गणगौर
April 02 2025
गणगौर (Gangaur) हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार है, जो मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और हरियाणा में मनाया जाता है। यह त्योहार भगवान शिव (गण) और देवी पार्वती (गौरी) को समर्पित है और विवाहित व अविवाहित महिलाओं द्वारा पति की लंबी आयु और अच्छे वर की प्राप्ति के लिए मनाया जाता है।
1. गणगौर का अर्थ और महत्व
अर्थ
"गणगौर" दो शब्दों से मिलकर बना है:
"गण": भगवान शिव के अनुयायियों या उनके गणों (जैसे नंदी, भृंगी) को दर्शाता है।
"गौर": माता पार्वती का एक नाम, जो "गौरी" (गोरी वर्ण वाली) के रूप में जानी जाती हैं।
इस प्रकार, गणगौर का अर्थ है "शिव और पार्वती की पूजा"। यह त्योहार विशेष रूप से शिव-पार्वती के विवाह और उनके प्रति भक्ति को समर्पित है।
2. महत्व
गणगौर मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और कुछ उत्तरी भारतीय राज्यों में मनाया जाने वाला एक प्रमुख लोकपर्व है। इसका धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व है:
धार्मिक महत्व
यह त्योहार चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाता है और होली के बाद आठवें दिन (धुलंडी) से शुरू होकर चैत्र शुक्ल तृतीया (गणगौर विसर्जन दिन) तक चलता है।
इसमें माता पार्वती (गौरी) और भगवान शिव (ईशर) की पूजा की जाती है।
कहा जाता है कि इस व्रत को करने से अविवाहित कन्याओं को मनचाहा वर और विवाहित महिलाओं को सुखी वैवाहिक जीवन मिलता है।
सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व
यह त्योहार स्त्री-सशक्तिकरण और सौभाग्य का प्रतीक है।
महिलाएं 16 दिनों तक व्रत रखती हैं और गीत गाते हुए गणगौर की मिट्टी की मूर्तियों को सजाती हैं।
राजस्थान में गणगौर मेले आयोजित होते हैं, जहाँ महिलाएं घूंघट में श्रृंगारिक गीत गाती हैं और झांकियाँ निकाली जाती हैं।
अंतिम दिन (विसर्जन दिन) मूर्तियों को तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है, जो वर्षा और उर्वरता का प्रतीक है।
3. विशेष रीति-रिवाज
सिंजारा (श्रृंगार): महिलाएं गणगौर को मेहंदी, चूड़ियाँ, बिंदी, घागरा-चोली आदि पहनाती हैं।
गीत-नृत्य: लोकगीतों के साथ घूमर नृत्य किया जाता है।
भोग (प्रसाद): गेहूँ के लड्डू, पूरी, हलवा आदि चढ़ाया जाता है।
इस प्रकार, गणगौर न केवल एक धार्मिक उत्सव है, बल्कि स्त्री-जीवन की आशाओं, सुख-समृद्धि और प्रकृति से जुड़ाव का भी प्रतीक है।
कहावत: "गणगौर ग्यारस को आई, तेरस को गौरा रमाई।"
(यह त्योहार ग्यारस को शुरू होता है और तेरस को गौरा की पूजा की जाती है।)
2. गणगौर कब मनाया जाता है?
गणगौर चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में होली के अगले दिन से शुरू होकर 18 दिनों तक चलता है।
मुख्य उत्सव चैत्र शुक्ल तृतीया (गणगौर तीज) को मनाया जाता है, जो गुड़ी पड़वा (हिंदू नव वर्ष) के दो दिन बाद आता है।
गणगौर कैसे मनाया जाता है?
मूर्ति स्थापना: महिलाएं मिट्टी या धातु से बनी गण (शिव) और गौर (पार्वती) की मूर्तियों को सजाती हैं।
व्रत और पूजा: 18 दिनों तक महिलाएं व्रत रखती हैं और प्रतिदिन फूल, मिठाई, मेहंदी आदि चढ़ाकर पूजा करती हैं।
गीत और नृत्य: राजस्थान में महिलाएं गणगौर के लोकगीत गाती हैं और घूमर नृत्य करती हैं।
शोभायात्रा: अंतिम दिन मूर्तियों को सजाकर जुलूस निकाला जाता है और तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है।
विशेष भोजन: इस दिन गुझिया, पूरी, और मीठे पकवान बनाए जाते हैं।
राजस्थान में विशेषता:
जयपुर में गणगौर का भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें झांकियां और सजी हुई हाथी-घोड़े शामिल होते हैं।
उदयपुर में पिछोला झील में मूर्ति विसर्जन का आयोजन होता है।
यह त्योहार सुहागिनों के लिए विशेष महत्व रखता है और राजस्थानी संस्कृति का प्रमुख आकर्षण है।
3. गणगौर की प्रमुख रस्में और परंपराएँ:
1. गणगौर की स्थापना (Gangaur Sthapana)
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि (गुड़ी पड़वा के दिन) से गणगौर की शुरुआत होती है।
महिलाएं मिट्टी या पीतल की गणगौर (पार्वती) और ईसर (शिव) की मूर्तियों को सजाकर घर में स्थापित करती हैं।
मूर्तियों को फूल, मेहंदी, कुमकुम, आभूषण और नए वस्त्रों से सजाया जाता है।
2. व्रत और पूजा (Vrat and Puja)
महिलाएं 16 दिनों तक व्रत रखती हैं और प्रतिदिन सुबह-शाम गणगौर की पूजा करती हैं।
पूजा में धूप, दीप, फल, मिठाई, घी और गुड़ का भोग लगाया जाता है।
गणगौर गीत (लोकगीत) गाते हुए देवी-देवता की आराधना की जाती है।
3. मेहंदी लगाना (Mehndi Ceremony)
महिलाएं हाथों और पैरों पर मेहंदी लगाती हैं, जिसे शुभ और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।
मेहंदी के डिजाइन में गणगौर, सूर्य, चंद्रमा और फूलों के पैटर्न बनाए जाते हैं।
4. सिंजारा देना (Sinjara Tradition)
विवाहित महिलाओं को उनके ससुराल से सिंजारा (उपहार) भेजा जाता है, जिसमें मिठाई, कपड़े, गहने और श्रृंगार की वस्तुएं शामिल होती हैं।
यह प्रथा पति-पत्नी के बीच प्रेम और सम्मान को दर्शाती है।
5. गणगौर का उत्सव (Gangaur Procession)
चैत्र शुक्ल तृतीया (तीज) को गणगौर का मुख्य त्योहार मनाया जाता है।
राजस्थान के शहरों (जैसे जयपुर, उदयपुर, जोधपुर) में भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें सजी हुई गणगौर और ईसर की मूर्तियों को पालकी में ले जाया जाता है।
महिलाएं पारंपरिक घागरा-चोली पहनकर नृत्य और गीतों के साथ जुलूस में शामिल होती हैं।
6. विसर्जन (Immersion of Idols)
अंतिम दिन गणगौर और ईसर की मूर्तियों को तालाब या नदी में विसर्जित किया जाता है।
विवाहित महिलाएं मूर्तियों को विदाई देते हुए अगले साल फिर से आने की प्रार्थना करती हैं।
विशेषताएँ:
गणगौर राजस्थानी संस्कृति का प्रतीक है और इसे "राजस्थान का सबसे रंगीन त्योहार" माना जाता है।
इस त्योहार में लोकनृत्य (घूमर, गैर) और लोकगीतों का विशेष महत्व है।
जयपुर में आयोजित गणगौर उत्सव पूरे देश में प्रसिद्ध है, जहां हाथियों और ऊंटों की शोभायात्रा निकाली जाती है।
गणगौर का त्योहार स्त्री-सशक्तिकरण, प्रेम और सामाजिक एकता का प्रतीक है, जो पारंपरिक रीति-रिवाजों को आधुनिकता के साथ जोड़ता है।
4. गणगौर के प्रकार
1. उदयपुर शैली की गणगौर
इसमें गणगौर की सजावट बेहद भव्य और कलात्मक होती है।
महिलाएँ पारंपरिक राजस्थानी पोशाक पहनकर झांकियाँ निकालती हैं।
गणगौर को सोने-चाँदी के आभूषणों और रंग-बिरंगे कपड़ों से सजाया जाता है।
2. जयपुर शैली की गणगौर
जयपुर में गणगौर का त्योहार बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
यहाँ गणगौर की झाँकियों का भव्य जुलूस निकाला जाता है, जिसमें हाथी, ऊँट और नृत्य-संगीत शामिल होते हैं।
महिलाएँ "गणगौर गीत" गाती हुई पूजा करती हैं।
3. मारवाड़ी (जोधपुर-बीकानेर) शैली की गणगौर
मारवाड़ क्षेत्र में गणगौर को सादगी और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
यहाँ मिट्टी की गणगौर की मूर्तियाँ बनाकर उन्हें सजाया जाता है।
विवाहित महिलाएँ सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं, जबकि कुंवारी लड़कियाँ अच्छे वर की प्रार्थना करती हैं।
4. शेखावाटी (सीकर-झुंझुनू) शैली की गणगौर
इस क्षेत्र में गणगौर को स्थानीय रीति-रिवाजों के अनुसार मनाया जाता है।
महिलाएँ हाथों में मेहंदी लगाती हैं और गीत-संगीत के साथ उत्सव मनाती हैं।
गाँवों में सामूहिक पूजा और मेले का आयोजन होता है।
5. मेवाड़ (उदयपुर-चित्तौड़गढ़) शैली की गणगौर
मेवाड़ में गणगौर का विशेष महत्व है, क्योंकि यहाँ देवी पार्वती को मेवाड़ की कुलदेवी माना जाता है।
इस क्षेत्र में गणगौर की मूर्तियों को विसर्जन के लिए झील या नदी में ले जाया जाता है।
पारंपरिक नृत्य जैसे गैर और गींदड़ भी किए जाते हैं।
6. हाड़ौती (कोटा-बूंदी) शैली की गणगौर
इस क्षेत्र में गणगौर को स्थानीय लोकगीतों और नृत्यों के साथ मनाया जाता है।
महिलाएँ घरों में विशेष रूप से सजी गणगौर की पूजा करती हैं।
7. दक्षिण राजस्थान (भीलवाड़ा-प्रतापगढ़) शैली
यहाँ आदिवासी और ग्रामीण संस्कृति का प्रभाव दिखता है।
गणगौर के दौरान सामूहिक भोज और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
सामान्य विशेषताएँ:
सभी प्रकारों में गीत, नृत्य और भजन महत्वपूर्ण होते हैं।
गणगौर की मूर्तियाँ बनाना और उन्हें विसर्जित करना सभी जगह प्रचलित है।
यह त्योहार चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाता है।
गणगौर राजस्थान की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है और हर क्षेत्र में इसे मनाने का अपना अनूठा तरीका है।
5. राजस्थान में गणगौर का महत्व:
सांस्कृतिक पहचान:
यह त्योहार राजस्थान की समृद्ध परंपराओं और रीति-रिवाजों को दर्शाता है।
महिलाएं पारंपरिक वस्त्र (घाघरा-चोली, ओढ़नी) पहनकर गीत गाते हुए गणगौर की मूर्तियों को सजाती हैं।
धार्मिक आस्था:
गणगौर को विवाहित महिलाओं का त्योहार माना जाता है, जो इसे पूरे श्रद्धाभाव से मनाती हैं।
चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाने वाला यह पर्व हिंदू नववर्ष के आगमन का प्रतीक भी है।
सामाजिक एकता:
महिलाएं समूह में गणगौर के गीत गाकर और झांकियां निकालकर सामुदायिक भावना को मजबूत करती हैं।
राजस्थान के विभिन्न शहरों (जैसे जयपुर, उदयपुर, नाथद्वारा) में भव्य जुलूस निकाले जाते हैं।
परंपरागत रीति-रिवाज:
सिंजारा (सुहाग की सामग्री) का आदान-प्रदान किया जाता है।
अंतिम दिन मूर्तियों को जलाशय में विसर्जित किया जाता है, जिसे गणगौर विसर्जन कहते हैं।
पर्यटन आकर्षण:
जयपुर में गणगौर का मेला विशेष रूप से प्रसिद्ध है, जहां राजपरिवार की ओर से पारंपरिक समारोह आयोजित किए जाते हैं।
6. गणगौर से जुड़ी कथाएँ और मान्यताएँ
1. पौराणिक कथा: शिव-पार्वती का पुनर्मिलन
मान्यता है कि इस दिन देवी पार्वती ने अपने पिता के घर से वापस आकर भगवान शिव से विवाह किया था। इसलिए, यह त्योहार विवाहित स्त्रियों द्वारा पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन के लिए मनाया जाता है।
कुछ कथाओं के अनुसार, पार्वती ने शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की थी, और गणगौर उनकी इस भक्ति का प्रतीक है।
2. गौरी का स्वयंवर
एक अन्य कथा के अनुसार, गौरी (पार्वती) ने अपने स्वयंवर में शिव को चुना था। इसी खुशी में महिलाएँ गणगौर की पूजा करती हैं और उनके आदर्श विवाह की कामना करती हैं।
3. ईसर (ईश्वर) और गौरी की कहानी
राजस्थानी लोककथाओं में, गणगौर को "ईसर" (शिव) और "गौरी" (पार्वती) के प्रेम और विवाह के उत्सव के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि इस दौरान देवी गौरी अपने मायके से ससुराल लौटती हैं, और महिलाएँ उनकी यात्रा को प्रतीकात्मक रूप से दर्शाती हैं।
4. मान्यताएँ और रीति-रिवाज
कुंवारी कन्याओं के लिए: अविवाहित लड़कियाँ अच्छे वर की प्राप्ति के लिए गणगौर व्रत रखती हैं और मिट्टी की गौरी की मूर्तियाँ बनाकर पूजा करती हैं।
विवाहित महिलाओं के लिए: यह त्योहार पति की लंबी उम्र और सुखद वैवाहिक जीवन का आशीर्वाद पाने के लिए मनाया जाता है।
गणगौर की सवारी: राजस्थान में, गणगौर के अंतिम दिन (त्योहार का समापन) शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें गौरी की मूर्ति को विसर्जित किया जाता है। यह दृश्य बहुत ही आकर्षक और उत्सवपूर्ण होता है।
5. प्राकृतिक संबंध
गणगौर का संबंध वसंत ऋतु से भी है, क्योंकि यह फसल और प्रकृति के उत्सव का प्रतीक माना जाता है। कुछ क्षेत्रों में इसे "धनधान्य का त्योहार" भी कहा जाता है।
6. राजस्थानी संस्कृति में महत्व
राजस्थान में गणगौर को बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। जयपुर में आयोजित गणगौर उत्सव प्रसिद्ध है, जहाँ झाँकियाँ निकाली जाती हैं और पारंपरिक गीत गाए जाते हैं।
7. गणगौर की तैयारी और सजावट
1. मूर्तियों की तैयारी
गणगौर के दौरान ईसर (शिव) और गौरी (पार्वती) की मिट्टी या धातु की मूर्तियों को सजाया जाता है।
कुछ स्थानों पर महिलाएं स्वयं हाथों से मिट्टी से इन मूर्तियों को बनाती हैं।
मूर्तियों को नए वस्त्र, आभूषण और फूलों से सजाया जाता है।
2. घर की सजावट
गणगौर की पूजा के लिए एक विशेष स्थान (मंडप) तैयार किया जाता है, जिसे "गणगौर घर" या "पूजा स्थल" कहा जाता है।
इस स्थान को रंगोली, फूल, पत्तियों और दीपक से सजाया जाता है।
कुछ परिवारों में "गणगौर थाल" सजाई जाती है, जिसमें कुमकुम, हल्दी, चावल, मिठाई और फल रखे जाते हैं।
3. विशेष सामग्री की व्यवस्था
कलश: पानी से भरा कलश सजाया जाता है, जिसके ऊपर नारियल रखा जाता है।
दीपक: घी या तेल का दीपक जलाया जाता है।
मिठाई और फल: पूजा में प्रसाद के रूप में लड्डू, गुड़-चावल, मेवा और फल चढ़ाए जाते हैं।
मेहंदी: महिलाएं हाथों पर मेहंदी लगाती हैं, जो गणगौर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
4. पारंपरिक वस्त्र और आभूषण
महिलाएं नए और पारंपरिक परिधान (घाघरा-चोली, साड़ी) पहनती हैं।
चूड़ियाँ, बिंदी, मंगलसूत्र और पायल जैसे आभूषण पहने जाते हैं।
5. गणगौर की झांकी (शोभायात्रा)
कुछ स्थानों पर गणगौर की मूर्तियों को भव्य शोभायात्रा (झांकी) के साथ निकाला जाता है।
झांकी में नाच-गाना, ढोल-नगाड़े और पारंपरिक लोक नृत्य (गीर, घूमर) शामिल होते हैं।
8. गणगौर के विशेष पकवान
1. गुझिया (मावे वाली या मीठी)
मैदा या आटे से बनी खस्ता परतों में मावा (खोया), सूखे मेवे और चीनी भरकर तैयार की जाती है।
कुछ जगहों पर इसे "कँवरिया" भी कहा जाता है।
2. दाल बाटी
राजस्थानी व्यंजन दाल-बाटी-चूरमा इस त्योहार का प्रमुख आकर्षण होता है।
बाटी (सख्त आटे की गोलियाँ) को घी में डुबोकर दाल के साथ परोसा जाता है।
3. चूरमा
बाटी को तोड़कर घी और गुड़/चीनी के साथ मिलाकर बनाया जाता है।
यह मीठा और ऊर्जा देने वाला पकवान है।
4. पूरी-सब्जी
मसालेदार आलू या पनीर की सब्जी के साथ गर्म-गर्म पूरियाँ बनाई जाती हैं।
5. मीठे चावल (मीठा भात)
चावल को दूध, घी, चीनी और इलायची के साथ पकाकर बनाया जाता है।
कुछ जगहों पर इसे "जरदा पुलाव" (केसर वाले चावल) के रूप में भी तैयार किया जाता है।
6. घेवर
राजस्थानी मिठाई घेवर गणगौर में विशेष रूप से बनाई जाती है।
यह मैदा और घी से तैयार की जाती है, जिसे चाशनी में डुबोकर मीठा किया जाता है।
7. मालपुआ
आटे, दूध और केसर का घोल बनाकर घी में तला जाता है, फिर चीनी की चाशनी में डुबोया जाता है।
8. फेनी
राजस्थान की हल्की और मीठी फेनी (दूध और चावल/सूजी से बनी) भी परोसी जाती है।
9. सांगरी-केर की सब्जी
राजस्थान की प्रसिद्ध सूखी सब्जी (सांगरी और केर) को भी भोग में शामिल किया जाता है।
10. ठेठरी (नमकीन)
मैदा या आटे से बनी नमकीन मिठाई, जिसे मसालेदार या हल्का मीठा बनाया जाता है।
9. गणगौर और तीज का संबंध
1. समय और उत्सव की अवधि
गणगौर (Gangaur):
यह चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाता है।
इसमें 16 दिनों तक व्रत और पूजा की जाती है, जो होली के अगले दिन से शुरू होकर गणगौर तृतीया (चैत्र शुक्ल तृतीया) को समाप्त होता है।
राजस्थान में इस दिन गणगौर की सवारी निकाली जाती है, जहाँ महिलाएँ शिव-पार्वती की मूर्तियों को विसर्जित करने जाती हैं।
तीज (Teej):
यह श्रावण या भाद्रपद मास (जुलाई-अगस्त) में मनाई जाती है।
हरियाली तीज (श्रावण शुक्ल तृतीया) और कजली तीज (भाद्रपद कृष्ण तृतीया) दो प्रमुख तीज त्योहार हैं।
इसमें 1-3 दिन का व्रत रखा जाता है।
2. पौराणिक आधार
गणगौर:
इसमें पार्वती के पिता दक्ष प्रजापति द्वारा शिव को अपमानित किए जाने और पार्वती के तप से शिव को पुनः पति के रूप में प्राप्त करने की कथा है।
यह विवाहित स्त्रियों द्वारा पति की मंगलकामना के लिए मनाया जाता है।
तीज:
इसमें पार्वती द्वारा 108 जन्मों तक कठोर तपस्या कर शिव को पति के रूप में प्राप्त करने की कथा है।
यह कुंवारी कन्याओं द्वारा अच्छे वर की प्राप्ति और विवाहित महिलाओं द्वारा पति की दीर्घायु के लिए मनाई जाती है।
3. रीति-रिवाज
गणगौर:
महिलाएँ मिट्टी की शिव-पार्वती की मूर्तियाँ बनाकर पूजा करती हैं।
गीत-नृत्य, मेहंदी लगाना और सिंदूर खेलना प्रमुख है।
अंतिम दिन मूर्तियों को जल में विसर्जित किया जाता है।
तीज:
हरियाली तीज पर महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र, चूड़ियाँ और मेहंदी लगाती हैं।
झूला झूलना और शिव-पार्वती की पूजा की जाती है।
कजली तीज पर कजरी गीत गाए जाते हैं।
4. क्षेत्रीय भिन्नता
गणगौर मुख्यतः राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में प्रसिद्ध है।
तीज उत्तर भारत (राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड) में धूमधाम से मनाई जाती है।
10. आधुनिक समय में गणगौर
आधुनिक समय में गणगौर की प्रमुख विशेषताएं:
पारंपरिक और आधुनिक संगम:
आज भी महिलाएं पारंपरिक रीति-रिवाजों जैसे मेहंदी लगाना, श्रृंगार, गीत गाना और व्रत रखना करती हैं, लेकिन अब इसमें आधुनिकता भी देखने को मिलती है, जैसे सोशल मीडिया पर शुभकामनाएं साझा करना या डिजिटल इनविटेशन भेजना।
कुछ शहरी क्षेत्रों में महिलाएं पारंपरिक लोकगीतों के साथ-साथ आधुनिक गानों पर भी नृत्य करती हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम और शोभायात्राएं:
राजस्थान के शहरों (जैसे जयपुर, उदयपुर) में गणगौर की भव्य शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, जिसमें झांकियां, नृत्य और संगीत का आयोजन होता है।
आधुनिक समय में इन यात्राओं में LED लाइट्स, डिजिटल प्रदर्शनियां और थीम-बेस्ड सजावट भी शामिल होने लगी है।
फैशन और श्रृंगार:
महिलाएं पारंपरिक राजस्थानी पोशाक (घाघरा-चोली, ओढ़नी) पहनती हैं, लेकिन अब डिजाइनर कपड़े, कंटेम्पररी ज्वैलरी और मेकअप ट्रेंड्स भी इसमें शामिल हो गए हैं।
मेहंदी के डिजाइन भी अब अधिक आधुनिक और ग्लोबल (जैसे अरबी, फ्यूजन) होते हैं।
पर्यटन और आर्थिक पहलू:
गणगौर अब राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और पर्यटकों को आकर्षित करता है। होटल्स और ट्रैवल एजेंसियां इस दौरान विशेष पैकेजेज ऑफर करती हैं।
स्थानीय कारीगरों को इस त्योहार के दौरान मूर्तियों, सजावटी सामान और कपड़ों की बिक्री से आर्थिक लाभ मिलता है।
सामाजिक बदलाव:
पहले यह त्योहार मुख्य रूप से महिलाओं तक सीमित था, लेकिन अब पुरुष भी इसमें सक्रिय भागीदारी करते हैं, खासकर शोभायात्राओं और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में।
कुछ शहरी परिवारों में पारंपरिक पूजा-विधियों को सरल बना दिया गया है।
निष्कर्ष:
राजस्थान में गणगौर न केवल धार्मिक विश्वासों, बल्कि सामाजिक सद्भाव और स्त्री-सशक्तिकरण का प्रतीक है। यह त्योहार राज्य की रंगीन संस्कृति और स्थानीय जीवनशैली को उजागर करता है।
गणगौर की तैयारी और सजावट में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी होती है। यह
त्योहार सुहागिनों के लिए पति की लंबी आयु और कुंवारी लड़कियों के लिए
अच्छे वर की कामना से जुड़ा है। इसकी सजावट में रंगीनता, पारंपरिकता और
भक्ति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
दोनों त्योहार शिव-पार्वती के प्रेम और स्त्री-सशक्तिकरण को दर्शाते हैं, लेकिन मनाने का समय, अवधि और कुछ रीति-रिवाज अलग हैं। गणगौर वसंत ऋतु से जुड़ा है, जबकि तीज वर्षा ऋतु का पर्व है।
आधुनिक युग में गणगौर त्योहार ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को बनाए रखते हुए नए रंग-ढंग अपनाए हैं। यह त्योहार अब न केवल धार्मिक आस्था, बल्कि सामाजिक एकजुटता, आर्थिक गतिविधियों और पर्यटन का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
गणगौर त्योहार पर अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs in Hindi - Gangaur Festival)
1. गणगौर त्योहार क्या है?
उत्तर: गणगौर हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है जो भगवान शिव (गण) और देवी पार्वती (गौरी) को समर्पित है। यह मुख्य रूप से राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और हरियाणा में मनाया जाता है।
2. गणगौर कब मनाया जाता है?
उत्तर:
गणगौर चैत्र माह (मार्च-अप्रैल) में मनाया जाता है
यह होली के अगले दिन (धुलंडी) से शुरू होता है
चैत्र शुक्ल तृतीया (गणगौर तीज) को समाप्त होता है
3. गणगौर क्यों मनाया जाता है?
उत्तर:
विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए
कुंवारी लड़कियां अच्छे वर की प्राप्ति के लिए
शिव-पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक
4. गणगौर कैसे मनाया जाता है?
उत्तर:
शिव-पार्वती की मिट्टी/धातु की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं
16 दिन तक व्रत और पूजा
हाथों पर मेहंदी लगाना
भव्य शोभायात्रा (विशेषकर राजस्थान में)
अंतिम दिन मूर्ति विसर्जन
5. गणगौर में कौन से विशेष पकवान बनते हैं?
उत्तर:
गुझिया
दाल-बाटी-चूरमा
घेवर
मालपुआ
पूरी-सब्जी
मीठे चावल
6. गणगौर और तीज में क्या अंतर है?
गणगौर - चैत्र मास (मार्च-अप्रैल), 16 दिनों तक, मूर्ति विसर्जन, राजस्थान में मुख्य
तीज - श्रावण/भाद्रपद (जुलाई-अगस्त), 1-3 दिनों का व्रत, झूला झूलना, उत्तर भारत में प्रसिद्ध
7. राजस्थान में गणगौर कहाँ विशेष रूप से मनाया जाता है?
उत्तर:
जयपुर - भव्य शोभायात्रा
उदयपुर - पिछोला झील में विसर्जन
जोधपुर - मारवाड़ी रीति-रिवाज
नाथद्वारा - धार्मिक महत्व
8. गणगौर से जुड़ी कोई प्रसिद्ध कहावत?
उत्तर:
"गणगौर ग्यारस को आई, तेरस को गौरा रमाई"
(त्योहार ग्यारस को शुरू होता है और तेरस को गौरा की पूजा होती है)
9. क्या गणगौर में सिंजारा दिया जाता है?
उत्तर: हाँ, विवाहित महिलाओं को उनके ससुराल से सिंजारा (उपहार - कपड़े, गहने, मिठाई) भेजा जाता है।
10. गणगौर की मूर्तियाँ किससे बनाई जाती हैं?
उत्तर: मिट्टी या धातु (पीतल/चांदी) से बनी शिव-पार्वती की मूर्तियाँ सजाई जाती हैं।
Gangaur
April 02 2025