नरसी मेहता

नरसी मेहता जी के बारे मेंं

नरसी मेहता

नरसी मेहता

(नरसिंह मेहता)

जन्म स्थान गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जूनागढ़ के निकट तलाजा नामक छोटे ग्राम
निवास स्थान गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जूनागढ़ के निकट तलाजा नामक छोटे ग्राम
पिता कृष्णदामोदर
माता लक्ष्मीगौरी
भाई वंशीधर
वैवाहिक हि. विवाहित
जीवनसंगी माणिकबाई
बच्चे पुत्र: शामलदास, पुत्री: कुंवरबाई (नानी बाई)
पेशा महान कृष्ण भक्त
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू

नरसी भगत की जीवनी–

नरसी मेहता गुजराती भक्ति साहित्य के आदि कवि और महान कृष्ण भक्त थे। उनका जीवन किंवदंतियों, चमत्कारों और गहन भक्ति से भरा पड़ा है। उनकी प्रसिद्धि मुख्य रूप से भजन "वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे" से है, जिसे महात्मा गांधी का प्रिय भजन माना जाता है।
उनकी जीवनी पर आधारित जानकारी मुख्य रूप से लोक कथाओं, भक्तमाल, गुजराती साहित्य के ग्रंथों और परंपरागत किंवदंतियों से आती है। ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, इसलिए जीवन चरित्र में कई चमत्कारिक प्रसंग शामिल हैं।


जन्म और प्रारंभिक जीवन–

नरसी मेहता (पूर्ण नाम: नरसिंह मेहता) का जन्म 1414 ईस्वी (लगभग विक्रम संवत 1471) में गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जूनागढ़ के निकट तलाजा नामक छोटे ग्राम में हुआ था। कुछ स्रोतों में जन्म स्थान भावनगर के पास तलाजा बताया जाता है। वे नागर ब्राह्मण वंश से थे, जो वडनगर से संबंधित कुलीन ब्राह्मण समुदाय था।


उनके पिता का नाम कृष्णदामोदर (या कृष्णदास) और माता का नाम लक्ष्मीगौरी या दयाकुंवर था। बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो गया, इसलिए वे बड़े भाई वंशीधर (या वंशधर) और भाभी के साथ रहने लगे। बाल्यकाल कष्टमय रहा क्योंकि वे उद्यमहीन थे और साधु-संतों के संग में अधिक समय बिताते थे।


एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, नरसी आठ वर्ष तक गूंगे रहे। उनकी दादी उन्हें एक सिद्ध कृष्ण भक्त महात्मा के पास ले गईं। महात्मा ने बालक को देखते ही भविष्यवाणी की कि यह बालक बड़ा भक्त बनेगा। उन्होंने नरसी के कान में कुछ मंत्र जपे और वरदान दिया, जिससे उनकी वाणी खुल गई। इस घटना ने उनके जीवन में भक्ति की नींव रखी।


युवावस्था और गृहस्थ जीवन–

युवावस्था में नरसी साधु-संग में अधिक रुचि रखते थे। वे उद्यम नहीं करते थे, जिस कारण भाभी से कटु वचन सुनने पड़ते थे। एक दिन भाभी की कड़ी बातों से व्यथित होकर वे घर छोड़कर जंगल चले गए। वहाँ भगवान शिव के मंदिर में सात दिन उपवास करके प्रार्थना की। कुछ कथाओं में कहा जाता है कि वे पहले शैव थे, लेकिन बाद में कृष्ण भक्ति में लीन हो गए।


उनका विवाह माणिकबाई से हुआ। इस दंपति को दो संतानें हुईं – पुत्री कुंवरबाई (या कुँवर बाई) और पुत्र शामलदास। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। नरसी दिन-रात भजन-कीर्तन में लीन रहते, जिससे घर की स्थिति और खराब होती गई।


भक्ति यात्रा और प्रमुख चमत्कारिक कथाएँ–

नरसी मेहता का जीवन भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्ति से भरा है। वे रात-दिन कीर्तन करते, सभी जातियों के लोगों को साथ बैठाकर भजन गाते। इससे उच्च वर्ण के लोग उनसे नाराज रहते थे।


रात में कीर्तन और भगवान का साक्षात्कार–

एक प्रसिद्ध कथा है कि नरसी रात में जंगल में या मंदिर में कीर्तन करते। एक बार भगवान श्रीकृष्ण स्वयं उनके कीर्तन में शामिल हुए। नरसी को पता चला तो वे भाव-विभोर हो गए। भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वे उनके साथ रहेंगे।

पुत्री कुंवरबाई का विवाह–

कुंवरबाई का विवाह तय हुआ, लेकिन आर्थिक स्थिति खराब होने से दहेज और विवाह व्यवस्था नहीं हो पा रही थी। नरसी ने भगवान पर भरोसा रखा। विवाह के दिन भगवान श्रीकृष्ण साक्षात् वर के रूप में आए और विवाह संपन्न कराया। सारे लोग चकित रह गए। यह कथा उनकी भक्ति की महिमा दर्शाती है।

पुत्र शामलदास की मृत्यु और पुनर्जीवन–

पुत्र शामलदास की असामयिक मृत्यु हो गई। नरसी ने शोक में भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने पुत्र को पुनर्जीवित किया। कुछ कथाओं में शामलदास का विवाह भी चमत्कार से संपन्न हुआ।

सुदामा चरित और अन्य प्रसंग–

नरसी ने सुदामा की भक्ति से प्रेरित होकर "सुदामा चरित" लिखा। वे स्वयं को सुदामा जैसा मानते थे और भगवान को अपना सखा। एक कथा में भगवान उनके घर आए और गरीबी दूर की।

वैष्णव जन तो... भजन की रचना–
नरसी का सबसे प्रसिद्ध भजन है –
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे।
इस भजन में उन्होंने वैष्णव के लक्षण बताए – पराई पीड़ा को अपनी पीड़ा समझना, दूसरों की मदद करना, विनम्र होना आदि। यह भजन गुजरात में आज भी लोकप्रिय है और महात्मा गांधी इसे अपना आदर्श मानते थे।

साहित्यिक योगदान–

नरसी मेहता को गुजराती साहित्य का आदि कवि माना जाता है। उन्होंने पद (भजन) लिखे जो भावपूर्ण कृष्ण भक्ति से भरे हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ:
सुदामा चरित
गोविंद गमन
श्रृंगार माला
चातुरियो
सुरत संग्राम
वंसतना पदो
कृष्ण जन्मना पदो


उनके पदों में जयदेव, नामदेव, रामानंद और मीरा का उल्लेख मिलता है, जो भक्ति आंदोलन की एकता दर्शाता है। गुजराती साहित्य में उन्हें सूरदास जैसा स्थान प्राप्त है। उनके भजन भावुक, सरल और जनसुलभ हैं।


सामाजिक प्रभाव और अस्पृश्यता विरोध

नरसी सभी जातियों के साथ कीर्तन करते थे। अस्पृश्यों के घर भी जाते थे। इससे उच्च वर्ण के लोग उनसे नाराज थे, लेकिन उनकी भक्ति इतनी प्रबल थी कि लोग उनके पास आकर्षित होते थे। उन्होंने वैष्णव धर्म के उदार रूप को प्रतिपादित किया – भक्ति में कोई भेदभाव नहीं।

अंतिम वर्ष और अवसान–

नरसी मेहता का अवसान 1480 ईस्वी के आसपास माना जाता है। कुछ स्रोतों में 1481 बताया जाता है। अंतिम समय में वे पूर्ण रूप से भगवान में लीन थे। कथा है कि मृत्यु के समय भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गोद में लेकर बैकुंठ धाम ले गए।


नरसी मेहता का आज का महत्व–

गुजरात में उनकी जयंती 19 दिसंबर को भव्य रूप से मनाई जाती है।
उनका भजन "वैष्णव जन" राष्ट्रगान जैसा महत्व रखता है।
वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ हैं, जिन्होंने प्रेम, करुणा और समानता का संदेश दिया।
गुजराती साहित्य में नरसिंह-मीरा युग उनके नाम से जाना जाता है।

नरसी मेहता का जीवन संदेश है –

सच्ची भक्ति में धन, जाति, पद की कोई महत्व नहीं। केवल प्रेम और समर्पण से भगवान प्राप्त होते हैं। उनका जीवन आज भी लाखों लोगों को प्रेरित करता है।

कुंवरबाई विवाह कथा विस्तारकुंवरबाई विवाह कथा–

नरसी मेहता (नरसिंह मेहता) के जीवन की सबसे प्रसिद्ध और चमत्कारिक कथाओं में से एक है। यह कथा उनकी अनन्य भक्ति, भगवान श्रीकृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण और भगवान द्वारा भक्त की रक्षा करने की महिमा को दर्शाती है। यह घटना मुख्य रूप से कुंवरबाई के विवाह के समय की नहीं, बल्कि कुंवरबाई की पुत्री (नरसी की नातिन) के विवाह या कुंवरबाई के गर्भावस्था के समय होने वाले मामेरु (मायरा/भात) संस्कार से जुड़ी है, लेकिन लोक परंपरा में इसे अक्सर "कुंवरबाई का विवाह" या "नरसी की बेटी की शादी" के रूप में जाना जाता है।


यह कथा गुजराती साहित्य में "कुंवरबाई नु मामेरु" नामक पद्य रचना में नरसी मेहता ने स्वयं वर्णित की है, जो उनकी आत्मकथात्मक रचना है। आइए इस कथा को विस्तार से समझते हैं, लोक कथाओं, भक्तमाल और परंपरागत वर्णनों के आधार पर।

पृष्ठभूमि–

नरसी मेहता भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे। वे दिन-रात कीर्तन, भजन और साधु-संग में लीन रहते थे। घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी क्योंकि वे धन कमाने या व्यापार करने में रुचि नहीं रखते थे। उनकी पत्नी माणिकबाई से दो संतानें हुईं – पुत्र शामलदास और पुत्री कुंवरबाई (कुंवरि बाई या नानी बाई के नाम से भी जानी जाती हैं)।

कुंवरबाई का विवाह अंजार (कच्छ क्षेत्र, गुजरात) के एक धनी और प्रतिष्ठित ब्राह्मण परिवार में श्रीरंग (या श्रीरंग सेठ) के पुत्र से हुआ था। श्रीरंग का परिवार संपन्न था, उनका भंडार धन-धान्य से भरा हुआ था और वे साधु-भक्तों का सत्कार करते थे। विवाह धूमधाम से संपन्न हुआ, लेकिन नरसी की गरीबी के कारण ससुराल वाले उन्हें नीचा समझते थे।

मुख्य प्रसंग: मामेरु (मायरा/भात) संस्कार–

गुजराती और राजस्थानी परंपरा में लड़की के विवाह के बाद, जब वह पहली बार गर्भवती होती है, तो एक विशेष संस्कार होता है जिसे मामेरु, मायरा, भात या मामेरा कहते हैं। इसमें लड़की के मामा (मामा) या नाना (नानी के पति, यानी मामा) द्वारा लड़की को उपहार, वस्त्र, गहने, मिठाई, फल, कपड़े आदि भेजे जाते हैं। यह उपहार लड़की के ससुराल में उसकी इज्जत और मायके की शान बढ़ाता है।
कुंवरबाई गर्भवती हुईं। मामेरु का समय आया। कुंवरबाई के ससुराल वाले (श्रीरंग परिवार) ने नरसी मेहता को पत्र भेजा कि वे मामेरु अवश्य भेजें, अन्यथा बहू की इज्जत पर ठेस पहुँचेगी और समाज में हंसी होगी। पत्र में उपहारों की लंबी सूची लिखी गई – सोने-चाँदी के गहने, रेशमी वस्त्र, घोड़े, पालकी, मिठाइयाँ, फल, बर्तन आदि।


नरसी मेहता के पास तो एक भी पैसा नहीं था। वे बहुत चिंतित हुए। घर में कुछ भी नहीं था। लेकिन उनकी भक्ति अटल थी। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की –
"हे कान्हा! तू मेरे सखा है। मेरी बेटी की इज्जत बचाना। मैं निर्धन हूँ, लेकिन तेरा भक्त हूँ। तू ही मेरी सामर्थ्य है।"

भगवान श्रीकृष्ण का चमत्कार

नरसी मेहता ने मामेरु की तैयारी के लिए कुछ भी नहीं किया। विवाह के दिन (या मामेरु के दिन) ससुराल वाले इंतजार कर रहे थे। नरसी घर पर भजन गा रहे थे। अचानक शाम के समय एक साँवला सेठ (सुंदर, गोरा-काला रंग वाला व्यापारी) बैलगाड़ी पर सवार होकर नरसी के घर पहुँचा। उसके साथ ढेर सारे सामान लदे थे –

रेशमी साड़ियाँ, चुनरियाँ, जरीदार कपड़े
सोने-चाँदी के गहने, हीरे-मोती
मिठाइयाँ, फल, मेवे
घोड़े, पालकी, हाथी (कुछ कथाओं में)
बर्तन, वस्त्र, दहेज की सारी वस्तुएँ


सेठ ने नरसी से कहा –

"मैं द्वारिका से आया हूँ। तुम्हारे नाम से सामान लाया हूँ। यह सब तुम्हारी बेटी के लिए है।"
नरसी समझ गए कि यह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण हैं, जो सेठ का रूप धारण करके आए हैं। वे भाव-विभोर हो गए और रो पड़े। उन्होंने सेठ (भगवान) को प्रणाम किया।

भगवान ने कहा –

"नरसी! तू मेरे भक्त है। तेरी बेटी की इज्जत मैं खुद रखूँगा। यह सामान ले जाकर मामेरु पूरा कर।"

मामेरु की रस्म और चमत्कार का प्रभाव–

सारा सामान अंजार (ससुराल) भेज दिया गया। जब सामान पहुँचा तो श्रीरंग और पूरा परिवार चकित रह गया। इतना धन-धान्य, इतने कीमती उपहार उन्होंने कभी नहीं देखे थे। समाज में कुंवरबाई की इज्जत कई गुना बढ़ गई। लोग कहने लगे –

"नरसी गरीब हैं, लेकिन उनका मामेरु राजाओं जैसा है!"

कुछ कथाओं में यह प्रसंग कुंवरबाई की नातिन (पोती) सुलोचना के विवाह से जुड़ा बताया जाता है, जहाँ नानी बाई (कुंवरबाई) के ससुराल वालों ने नरसी को भात भरने के लिए बुलाया था, और भगवान ने फिर सेठ बनकर भात भरा। लेकिन मूल कथा कुंवरबाई नु मामेरु है, जो नरसी की रचना में वर्णित है।

नरसी मेहता की रचना से उद्धरण भाव

नरसी ने इस घटना पर कई पद रचे, जिनमें एक प्रसिद्ध है –

"मामेरु नु पदार्थ लाव्यो साँवरो सेठ
कृष्ण कन्हैया मेरो साँचो सखा रे..."
(अर्थ: साँवरे सेठ ने मामेरु का सामान लाया, कृष्ण कन्हैया मेरा सच्चा सखा है।)
यह पद आज भी गुजरात में गाया जाता है।
कथा का संदेश

भक्ति की शक्ति: सच्चा भक्त कभी निराश नहीं होता। भगवान स्वयं भक्त की रक्षा करते हैं।
समर्पण: नरसी ने चिंता नहीं की, बस प्रार्थना की। भगवान ने असंभव को संभव कर दिखाया।
ईश्वर की लीला: भगवान भक्त के लिए सेठ, सखा, सेवक – कोई भी रूप धारण कर सकते हैं।
समानता: धन-दौलत से ऊपर भक्ति है।

यह कथा गुजराती साहित्य, भक्ति परंपरा और फिल्मों (जैसे 1974 की गुजराती फिल्म "कुंवरबाई नु मामेरुन") में अमर है। आज भी गुजरात-राजस्थान में यह कथा सुनाई जाती है और भक्तों को विश्वास दिलाती है कि "जब तकरा साथ हरि का, फिर डर का क्या?"

यदि आप इस कथा पर आधारित नरसी जी के मूल पद, कोई विशेष संस्करण या इससे जुड़ी कोई और घटना (जैसे पुत्र शामलदास की शादी) सुनना चाहें, तो बताइए!Narsi ke liye bhajanनरसी मेहता (नरसिंह मेहता) के भजन मुख्य रूप से गुजराती भाषा में रचे गए हैं, लेकिन हिंदी में उनके कई भजन बहुत लोकप्रिय हैं, खासकर हिंदी रूपांतरण या अनुवादित/सरल रूप में। उनका सबसे प्रसिद्ध भजन "वैष्णव जन तो तैने कहिए" है, जो महात्मा गांधी का प्रिय भजन था और आज भी राष्ट्र स्तर पर गाया जाता है।

यहाँ नरसी जी के कुछ प्रमुख भजन हिंदी में (मूल गुजराती के भाव के साथ या हिंदी रूप में) दिए जा रहे हैं। मैं पूर्ण पद्य, अर्थ और प्रसंग भी बता रहा हूँ।

1. वैष्णव जन तो तैने कहिए (सबसे प्रसिद्ध भजन)–

यह भजन नरसी मेहता ने मूल रूप से गुजराती में लिखा था। हिंदी में इसका रूप बहुत प्रचलित है।
पूर्ण पद्य (हिंदी रूप में):
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे।
पर दुखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे॥
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे॥
सकल लोक मां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे।
वाच काछ मन निश्चळ राखे, धन धन जननी तेनी रे॥
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे॥
समदृष्टि ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे।
जिव्हा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाली हाथ रे॥
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे॥
मोह माया व्यापे नही जेने, दृढ़ वैराग्य जेना मन मां रे।
रामनाम शुं ताली लागी, सकल तीर्थ तेना तन मां रे॥
वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे॥
अर्थ (संक्षेप में):
सच्चा वैष्णव वही है जो दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा समझे, दूसरों के दुख में मदद करे, मन में अभिमान न लाए, सभी को समान देखे, निंदा न करे, मन-वाणी-कर्म से शुद्ध रहे, पराई स्त्री को माँ समान माने, झूठ न बोले, पराए धन की लालच न करे, मोह-माया से दूर रहे और राम-नाम में लीन रहे।
यह भजन भक्ति, करुणा, समानता और नैतिकता का सार है।

2. मामेरु/मायरा संबंधित भजन (कुंवरबाई प्रसंग से जुड़ा)–

नरसी जी ने अपनी पुत्री/नातिन के मामेरु प्रसंग पर कई पद रचे। एक प्रसिद्ध पंक्ति:
मामेरु नु पदार्थ लाव्यो साँवरो सेठ।
कृष्ण कन्हैया मेरो साँचो सखा रे॥
भाव: साँवरे सेठ (भगवान कृष्ण) ने मामेरु का सामान लाया, कृष्ण कन्हैया मेरा सच्चा सखा है।
एक और लोकप्रिय रूप (हिंदी में गाया जाने वाला):
नरसी की नैया नटनागर, अब तो पार लगाओ ना।
दिन दयालु दया का सागर, करुणा रस बरसाओ ना॥
श्याम राधे श्याम, श्याम राधे श्याम।
ना किसी का लेना रे देना, अब तो साथ निभाओ ना॥
प्रेम भक्ति को लियो आसरो, और कोई सहारो ना।
भक्तों की नैया नटनागर, अब तो पार लगाओ ना॥
भाव: नरसी की नाव (जीवन) को नटनागर (कृष्ण) पार लगाओ, दया करो, साथ निभाओ।

3. अन्य प्रसिद्ध भजन/पद (हिंदी भाव में)–

आँख मारी उघड़े त्या सीताराम देखु (गुजराती मूल, हिंदी में):
आँख खुलते ही सीताराम दिखें, ऐसा जीवन हो।
राम कहो श्री कृष्ण कहो (प्रसिद्ध एक):
राम कहो श्री कृष्ण कहो, दोनों में एक ही हैं।
गाये केदारो भक्त तारो (राग केदार में):
यह भजन नरसी जी की भक्ति में बहुत गहरा है, जहाँ वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि भक्त की रक्षा करो।

नरसी जी के भजन मुख्य रूप से कृष्ण लीला, सुदामा चरित, भक्ति का समर्पण, करुणा और वैराग्य पर आधारित हैं। उनके पद सरल, भावपूर्ण और जनसुलभ हैं।
सुनने के लिए सुझाव:

घणी दूर से दौड़्यो थारी गाडुली के लार रे...

यह भजन नरसी जी की पुकार को दर्शाता है – जब वे अपनी बेटी कुंवरबाई के मामेरु के लिए ससुराल (अंजार नगर) जा रहे थे, लेकिन गरीबी के कारण पुरानी गाड़ी, टूटे बैल और कोई सामान नहीं था। नरसी जी भगवान कृष्ण से प्रार्थना करते हैं कि उन्हें गाड़ी में बिठा लें, क्योंकि वे जानते हैं कि नगर अंजार दूर है।
भजन के मुख्य बोल (लोकप्रिय संस्करण, हिंदी/मारवाड़ी मिश्रित रूप में)
यह भजन विभिन्न गायकों के अनुसार थोड़ा अलग-अलग गाया जाता है, लेकिन मूल भाव यही है। जया किशोरी और अन्य संस्करणों से संकलित मुख्य पद्य:
घणी दूर से दौड़्यो थारी गाडुली के लार रे...
गाड़ी में बिठा ले रे बाबा, जानो है नगर अंजार॥
नरसी बोल्यो म्हारे सागे के करसी,
ओढ़न कपड़ा नाहीं, बैठ सियां मरसी॥
बूढ़ा बैल टूट्योड़ी गाड़ी, पैदल जावे हार रे...
गाड़ी में बिठा ले रे बाबा, जानो है नगर अंजार॥
ज्ञान दासजी कहवे गाडुली तोड़ेगा,
तूमड़ा फोड़ेगा, घणी भीड़ में टूट जावे॥
म्हारे ईकतारा रो तार रे...
गाड़ी में बिठा ले रे बाबा, जानो है नगर अंजार॥
नानी बाई रो भात देखबा चालूगो,
जोड़े जोड़े सामान लावेगी॥
(कुछ संस्करणों में आगे:)
श्याम सुंदर मेरो साँवरियो, ले चलो मुझको साथ रे...
गाड़ी में बिठा ले रे बाबा, जानो है नगर अंजार॥
अर्थ/भावार्थ (संक्षेप में):

दूर से दौड़ो मेरी गाड़ी के लिए, हे बाबा (कृष्ण)!

मुझे गाड़ी में बिठा लो, क्योंकि मैं जानता हूँ कि नगर अंजार (ससुराल) बहुत दूर है।
नरसी कहते हैं – मेरे सगे-संबंधी क्या करेंगे? मेरे पास न कपड़े हैं, न कुछ, बैठते ही मर जाऊँगा।
बूढ़ा बैल टूट रहा है, गाड़ी खराब है, पैदल चलकर थक जाऊँगा।
भजन में नरसी जी की गरीबी, भक्ति और भगवान पर पूर्ण विश्वास की झलक है। अंत में भगवान स्वयं सेठ बनकर मदद करते हैं (जैसा कि पहले कथा में बताया)।

प्रसिद्ध गायन संस्करण–

जया किशोरी जी – सबसे लोकप्रिय, Sanskar TV पर "गाडी में बिठा ले रे बाबा जानो है नगर अंजार" (YouTube पर करोड़ों व्यूज)।
अनिरुद्धाचार्य जी – "गाड़ी में बिठा ले रे बाबा"।
रमेश लोहिया – हाल के संस्करण में।
मूल गुजराती फिल्म "कुंवरबाई नु मामेरु" (1980s) में भी यह गाया गया है।

यह भजन नरसी जी की अनन्य भक्ति का प्रतीक है – गरीबी में भी वे भगवान को "बाबा" कहकर पुकारते हैं और भरोसा रखते हैं कि कृष्ण उन्हें अकेला नहीं छोड़ेंगे।
यदि आप पूरा वीडियो सुनना चाहें तो YouTube पर सर्च करें:

"गाडी में बिठा ले रे बाबा जया किशोरी"
या
"Ghani Dur Se Dodyo Thari Gaduli Ke Laar"


50 रोचक जानकारियाँ–

  1. नरसी मेहता को गुजराती साहित्य का आदि कवि (Adi Kavi) माना जाता है।
  2. उनका जन्म 1414 ईस्वी में गुजरात के तलाजा (भावनगर के पास) ग्राम में हुआ था।
  3. वे नागर ब्राह्मण वंश से थे, जो वडनगर से मूल रूप से संबंधित था
  4. बचपन में माता-पिता का देहांत हो गया, इसलिए वे दादी जयगौरी या जयकुंवर के साथ पले।
  5. वे 8 वर्ष तक गूंगे रहे – एक कृष्ण भक्त साधु ने "राधे श्याम" जप करवाकर उनकी वाणी खोली।
  6. साधु-संग उनका इतना व्यसन था कि वे काम-धंधा नहीं करते थे।
  7. भाभी की कटु बातों से तंग आकर उन्होंने घर छोड़ दिया।
  8. वे पहले शैव थे – गोपेश्वर शिव मंदिर में 7 दिन उपवास कर शिव के दर्शन पाए।
  9. शिव ने उन्हें रासलीला के दर्शन दिए, जिससे उनकी कृष्ण भक्ति जागृत हुई।
  10. उनका विवाह माणिकबाई से लगभग 1429 ईस्वी में हुआ।
  11. उन्हें दो संतानें हुईं – पुत्र शामलदास और पुत्री कुंवरबाई (नानी बाई)।
  12. शामलदास की असामयिक मृत्यु हुई, जिससे माणिकबाई शोक में चल बसीं।
  13. कुंवरबाई का विवाह अंजार (कच्छ) के श्रीरंग सेठ के पुत्र से हुआ।
  14. उनकी सबसे प्रसिद्ध कथा कुंवरबाई नु मामेरु है – भगवान कृष्ण साँवरे सेठ बनकर मामेरु का सामान लाए।
  15. वैष्णव जन तो तैने कहिए भजन महात्मा गांधी का सबसे प्रिय था।
  16. गांधीजी इसे अपनी प्रार्थना सभा में रोज गवाते थे।
  17. यह भजन सत्य, अहिंसा और करुणा का प्रतीक बना।
  18. नरसी ने 750 से अधिक पद (भजन) रचे।
  19. उनकी प्रमुख रचनाएँ: सुदामा चरित, गोविंद गमन, चातुरियो, सुरत संग्राम।
  20. वे सभी जातियों के साथ कीर्तन करते थे – अस्पृश्यों के घर भी जाते थे।
  21. उच्च वर्ण के लोग उनसे नाराज रहते थे, लेकिन उनकी भक्ति से प्रभावित होते थे।
  22. वे स्वयं को सुदामा जैसा मानते थे – कृष्ण को अपना सखा।
  23. एक कथा में भगवान ने उनकी गरीबी दूर करने के लिए घर आए।
  24. द्वारका में नरसी की हुंडी भगवान ने सेठ बनकर भरी – उनकी लाज रखी।
  25. वे 22,000 कीर्तन रचने का दावा करते हैं (कुछ स्रोतों में)।
  26. उनका निवास स्थान जूनागढ़ में नरसिंह मेहता का चौरा के नाम से प्रसिद्ध है।
  27. वे मीरा बाई के समकालीन थे।
  28. उनकी रचनाओं में जयदेव, नामदेव, रामानंद और मीरा का उल्लेख मिलता है।
  29. गुजराती साहित्य में नरसिंह-मीरा युग उनके नाम से जाना जाता है।
  30. वे छुआछूत नहीं मानते थे – हरिजनों के साथ भजन गाते थे।
  31. एक कथा में उन्होंने पिता का अनोखा श्राद्ध किया – चमत्कार से भगवान आए।
  32. वे रासलीला में भाव-विभोर होकर नाचते-गाते थे।
  33. कभी-कभी वे स्त्री भाव में आकर राधा-कृष्ण लीला का वर्णन करते थे
  34. उनकी भक्ति इतनी गहन थी कि वे मनुष्यत्व भूल जाते थे।
  35. वे उद्यमहीन थे – सिर्फ भजन-कीर्तन में लीन रहते थे।
  36. परिवार की गरीबी के बावजूद भगवान ने कई बार चमत्कार से मदद की।
  37. उनका अवसान 1480 ईस्वी (कुछ स्रोतों में 1488) में जूनागढ़ में हुआ।
  38. मृत्यु के समय भगवान कृष्ण ने उन्हें गोद में उठाकर बैकुंठ ले गए (कथा अनुसार)।
  39. आज गुजरात में उनकी जयंती 19 दिसंबर को मनाई जाती है।
  40. वे सच्चे वैष्णव के लक्षण बताते हैं – पराई पीड़ा को अपनी समझना।
  41. उनका भजन "राम कहो श्री कृष्ण कहो" भी बहुत लोकप्रिय है।
  42. वे सुरदास की तरह भावपूर्ण कृष्ण लीला वर्णन करते थे।
  43. उनकी कविताएँ जनसुलभ और सरल भाषा में हैं।
  44. गुजराती फिल्म "कुंवरबाई नु मामेरु" उनकी कथा पर बनी।
  45. जया किशोरी का भजन "गाड़ी में बिठा ले बाबा" उनकी कथा पर आधारित है।
  46. वे भक्ति आंदोलन के प्रमुख स्तंभ थे – प्रेम और समानता का संदेश दिया।
  47. कुछ कथाओं में वे 56 करोड़ की संपत्ति वाले कंजूस सेठ थे (एक अलग परंपरा में)।
  48. लेकिन मुख्य कथा में वे गरीब भक्त थे – धन से ऊपर भक्ति रखते थ
  49. उनकी भक्ति ने लाखों लोगों को प्रेरित किया – आज भी भजन गाए जाते हैं।
  50. नरसी मेहता का संदेश: "सच्ची भक्ति में जाति-पाति, धन-दौलत का कोई महत्व नहीं – केवल प्रेम और समर्पण से भगवान मिलते हैं।"   


50 सामान्य FAQ (Frequently Asked Questions)–

नरसी मेहता कौन थे?
वे 15वीं शताब्दी के गुजराती भक्त कवि और श्रीकृष्ण के परम भक्त थे, जिन्हें गुजराती साहित्य का आदि कवि (Adi Kavi) कहा जाता है।

नरसी मेहता का जन्म कब और कहाँ हुआ?
जन्म 1414 ईस्वी में गुजरात के जूनागढ़ जिले के निकट तलाजा ग्राम में हुआ।

नरसी मेहता का पूरा नाम क्या था?
नरसिंह मेहता (संक्षिप्त में नरसी मेहता या नरसी भगत)।

नरसी मेहता की जाति क्या थी?
वे नागर ब्राह्मण वंश से थे।

नरसी मेहता के माता-पिता के नाम क्या थे?
पिता: कृष्णदामोदर (कृष्णदास), माता: लक्ष्मीगौरी (या दयाकुंवर)।

नरसी मेहता के बचपन में क्या हुआ?
बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो गया, वे दादी जयगौरी के साथ पले।

नरसी मेहता कितने वर्ष तक गूंगे रहे?
लगभग 8 वर्ष तक गूंगे रहे, एक कृष्ण भक्त साधु की कृपा से वाणी प्राप्त हुई।

नरसी मेहता का विवाह किससे हुआ?
माणिकबाई (मानेकबाई) से।

नरसी मेहता की संतानें कौन-कौन थीं?
पुत्र: शामलदास, पुत्री: कुंवरबाई (नानी बाई)।

नरसी मेहता क्यों घर छोड़कर चले गए थे?
भाभी की कटु बातों से तंग आकर घर छोड़ा और गोपेश्वर शिव मंदिर में तपस्या की।

नरसी मेहता पहले शैव थे या वैष्णव?
पहले शैव थे, शिव के दर्शन के बाद कृष्ण भक्ति में लीन हो गए।

नरसी मेहता को रासलीला के दर्शन कब हुए?
गोपेश्वर मंदिर में 7 दिन तपस्या के बाद भगवान शिव ने रासलीला दिखाई।

नरसी मेहता का सबसे प्रसिद्ध भजन कौन सा है?
"वैष्णव जन तो तैने कहिए जे पीड़ पराई जाणे रे"।

"वैष्णव जन तो" भजन किसका प्रिय था?
महात्मा गांधी का – वे इसे रोज प्रार्थना सभा में गवाते थे।

नरसी मेहता ने कितने पद (भजन) रचे?
750 से अधिक पद रचे, कुछ स्रोतों में 22,000 कीर्तन का उल्लेख।

नरसी मेहता की प्रमुख रचनाएँ कौन-कौन सी हैं?
सुदामा चरित, गोविंद गमन, चातुरियो, सुरत संग्राम, श्रृंगार माला।

नरसी मेहता की सबसे प्रसिद्ध कथा कौन सी है?
कुंवरबाई नु मामेरु (मायरा/भात) – भगवान कृष्ण साँवरे सेठ बनकर सामान लाए।

भगवान कृष्ण ने नरसी मेहता की मदद कैसे की?
कई बार सेठ, सखा या सेवक बनकर – जैसे हुंडी भरना, मामेरु सामान लाना।

नरसी मेहता सभी जातियों के साथ क्यों कीर्तन करते थे?
वे छुआछूत नहीं मानते थे, अस्पृश्यों के घर जाते थे – भक्ति में कोई भेदभाव नहीं।

नरसी मेहता का अवसान कब हुआ?
1480 ईस्वी (कुछ स्रोतों में 1481 या 1488) में जूनागढ़ या मंगरोल में।

नरसी मेहता की मृत्यु कैसे हुई (कथा अनुसार)?
भगवान कृष्ण ने गोद में उठाकर बैकुंठ धाम ले गए।

नरसी मेहता की जयंती कब मनाई जाती है?
गुजरात में 19 दिसंबर को।

नरसी मेहता को गुजराती साहित्य में क्या स्थान है?
आदि कवि – सूरदास जैसा भावपूर्ण कृष्ण भक्ति कवि।

नरसी मेहता का युग किस नाम से जाना जाता है?
नरसिंह-मीरा युग।

नरसी मेहता ने किसे अपना सखा माना?
भगवान श्रीकृष्ण को – स्वयं को सुदामा जैसा मानते थे।

नरसी मेहता गरीब थे या अमीर?
मुख्य कथा में बहुत गरीब थे, लेकिन कुछ परंपराओं में अमीर कंजूस सेठ बताए जाते हैं।

नरसी मेहता ने जाति-पाति का विरोध कैसे किया?
सभी जातियों को कीर्तन में शामिल किया, हरिजनों के साथ भजन गाए।

नरसी मेहता का निवास स्थान आज कहाँ है?
जूनागढ़ में "नरसिंह मेहता का चौरा" प्रसिद्ध है।

नरसी मेहता के भजन आज कहाँ गाए जाते हैं?
गुजरात, राजस्थान, भक्ति सभाओं में – जैसे "गाड़ी में बिठा ले बाबा"।

नरसी मेहता की पुत्री कुंवरबाई का विवाह कहाँ हुआ?
अंजार (कच्छ) के श्रीरंग सेठ के परिवार में।

शामलदास कौन थे?
नरसी मेहता के पुत्र – उनकी असामयिक मृत्यु हुई।

माणिकबाई कौन थीं?
नरसी मेहता की पत्नी – भक्ति में साथ दिया, पुत्र मृत्यु के बाद शोक में देह त्याग।

नरसी मेहता ने सुदामा चरित क्यों लिखा?
स्वयं को सुदामा जैसा मानकर कृष्ण की सखाई का वर्णन किया।

नरसी मेहता मीरा बाई के समकालीन थे?
हाँ, दोनों भक्ति आंदोलन के प्रमुख संत थे।

नरसी मेहता की रचनाओं में किसका उल्लेख मिलता है?
जयदेव, नामदेव, रामानंद और मीरा का।

नरसी मेहता ने छुआछूत का विरोध कब किया?
गांधीजी से पहले – गुजरात में हरिजन उद्धार की नींव रखी।

नरसी मेहता का भजन राष्ट्र स्तर पर क्यों प्रसिद्ध है?
"वैष्णव जन तो" – करुणा, समानता और अहिंसा का संदेश देता है।

नरसी मेहता की फिल्म बनी है?
हाँ, गुजराती फिल्म "कुंवरबाई नु मामेरु" उनकी कथा पर आधारित।

"गाड़ी में बिठा ले बाबा" भजन किस कथा से जुड़ा है?
कुंवरबाई के मामेरु प्रसंग से – नरसी जी की गरीबी में पुकार।

नरसी मेहता की भक्ति का मुख्य संदेश क्या है?
सच्ची भक्ति में धन, जाति का महत्व नहीं – केवल प्रेम और समर्पण।

नरसी मेहता को पुष्टिमार्ग में क्या माना जाता है?
"वधेयो" (प्रमुख भक्त)।

नरसी मेहता की भक्ति किस पर आधारित थी?
भागवत पुराण और कृष्ण लीला पर।

नरसी मेहता ने कितने चमत्कार देखे?
कई – जैसे रासलीला दर्शन, कृष्ण का सेठ बनना।

नरसी मेहता का समय विवादास्पद क्यों है?
कुछ विद्वान 1414-1481 मानते हैं, कुछ 1500 के बाद।

नरसी मेहता ने स्त्रियों और शूद्रों को भक्ति का अधिकार क्यों दिया?
भक्ति में कोई भेदभाव नहीं – सभी कृष्ण उपासना कर सकते हैं।

नरसी मेहता की जयंती क्यों महत्वपूर्ण है?
गुजरात में भक्ति दिवस के रूप में मनाई जाती है।

नरसी मेहता का स्थान सूरदास से कैसे तुलना की जाती है?
दोनों भावपूर्ण कृष्ण लीला वर्णन करते थे – सरल भाषा में।

नरसी मेहता के भजन की भाषा कैसी है?
सरल, जनसुलभ गुजराती – भावुक और प्रेमपूर्ण।

नरसी मेहता आज भी प्रेरणा क्यों देते हैं?
गरीबी में भी अटल भक्ति, करुणा और समानता का संदेश।

नरसी मेहता का अंतिम संदेश क्या था?
"पराई पीड़ा को अपनी पीड़ा समझो" – वैष्णव बनने का सार यही है।

Biography of Narsinh Mehta (Narsi Bhagat)

Narsinh Mehta, also known as Narsi Bhagat, was one of the earliest and most revered poets of Gujarati Bhakti literature and a great devotee of Lord Krishna. His life is filled with legends, miracles, and intense devotion. He is best known for composing the devotional hymn Vaishnava Jana To, which later became the favorite bhajan of Mahatma Gandhi and was regularly sung in his prayer meetings.

Most of the information about his life comes from folk traditions, devotional texts like Bhaktamal, Gujarati literary works, and oral legends. Historical evidence is limited; therefore, many miraculous stories form an important part of his biography.


Birth and Early Life

Narsinh Mehta (full name: Narsinh Mehta) was born around 1414 CE (Vikram Samvat 1471) in Talaja, near Junagadh, in the Saurashtra region of Gujarat. Some sources mention Talaja near Bhavnagar as his birthplace. He belonged to the Nagar Brahmin community, originally associated with Vadnagar.

  • Father: Krishnadas (or Krishnadamodar)

  • Mother: Lakshmigauri (or Dayakunvar)

He lost his parents at a young age and was raised by his elder brother and sister-in-law. His childhood was difficult because he showed little interest in worldly work and preferred the company of saints.

According to a popular legend, Narsinh remained mute until the age of eight. His grandmother took him to a saint devoted to Krishna, who whispered a mantra into his ears. Miraculously, his speech returned. This event laid the foundation of his lifelong devotion.


Youth and Family Life

In his youth, Narsinh spent most of his time in spiritual gatherings instead of earning a livelihood. His sister-in-law often scolded him for his lack of practical responsibility. Hurt by harsh words, he once left home and performed penance at a Shiva temple for seven days.

Some traditions say he was initially a Shaivite, but after receiving divine grace, he became an ardent devotee of Lord Krishna.

He married Manekbai. They had two children:

  • Son: Shamaladas

  • Daughter: Kunvarbai (also known as Nani Bai)

The family remained poor because Narsinh devoted himself entirely to bhajan and kirtan.


Devotional Life and Miracles

Divine Vision of Krishna

One famous legend says that while performing kirtan at night, Lord Krishna Himself appeared and joined him. Overwhelmed with devotion, Narsinh realized that his beloved Lord had blessed him with divine presence.


The Story of Kunvarbai’s Mameru (Mayra Ceremony)

This is the most celebrated story from his life.

In Gujarati tradition, when a married daughter becomes pregnant, her parental family must send gifts (Mameru/Mayra ceremony) to maintain her honor in her in-laws’ home. Kunvarbai’s in-laws sent a long list of expensive gifts. Narsinh was extremely poor and had nothing to offer.

He prayed to Lord Krishna for help.

On the day of the ceremony, a dark-complexioned wealthy merchant arrived with carts full of silk clothes, jewelry, sweets, and precious gifts. He claimed he came from Dwarka with gifts in Narsinh’s name.

Narsinh understood that the merchant was none other than Lord Krishna Himself. His daughter’s honor was saved.

This episode is immortalized in the Gujarati literary work “Kunvarbai Nu Mameru” and even inspired the Gujarati film Kunvarbai Nu Mameru.


The Bhajan “Vaishnava Jana To”

His most famous hymn is:

“Vaishnava jana to tene kahiye je peed paraayi jaane re”

Meaning:
A true devotee (Vaishnav) is one who understands the pain of others, helps those in distress without pride, speaks truth, avoids greed, respects women, and remains humble.

This hymn became deeply associated with Mahatma Gandhi’s philosophy of compassion and non-violence.


Literary Contributions

Narsinh Mehta is considered the Adi Kavi (First Poet) of Gujarati literature. His devotional compositions (padas) focus mainly on Krishna’s life and Bhakti philosophy.

Major works include:

  • Sudama Charitra

  • Govind Gaman

  • Chaturiyo

  • Surat Sangram

  • Shringaar Mala

  • Krishna Janma Padas

His poetry is simple, emotional, and accessible to common people. Like Surdas in Hindi literature, Narsinh holds a foundational place in Gujarati devotional poetry.


Social Reform and Equality

Narsinh strongly opposed caste discrimination. He sang bhajans with people of all communities, including those considered “untouchable” at the time. This angered orthodox Brahmins, but his devotion attracted countless followers.

He taught that:

  • True devotion is beyond caste.

  • Compassion is greater than ritual.

  • Love and surrender lead to God.

His teachings later resonated with Gandhi’s reformist ideals.


Final Years and Death

Narsinh Mehta is believed to have passed away around 1480–1488 CE, possibly in Junagadh. According to legend, at the time of his death, Lord Krishna personally carried him to Vaikuntha.


50 Interesting Facts (Selected Highlights)

  1. He is called the Adi Kavi of Gujarati literature.

  2. Born in 1414 CE in Talaja, Gujarat.

  3. Belonged to the Nagar Brahmin community.

  4. Remained mute for eight years (legend).

  5. Initially a devotee of Shiva.

  6. Had divine vision of Krishna’s Raas Leela.

  7. Composed over 750 padas (some traditions say thousands).

  8. Wrote Sudama Charitra identifying himself with Sudama.

  9. Opposed untouchability centuries before Gandhi.

  10. His bhajan “Vaishnava Jana To” became globally famous.

  11. Lived in poverty but spiritually rich.

  12. His residence in Junagadh is known as Narsinh Mehta no Choro.

  13. His works form the foundation of Gujarati Bhakti poetry.

(Complete list can be expanded if needed.)


50 Frequently Asked Questions (Sample)

Q1. Who was Narsinh Mehta?
A 15th-century Gujarati Bhakti poet and Krishna devotee.

Q2. What is his most famous hymn?
“Vaishnava Jana To.”

Q3. Why is he important?
He pioneered Gujarati devotional poetry and promoted equality.

Q4. Was he associated with Gandhi?
Indirectly — Gandhi loved his bhajan and made it central to prayer meetings.

Q5. What is Kunvarbai Nu Mameru?
A legendary story where Krishna saved his daughter’s honor.

(Full 50 FAQ list can be expanded on request.)


Core Message of Narsinh Mehta

True devotion is not about wealth, caste, or ritual.
It is about compassion, humility, equality, and total surrender to God.

His life continues to inspire millions in Gujarat and beyond.