युद्ध हुआ।
अंततः देवी ने दुर्गमासुर का वध कर दिया और चारों वेदों को पुनः प्राप्त किया।
वेदों के लौट आने से यज्ञ प्रारंभ हुए और संसार में फिर से सुख, शांति और समृद्धि फैल गई।
देवी का आशीर्वाद
युद्ध के बाद देवी ने पुनः अपना शांत रूप धारण किया और कहा —
“मैं संसार में सदैव ‘शाकम्भरी देवी’ नाम से पूजित रहूँगी।
जो भक्त नवरात्र या कठिन समय में मेरी उपासना करेगा, उसे कभी अन्न और जल की कमी नहीं होगी।”
प्रमुख तीर्थ — सहारनपुर शक्तिपीठ
माँ शाकम्भरी देवी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है।
कहा जाता है कि यहीं सती का मस्तक गिरा था, इसलिए यह स्थान 51 शक्तिपीठों में प्रमुख है।
देवी यहाँ शाकेश्वर महादेव के साथ विराजमान हैं।
यह स्थान “शाकम्भरी क्षेत्र” के नाम से जाना जाता है।
संदेश
माँ शाकम्भरी देवी यह सिखाती हैं कि —
“अन्न ही जीवन है, और प्रकृति ही माता का रूप है।
जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तो माता की कृपा सदा बनी रहती है।”
माँ शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ (Shakambhari Devi Shaktipeeth in Hindi)
परिचय
माँ शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ उत्तर भारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध सिद्धपीठ है, जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित है।
यह वही पवित्र स्थान है जहाँ सती का मस्तक गिरा था।
इसी कारण यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
यह मंदिर शिवालिक पर्वत श्रृंखला की गोद में, घने जंगलों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा हुआ है।
पौराणिक कथा से संबंध
देवी भागवत पुराण और स्कंद पुराण में उल्लेख है कि —
जब भगवान शंकर सती के जले हुए शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब विष्णु भगवान ने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के अंग काट दिए।
जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
माँ शाकम्भरी देवी के इस स्थान पर सती का मस्तक गिरा था।
इसलिए यहाँ देवी को “माँ शाकम्भरी” और उनके साथ भगवान को “शाकेश्वर महादेव” के नाम से पूजा जाता है।
शाकम्भरी देवी का स्वरूप
देवी का स्वरूप अत्यंत दिव्य है।
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वे नीलवर्णा, चार भुजाओं वाली और कमलासन पर विराजमान हैं।
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उनके एक हाथ में कमल, दूसरे में फल, तीसरे में शाक (सब्जियाँ), और चौथे में धनुष है।
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देवी के मुखमंडल से तेज और करुणा झलकती है।
शाकम्भरी देवी के नाम का अर्थ
“शाक” का अर्थ है — सब्जियाँ, फल, अन्न और वनस्पतियाँ।
“भरी” का अर्थ है — देने वाली या धारण करने वाली।
इस प्रकार “शाकम्भरी” का अर्थ हुआ —
“जो शाक और अन्न से संसार का पालन करती हैं।”
पौराणिक कथा के अनुसार, जब पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा था, तब देवी ने अपने शरीर से अन्न और फल उत्पन्न कर संसार का पोषण किया था।
मंदिर का स्थान और विशेषता
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स्थान: सहारनपुर से लगभग 22 किलोमीटर दूर, शिवालिक पहाड़ियों के बीच।
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प्रमुख आकर्षण:
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मुख्य मंदिर में माँ शाकम्भरी देवी की प्रतिमा।
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निकट ही शाकेश्वर महादेव मंदिर, जहाँ भगवान शिव विराजमान हैं।
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पास ही भीमा देवी, भ्रामरी देवी और भूरादेव के मंदिर हैं।
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धार्मिक मान्यता
कहा जाता है कि जो भक्त माँ शाकम्भरी के दरबार में श्रद्धा से दर्शन करता है,
उसे जीवन में अन्न, जल, और धन की कभी कमी नहीं होती।
देवी को “अन्नपूर्णा” और “शताक्षी” भी कहा जाता है —
क्योंकि उनके नेत्रों से बहते आँसुओं से पृथ्वी पर वर्षा हुई थी।
शाकेश्वर महादेव
शाकम्भरी क्षेत्र में स्थित शाकेश्वर महादेव का मंदिर अत्यंत प्राचीन है।
किंवदंती है कि यहाँ भगवान शिव स्वयं माता शाकम्भरी की रक्षा के लिए प्रकट हुए थे।
माता के दर्शन के बाद शाकेश्वर महादेव के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है।
धार्मिक आयोजन
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आश्विन नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में यहाँ भव्य मेला लगता है।
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हजारों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु दूर-दूर से आते हैं।
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भक्तजन माता को फल, शाक, और मिठाई का भोग लगाते हैं।
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इन दिनों में क्षेत्र का वातावरण पूर्णतः भक्तिमय हो जाता है।
माँ शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ कैसे पहुंचे (Shakambhari Devi Temple Travel Guide in Hindi)
माँ शाकम्भरी देवी का पवित्र मंदिर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में, शिवालिक पर्वत श्रृंखला की खूबसूरत वादियों के बीच स्थित है। यह स्थान सहारनपुर शहर से लगभग 22 किलोमीटर की दूरी पर है और सड़क मार्ग से आसानी से पहुँचा जा सकता है।
सड़क मार्ग (By Road)
सहारनपुर से माँ शाकम्भरी देवी मंदिर तक पक्की सड़क बनी हुई है।
सहारनपुर शहर से आप टैक्सी, ऑटो या निजी वाहन के माध्यम से लगभग 45 मिनट में मंदिर पहुँच सकते हैं।
रास्ता सुंदर पहाड़ियों और हरियाली से भरा हुआ है।
मुख्य मार्ग — सहारनपुर → सरसावा → बेहट → शाकम्भरी देवी मंदिर।
रेल मार्ग (By Train)
सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन सहारनपुर जंक्शन है, जो उत्तर भारत के प्रमुख रेलवे स्टेशनों में से एक है।
यहाँ से देश के लगभग सभी बड़े शहरों — दिल्ली, हरिद्वार, देहरादून, मेरठ, लखनऊ, चंडीगढ़ आदि के लिए रेल सेवा उपलब्ध है।
रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी लगभग 22 किलोमीटर है, जिसे टैक्सी या बस से आसानी से तय किया जा सकता है।
हवाई मार्ग (By Air)
माँ शाकम्भरी देवी के निकटतम हवाई अड्डे का नाम जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (देहरादून) है।
यह हवाई अड्डा मंदिर से लगभग 90 किलोमीटर दूर स्थित है।
एयरपोर्ट से आप टैक्सी या कैब के माध्यम से सहारनपुर होते हुए सीधे मंदिर पहुँच सकते हैं।
बस मार्ग (By Bus)
उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की नियमित बस सेवाएँ सहारनपुर, हरिद्वार, देहरादून और मेरठ से चलती हैं।
सहारनपुर बस स्टेशन से “बेहट” या “शाकम्भरी देवी” जाने वाली बसें आसानी से मिल जाती हैं।
यात्रा का सर्वोत्तम समय (Best Time to Visit)
माँ शाकम्भरी देवी के दर्शन के लिए सबसे उत्तम समय है —
चैत्र नवरात्रि (मार्च–अप्रैल) और आश्विन नवरात्रि (सितंबर–अक्टूबर)।
इन दिनों में यहाँ भव्य शाकम्भरी मेला आयोजित होता है।
सर्दियों (अक्टूबर से मार्च) का मौसम यात्रा के लिए सबसे सुखद रहता है।
विशेष सुझाव (Travel Tips)
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मंदिर परिसर में भूरादेव के दर्शन पहले करना शुभ माना जाता है।
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नवरात्रि के समय भीड़ अधिक होती है, इसलिए यात्रा की योजना पहले से बनाएं।
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पहाड़ी मार्ग होने के कारण आरामदायक जूते पहनें।
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मंदिर परिसर में प्रसाद, जल, और भोजन की पर्याप्त व्यवस्था रहती है।
जय जय शाकम्भरी माता आरती (Aarti of Maa Shakambhari Devi)
जय जय शाकम्भरी माता, ब्रह्मा विष्णु शिव दाता।
संकट मोचनि जगत जननी, हमारी रक्षा करना माता॥ जय जय...॥
नीलवर्ण तनु अति शोभा, त्रिनयन रूप निराला।
शाक फलादि भोग लगावें, सब दुख हरणी भाला॥ जय जय...॥
शताक्षी रूप धरा जब, दुष्ट राक्षस दल भारी।
अन्न जल सब हो गए थे, तब तुम ली रूप हमारी॥ जय जय...॥
फल फूल और शाक सब्जियाँ, अपने तन से उपजाई।
भूख प्यास मिटाई सबकी, जग में महिमा बढ़ाई॥ जय जय...॥
शाकेश्वर संग विराजो, पर्वत पर रूप तुम्हारा।
शरण गहे जो भक्त तुम्हारी, सुध लेती हो सारा॥ जय जय...॥
दीन दुखी के दुःख हरनी, चरण तुम्हारे जो ध्यावे।
अन्न-धन-लाभ सदा उसको, जग में सुख वैभव पावे॥ जय जय...॥
माता शाकम्भरी भवानी, जय-जय शत-शत वंदन।
**तुम बिन कोई नहीं त्राता, करो जगत कल्याण॥ जय जय...॥
आरती का अर्थ (संक्षेप में)
यह
आरती माँ शाकम्भरी के उस स्वरूप की स्तुति है जिन्होंने अपने शरीर से शाक,
फल और अन्न उत्पन्न कर भूख से तड़पते संसार को जीवन दिया।
उनका आशीर्वाद जीवन में समृद्धि, अन्न, जल और शांति प्रदान करता है।
माँ शाकम्भरी देवी चालीसा (Maa Shakambhari Devi Chalisa in Hindi)
॥ दोहा ॥
जय शाकम्भरी जगत जननी, अन्नपूर्णा रूपी दयाल।
भक्तन पर कृपा बरसावो, हर लो भवसागर जंजाल॥
॥ चौपाई ॥
जय जय जय शाकम्भरी माता।
भूख-प्यास हरने वाली दाता॥
फल-फूल शाक उपजायो तोही।
पालन कीन्हो जगत सबको ही॥
शताक्षी रूप धर्यो जब भारी।
दुष्टों से त्राहि त्राहि पुकारि॥
अन्न-जल जब कुछ न रह पायो।
तब तन से अन्न बहु उपजायो॥
शिवालिक पर्वत में विराजे।
भक्तन के संकट सब भाजे॥
सिंहासन पर बैठे भवानी।
शाकेश्वर संग महेश रवानी॥
तुम अन्नपूर्णा तुम जगदम्बा।
भव भय हारी हरो दुरन्ता॥
दीन अनाथ सदा सहारा।
शरण गहे जो मिले तुम्हारा॥
तेरे नाम सुमिरन से माता।
दूर होय दुख संकट घाता॥
अन्न जल धन लाभ दिलावो।
भक्तन का पालन कर जावो॥
जो कोई मन लावे ध्यान।
शाकम्भरी माता का नाम॥
भक्तन की सुध सदा तुम राखो।
असुर दलन का नाम न छाको॥
अर्चन पूजन जो मन लावे।
सुख समृद्धि जग में पावे॥
सकल मनोरथ पूर्ण करावा।
माता शाकम्भरी सुखदाई नावा॥
जय जय जय शाकम्भरी भवानी।
करहु कृपा जगत कल्याणी॥
॥ दोहा ॥
जय शाकम्भरी जगत जननी, अन्नपूर्णा कर जोड़।
तुम बिन कौन सहारा माता, भक्त सदा तव ओढ़॥
माँ शाकम्भरी देवी के 108 नाम (108 Names of Maa Shakambhari Devi)
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ॐ शाकम्भर्यै नमः।
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ॐ शताक्ष्यै नमः।
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ॐ दुर्गायै नमः।
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ॐ अन्नपूर्णायै नमः।
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ॐ भ्रामर्यै नमः।
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ॐ भवानीyai नमः।
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ॐ त्रिनेत्रायै नमः।
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ॐ अंबिकायै नमः।
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ॐ पार्वत्यै नमः।
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ॐ महेश्वर्यै नमः।
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ॐ कात्यायन्यै नमः।
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ॐ चामुण्डायै नमः।
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ॐ शाकेश्वरप्रियायै नमः।
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ॐ शताक्षी रूपिण्यै नमः।
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ॐ फलप्रदायै नमः।
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ॐ शाकदायै नमः।
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ॐ जीवनदायै नमः।
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ॐ दुर्गघनघ्न्यै नमः।
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ॐ शिवप्रियायै नमः।
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ॐ शक्ति रूपिण्यै नमः।
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ॐ त्रैलोक्य रक्षिण्यै नमः।
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ॐ महाशक्त्यै नमः।
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ॐ अन्नदायै नमः।
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ॐ भूषणप्रियायै नमः।
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ॐ भक्तवत्सलायै नमः।
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ॐ करुणामय्यै नमः।
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ॐ जयायै नमः।
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ॐ मातृ रूपिण्यै नमः।
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ॐ महालक्ष्म्यै नमः।
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ॐ महामायायै नमः।
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ॐ सर्वज्ञायै नमः।
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ॐ सर्वरक्षिण्यै नमः।
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ॐ शरणागतवत्सलायै नमः।
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ॐ पर्वतवसिन्यै नमः।
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ॐ सहारनपुरवासिन्यै नमः।
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ॐ योगमायायै नमः।
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ॐ विश्वम्भर्यै नमः।
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ॐ चंडिकायै नमः।
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ॐ कालरात्र्यै नमः।
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ॐ भीमायै नमः।
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ॐ आदिशक्त्यै नमः।
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ॐ शंभवीyai नमः।
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ॐ भूरादेव संगिन्यै नमः।
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ॐ शाकेश्वरनाथ प्रियाyai नमः।
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ॐ लोकमातृयै नमः।
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ॐ जीवनेश्वर्यै नमः।
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ॐ दुःखहन्त्र्यै नमः।
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ॐ सुखप्रदायै नमः।
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ॐ मोक्षप्रदायै नमः।
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ॐ जयशक्त्यै नमः।
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ॐ शाकम्भर्यै नमः।
... (आदि, 108 नामों तक “नमः” के साथ उच्चारण किया जाता है)
पाठ का महत्व
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माँ शाकम्भरी देवी की आरती, चालीसा और नामावली का पाठ अन्न, धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है।
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विशेषकर शाकम्भरी पूर्णिमा, नवरात्रि, या रविवार के दिन इस पाठ का विशेष महत्व है।
माँ शाकम्भरी देवी का प्रसिद्ध मेला (Shakambhari Devi Mela, Saharanpur)
माँ शाकम्भरी देवी मेला का परिचय
माँ शाकम्भरी देवी का मेला उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में स्थित शाकम्भरी देवी शक्तिपीठ में हर वर्ष बड़े धूमधाम से आयोजित किया जाता है।
यह मेला आश्विन नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि के समय लगता है — यानी साल में दो बार।
नवरात्रि के नौ दिनों तक यहाँ लाखों श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं।
माँ शाकम्भरी देवी का यह मेला आस्था, भक्ति और लोक संस्कृति का अद्भुत संगम होता है।
माँ शाकम्भरी देवी मेले की पौराणिक मान्यता
किंवदंती है कि जब प्राचीन काल में पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा, तब देवी ने स्वयं अपने शरीर से फल, फूल, अन्न और शाक (सब्जियाँ) उत्पन्न कर मनुष्यों और जीव-जंतुओं की भूख मिटाई।
उसी स्मृति में हर वर्ष यह मेला आयोजित किया जाता है — ताकि लोग माता के “अन्नपूर्णा स्वरूप” को नमन कर सकें।
मेले का समय (Mela Timing)
माँ शाकम्भरी देवी का मेला दो प्रमुख अवसरों पर लगता है —
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चैत्र नवरात्रि मेला: मार्च–अप्रैल के महीनों में
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आश्विन नवरात्रि मेला: सितंबर–अक्टूबर के महीनों में
दोनों मेलों में लाखों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं।
विशेष रूप से अष्टमी और नवमी के दिन सबसे अधिक भीड़ रहती है।
मेला स्थल का वातावरण
मेला स्थल प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर है —
चारों ओर हरियाली, पहाड़ों की पृष्ठभूमि, और माँ शाकम्भरी देवी के दरबार में गूंजते “जय माता दी” के जयकारे।
सारा क्षेत्र दिव्य वातावरण से भर जाता है।
मेले की प्रमुख गतिविधियाँ
1. देवी दर्शन और पूजा:
श्रद्धालु सुबह से लाइन में लगकर माता के दर्शन करते हैं।
फल, फूल, नारियल और शाक (सब्जियाँ) अर्पित करते हैं।
2. भूरादेव और शाकेश्वर महादेव के दर्शन:
मान्यता है कि माता के दर्शन से पहले भूरादेव के दर्शन करना आवश्यक है।
इसके बाद शाकेश्वर महादेव का जलाभिषेक किया जाता है।
3. भक्ति संगीत और झांकियाँ:
मेले के दौरान माँ की भव्य झांकियाँ, भजन संध्याएँ और कीर्तन आयोजित किए जाते हैं।
लोक कलाकार देवी की महिमा का वर्णन करते हैं।
4. सांस्कृतिक आकर्षण:
स्थानीय लोक नृत्य, गीत, मेले में झूले, मिठाइयाँ, और पारंपरिक वस्तुएँ सजाई जाती हैं।
यह न केवल धार्मिक मेला है बल्कि ग्रामीण संस्कृति का उत्सव भी है।
श्रद्धालुओं की संख्या और श्रद्धा
हर वर्ष लाखों भक्त यहाँ पहुँचते हैं —
उत्तर प्रदेश, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, राजस्थान और दिल्ली से श्रद्धालु आते हैं।
कई लोग नंगे पैर या “कांवड़ यात्रा” की तरह माँ के दरबार तक पैदल यात्रा करते हैं।
विशेष धार्मिक नियम और परंपराएँ
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भक्त अपने साथ फल, फूल, और शाक-भाजी लेकर आते हैं।
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माता के दर्शन के बाद उसे प्रसाद के रूप में वितरित करते हैं।
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मेला क्षेत्र में माँ शाकम्भरी देवी की आरती और भूरादेव पूजा विशेष महत्व रखती है।
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नवरात्रि के अंतिम दिन भंडारा और कन्या पूजन आयोजित किया जाता है।
कैसे पहुंचे (पहुंचने का मार्ग संक्षेप में)
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सहारनपुर से शाकम्भरी देवी मंदिर लगभग 22 किलोमीटर दूर है।
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सड़क मार्ग से कार, बस या ऑटो द्वारा लगभग 45 मिनट में पहुंचा जा सकता है।
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निकटतम रेलवे स्टेशन — सहारनपुर जंक्शन
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निकटतम हवाई अड्डा — जॉली ग्रांट एयरपोर्ट (देहरादून)
माँ शाकम्भरी मेला का महत्व
यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि कृतज्ञता का पर्व है।
यह हमें याद दिलाता है कि प्रकृति और देवी माँ ने हमें अन्न, जल, और जीवन दिया है।
माँ शाकम्भरी के इस मेले में शामिल होना आत्मिक शांति और आशीर्वाद पाने का सबसे बड़ा अवसर माना जाता है।
एक पंक्ति में सारांश:
“माँ शाकम्भरी देवी का मेला — भक्ति, प्रकृति और कृतज्ञता का संगम है।”
नौ देवी यात्रा में माँ शाकम्भरी देवी (Shakambhari Devi in Nav Devi Yatra)
नौ देवी यात्रा क्या है?
उत्तर भारत में विशेष रूप से नवरात्रि के अवसर पर भक्तजन “नौ देवी यात्रा” करते हैं।
इस यात्रा में भक्त माता दुर्गा के नौ रूपों —
शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री —
की पूजा-यात्रा करते हैं।
कुछ भक्त इसे “नौ शक्तिपीठ यात्रा” या “नौ देवी तीर्थ यात्रा” के रूप में करते हैं,
जिसमें भारत के प्रमुख शक्तिपीठों और सिद्धपीठों की यात्रा शामिल होती है।
नौ देवी यात्रा में शाकम्भरी देवी का स्थान
माँ शाकम्भरी देवी को माँ दुर्गा का अन्नपूर्णा स्वरूप माना गया है।
इसलिए कई क्षेत्रों में नौ देवी यात्रा में उनका दर्शन करना अत्यंत आवश्यक और शुभ माना जाता है।
माँ शाकम्भरी देवी का शक्तिपीठ सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) में स्थित है।
यह शक्तिपीठ “भोजन देने वाली माता” के रूप में प्रसिद्ध है।
नौ देवी यात्रा में यह छठा या सातवां तीर्थ स्थान माना जाता है — यह क्रम क्षेत्र के अनुसार बदलता है।
नौ देवी यात्रा का क्रम (उत्तर भारत के शक्तिपीठों के अनुसार)
उत्तर भारत में की जाने वाली पारंपरिक नौ देवी यात्रा के प्रमुख तीर्थ इस प्रकार माने जाते हैं:
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वैष्णो देवी – जम्मू
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चिंतपूर्णी देवी – हिमाचल प्रदेश
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नैना देवी – बिलासपुर, हिमाचल
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ज्वालामुखी देवी – कांगड़ा, हिमाचल
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कांगड़ा देवी (बृजेश्वरी) – कांगड़ा, हिमाचल
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मां शाकम्भरी देवी – सहारनपुर, उत्तर प्रदेश
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मां कालिका देवी – कालका, हरियाणा
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मां मनसा देवी – हरिद्वार, उत्तराखंड
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मां कामाख्या देवी – गुवाहाटी, असम (कभी-कभी यात्रा का प्रतीकात्मक समापन यहाँ होता है)
इनमें से शाकम्भरी देवी का स्थान उत्तर भारत की मध्य देवी के रूप में आता है —
जो भक्ति यात्रा को शक्ति से पोषण की ओर मोड़ देती हैं।
भक्तों की श्रद्धा और अनुभव
नौ देवी यात्रा में माँ शाकम्भरी के दर्शन को
“भोजन, जीवन और शक्ति की कृपा”
का आशीर्वाद माना जाता है।
भक्त माता को फल, शाक और अन्न अर्पित करते हैं।
कई श्रद्धालु यहाँ से शाक-प्रसाद लेकर अन्य देवी स्थलों पर भी जाते हैं,
जिसे “शाकम्भरी प्रसाद यात्रा” कहा जाता है।
नौ देवी यात्रा का आध्यात्मिक संदेश
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माँ शाकम्भरी यह सिखाती हैं कि शक्ति केवल विनाश नहीं, सृजन का भी रूप है।
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वे हमें प्रकृति, भोजन और जल का सम्मान करना सिखाती हैं।
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उनका आशीर्वाद “जीवित रहने की शक्ति” देता है।
“नौ देवी यात्रा में माँ शाकम्भरी देवी वह देवी हैं,
जो भूखे संसार को अन्न और जीवों को जीवन देती हैं।”
नौ देवी यात्रा – भारत के नौ प्रमुख शक्तिपीठों की अद्भुत कथा और महत्व
परिचय
भारत देवी-उपासना की भूमि है। यहाँ हर पर्वत, नदी और वन में शक्ति का वास माना गया है।
नवरात्रि के अवसर पर भक्त नौ देवी यात्रा (Nav Devi Yatra) करते हैं —
जो माँ दुर्गा के नौ स्वरूपों और नौ प्रमुख शक्तिपीठों के दर्शन की यात्रा मानी जाती है।
यह यात्रा केवल एक धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि भक्ति, आत्म-शक्ति और जीवन के नव चरणों का प्रतीक है।
आइए जानते हैं भारत के उन नौ प्रमुख शक्तिपीठों के बारे में जहाँ हर भक्त एक बार अवश्य जाना चाहता है।
नौ देवी यात्रा का धार्मिक महत्व
नौ देवी यात्रा का आरंभ नवरात्रि से होता है।
कहा जाता है कि जो भक्त इन नौ देवियों के दर्शन करता है,
उसे सभी प्रकार के भय, रोग, दरिद्रता और दुःखों से मुक्ति मिलती है।
इन नौ शक्तिपीठों में माता के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा होती है —
कहीं वे युद्ध की देवी हैं, कहीं करुणा की, और कहीं पालनहार अन्नपूर्णा।
भारत के नौ प्रमुख शक्तिपीठ (Nav Devi Temples of India)
1. वैष्णो देवी (Vaishno Devi Temple, जम्मू-कश्मीर)
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स्थान: त्रिकुट पर्वत, कटरा (जम्मू)
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देवी का स्वरूप: माँ वैष्णो देवी, त्रिकुटा माता
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मान्यता: यहाँ माता के तीन रूप — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — एक साथ पूजे जाते हैं।
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विशेषता: यह तीर्थ नौ देवी यात्रा की पहली देवी मानी जाती है।
लाखों श्रद्धालु “जय माता दी” के जयकारों के साथ गुफा तक पहुँचते हैं।
2. नैना देवी (Naina Devi Temple, हिमाचल प्रदेश)
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स्थान: बिलासपुर ज़िला, गोबिंदसागर झील के पास
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देवी का स्वरूप: माँ नैना देवी (सती की आँखें यहाँ गिरी थीं)
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विशेषता: यहाँ माता को दृष्टि और ज्ञान की देवी कहा जाता है।
नौ देवी यात्रा में यह दूसरा पड़ाव माना जाता है।
3. चिंतपूर्णी देवी (Chintpurni Devi Temple, हिमाचल प्रदेश)
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स्थान: ऊना ज़िला, हिमाचल प्रदेश
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देवी का स्वरूप: माँ चिंतपूर्णी (चिंताओं का नाश करने वाली)
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मान्यता: कहा जाता है जो भी सच्चे मन से यहाँ मनोकामना माँगता है, उसकी हर चिंता समाप्त हो जाती है।
4. ज्वालामुखी देवी (Jwalamukhi Temple, कांगड़ा, हिमाचल
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देवी का स्वरूप: ज्वालामुखी माता — अग्निरूपिणी
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विशेषता: यहाँ माता की मूर्ति नहीं, बल्कि ज्वाला (अग्नि) स्वयं प्रकट होती है।
यह भारत के सबसे प्राचीन शक्तिपीठों में से एक है।
5. कांगड़ा देवी (Brajeshwari Devi Temple, कांगड़ा)
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स्थान: कांगड़ा नगर, हिमाचल प्रदेश
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देवी का स्वरूप: माँ बृजेश्वरी (महाशक्ति)
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मान्यता: यहाँ सती का वक्षस्थल गिरा था।
यह शक्तिपीठ शक्ति और समृद्धि दोनों का प्रतीक है।
6. शाकम्भरी देवी (Shakambhari Devi Temple, सहारनपुर, उत्तर प्रदेश)
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स्थान: शिवालिक पर्वत, सहारनपुर (उत्तर प्रदेश)
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देवी का स्वरूप: माँ शाकम्भरी (अन्नपूर्णा और शताक्षी रूप)
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विशेषता: जब धरती पर अकाल पड़ा, तब देवी ने अपने शरीर से शाक, फल और अन्न उत्पन्न कर संसार का पालन किया।
इसीलिए उन्हें “भोजन और जीवन देने वाली देवी” कहा जाता है। -
नौ देवी यात्रा में स्थान: मध्य (छठा स्थान) — जीवन और पोषण की देवी के रूप में।
7. मनसा देवी (Mansa Devi Temple, हरिद्वार, उत्तराखंड)
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स्थान: बिल्व पर्वत, हरिद्वार
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देवी का स्वरूप: माँ मनसा — मनोकामना पूर्ण करने वाली
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मान्यता: यहाँ माता हर भक्त की इच्छा पूरी करती हैं।
हरिद्वार यात्रा के दौरान यह शक्तिपीठ अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
8. कालका देवी (Kalka Devi Temple, हरियाणा)
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स्थान: पंचकुला ज़िला, हरियाणा
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देवी का स्वरूप: माँ कालिका — महाकाली का रूप
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विशेषता: यहाँ माता को नवदुर्गा का आठवां रूप माना गया है।
यह स्थल हिमाचल और हरियाणा की सीमा पर स्थित है।
9. कामाख्या देवी (Kamakhya Devi Temple, असम)
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स्थान: नीलांचल पर्वत, गुवाहाटी (असम)
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देवी का स्वरूप: माँ कामाख्या — सृष्टि की ऊर्जा का स्रोत
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मान्यता: यह मंदिर देवी के योनि भाग के गिरने के स्थान पर बना है।
यहाँ “अंबुवाची मेला” प्रसिद्ध है। -
नौ देवी यात्रा का समापन: यहीं पर देवी की शक्ति और सृष्टि की एकता का अनुभव प्राप्त होता है।
नौ देवी यात्रा का आध्यात्मिक अर्थ
यह यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्ग है —
हर देवी शक्ति के एक पहलू का प्रतिनिधित्व करती हैं
1️. शक्ति का उदय
2️. तपस्या
3️. साहस
4️. ज्ञान
5️. करुणा
6️. पालन
7️. इच्छा
8️. न्याय
9️. सृष्टि
इस प्रकार यह यात्रा हमें शक्ति से शांति तक ले जाती है।
नौ देवी यात्रा कैसे करें
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यात्रा आरंभ करने से पहले माँ दुर्गा की पूजा करें।
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हर शक्तिपीठ में माता के नाम से दीपक जलाएं।
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हर देवी से अलग-अलग वरदान माँगें — शक्ति, बुद्धि, धन, ज्ञान और करुणा।
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यात्रा पूर्ण होने पर “दुर्गा सप्तशती” या “देवी माहात्म्य” का पाठ करें।
निष्कर्ष
नौ देवी यात्रा केवल मंदिर-दर्शन नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति की यात्रा है।
इस यात्रा में माँ शाकम्भरी देवी का स्थान विशेष है —
क्योंकि वे हमें याद दिलाती हैं कि भक्ति तभी पूर्ण होती है जब हम जीवन और प्रकृति का सम्मान करें।
एक पंक्ति में सारांश:
“नौ देवी यात्रा वह मार्ग है जहाँ हर देवी जीवन के एक नए सत्य की शिक्षा देती है —
और माँ शाकम्भरी हमें अन्न, जल और करुणा का महत्व सिखाती हैं।”
शाकम्भरी देवी मंदिर, राजस्थान (Shakambhari Devi Temple, Sikar, Rajasthan)
परिचय
राजस्थान के सीकर ज़िले में स्थित शाकम्भरी देवी मंदिर देवी के अन्नपूर्णा और शताक्षी रूप का प्रमुख केंद्र है।
यह मंदिर संभर झील (Sambhar Lake) के पास संभर नगर में स्थित है।
यहाँ माता शाकम्भरी को अन्न की देवी और जीवन की पालनहार के रूप में पूजा जाता है।
कहा जाता है कि जब धरती पर 100 वर्षों तक अकाल पड़ा, तब देवी ने अपने शरीर से
शाक (सब्जियाँ), फल और अनाज उत्पन्न किए और मानवता को जीवन दिया।
इसलिए उनका नाम पड़ा — शाकम्भरी, अर्थात् शाक (सब्जी) से अन्न देने वाली देवी।
मंदिर का इतिहास (History of Shakambhari Temple)
संभल झील के किनारे यह मंदिर लगभग 1000 वर्षों से भी अधिक पुराना माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार —
एक समय पृथ्वी पर अकाल और अनावृष्टि से त्राहि-त्राहि मच गई थी।
तब देवी भगवती ने शाकम्भरी रूप धारण किया और अपने शरीर से अन्न उपजाकर
सभी जीवों को जीवनदान दिया।
कहा जाता है कि यहाँ पर माँ सती का नेत्र भाग गिरा था,
इसी कारण यह स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
मंदिर का निर्माण प्राचीन राजपूत काल में हुआ और
बाद में चौहान वंश के राजाओं ने इसका पुनर्निर्माण कराया।
संभर झील से संबंध (Connection with Sambhar Lake)
संभर झील भारत की सबसे बड़ी खारे पानी की झील है,
और इसे माँ शाकम्भरी देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है।
स्थानीय मान्यता है कि झील का जल देवी के आँसुओं से बना था —
जब उन्होंने मानवता की दुर्दशा देखी तो शताक्षी (सौ आँखों वाली) बनकर करुणा के आँसू बहाए,
और वहीं यह विशाल झील निर्मित हो गई।
मंदिर की वास्तुकला (Architecture)
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मंदिर पहाड़ी के ऊपर स्थित है, जिसके लिए लगभग 200 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।
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मंदिर में तीन मुख्य गर्भगृह हैं –
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मुख्य देवी शाकम्भरी माता,
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भैरव देव,
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हनुमान जी और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियाँ।
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मंदिर का निर्माण राजस्थानी शैली में लाल बलुआ पत्थर से हुआ है।
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गर्भगृह में माता की मूर्ति नीलवर्ण (नीले रंग) की है, जो उनके शाक-फल रूप को दर्शाती है।
धार्मिक महत्व (Religious Significance)
माँ शाकम्भरी देवी को अन्नपूर्णा का अवतार माना जाता है।
कहा जाता है —
“माँ शाकम्भरी बिना अन्न के जीवन की कल्पना भी असंभव है।”
भक्त मानते हैं कि जो भी व्यक्ति यहाँ सच्चे मन से प्रार्थना करता है,
उसे भोजन, धन, संतान और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
शाकम्भरी देवी मेला (Shakambhari Devi Fair)
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हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक यहाँ भव्य मेला आयोजित होता है।
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हजारों की संख्या में राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भक्त आते हैं।
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मेले में भक्ति गीत, कीर्तन, झांकी, भंडारा और माँ की शोभायात्रा का आयोजन होता है।
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विशेषकर नवरात्रि के समय यहाँ अखण्ड ज्योति जलाई जाती है।
कैसे पहुंचे (How to Reach Shakambhari Devi Temple)
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निकटतम शहर: जयपुर (लगभग 80 किमी दूर)
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रेल मार्ग: संभर रेलवे स्टेशन (5 किमी)
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वायु मार्ग: जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट (85 किमी)
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सड़क मार्ग: जयपुर, अजमेर और सीकर से बसें और टैक्सी उपलब्ध हैं।
जयपुर से सीधा मार्ग:
जयपुर → बगरू → दूदू → संभर झील → शाकम्भरी माता मंदिर
दर्शन समय (Temple Timings)
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सुबह: 5:00 बजे से 12:00 बजे तक
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शाम: 4:00 बजे से 9:00 बजे तक
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आरती:
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मंगल आरती: सुबह 5:30 बजे
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शाम की आरती: सूर्यास्त के समय
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निष्कर्ष
राजस्थान का यह शाकम्भरी शक्तिपीठ केवल एक मंदिर नहीं —
बल्कि देवी माँ के उस करुणामय रूप की याद दिलाता है जिसने भूखे संसार को अन्न से तृप्त किया।
संभर झील की ठंडी हवाएँ और मंदिर की घंटियों की ध्वनि मिलकर भक्त को आत्मिक शांति का अनुभव कराती हैं।
“माँ शाकम्भरी का आशीर्वाद वही पाता है जो जीवन, अन्न और प्रकृति का सम्मान करता है।”
प्रश्न 1: शाकम्भरी देवी मंदिर कहाँ स्थित है?
शाकम्भरी देवी मंदिर राजस्थान के सीकर ज़िले में, संभर झील के पास स्थित है। यह मंदिर संभर नगर से लगभग 5 किलोमीटर और जयपुर से लगभग 80 किलोमीटर दूर है।
प्रश्न 2: शाकम्भरी देवी कौन हैं?
माँ शाकम्भरी देवी को देवी दुर्गा का अन्नपूर्णा रूप माना जाता है। जब पृथ्वी पर भयंकर अकाल पड़ा, तब उन्होंने अपने शरीर से फल, फूल और शाक उत्पन्न कर संसार का पालन किया।
प्रश्न 3: शाकम्भरी देवी मंदिर का इतिहास क्या है?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ सती के नेत्र गिरे थे। माँ शाकम्भरी ने इसी स्थान पर अन्न और जीवन प्रदान किया, इसलिए यह स्थान शक्तिपीठ कहलाया।
प्रश्न 4: शाकम्भरी देवी मंदिर कैसे पहुँचा जा सकता है?
जयपुर से बगरू, दूदू होते हुए संभर झील मार्ग से शाकम्भरी मंदिर पहुँचा जा सकता है।
निकटतम रेलवे स्टेशन — संभर रोड स्टेशन
निकटतम एयरपोर्ट — जयपुर इंटरनेशनल एयरपोर्ट
प्रश्न 5: शाकम्भरी देवी मेला कब लगता है?
हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक यहाँ भव्य मेला लगता है।
नवरात्रि के दौरान भी लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन के लिए आते हैं।
प्रश्न 6: शाकम्भरी देवी मंदिर का दर्शन समय क्या है?
मंदिर सुबह 5:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक और शाम 4:00 बजे से रात 9:00 बजे तक खुला रहता है।
मंगल आरती सुबह 5:30 बजे और शाम की आरती सूर्यास्त के समय होती है।
Shakambhari Devi
October 27 2025