समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी – सरल अर्थ, शब्दार्थ और भावार्थ
चौपाई :
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥4॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
मेरी अलग-अलग तरीकों से की गई विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर कोई दोष नहीं लगाएगा। फिर भी अगर कोई शंका करेगा, तो वह मुझसे भी ज़्यादा मूर्ख और कम बुद्धि वाला है।
शब्दार्थ (Word Meaning)
-
समुझि – समझकर
-
बिबिधि बिधि – कई प्रकार से
-
बिनती मोरी – मेरी विनती / प्रार्थना
-
कोउ – कोई
-
न कथा सुनि – यह कथा सुनकर
-
देइहि खोरी – दोष देगा / गलती निकालेगा
-
असंका – शंका, संदेह
-
जड़ मति – मूर्ख बुद्धि
-
रंका – गरीब, कंगाल (यहाँ बुद्धि का कंगाल)
भावार्थ (भावनात्मक अर्थ / Explanation)
कवि (या कथाकार) विनम्र होकर कह रहा है कि मैंने कितने ही तरीकों से सबको यह विनती कर दी है कि इस पवित्र कथा को सुनकर कोई भी दोष न बताए और न ही कोई गलती निकाले। फिर भी जो लोग इसमें संदेह करेंगे या बुराई ढूँढेंगे, वे वास्तव में ज्ञानहीन हैं। उनकी बुद्धि गरीब है और वे मुझसे भी ज़्यादा मूर्ख कहलाएँगे।
यहाँ मूल भावना यह है कि पवित्र धार्मिक कथा को शुद्ध भाव से सुनना चाहिए। उसमें दोष ढूँढना या शंका करना अज्ञानता की निशानी है।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह चौपाई किस ग्रंथ से ली गई है?
यह चौपाई रामचरितमानस से ली गई है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है।
2. इस चौपाई में कवि क्या कहना चाहता है?
कवि कह रहा है कि उसकी बहुत बार की विनती के बाद भी यदि कोई कथा में दोष ढूँढेगा, तो वह मूर्खता होगी।
3. “समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी” का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है — मेरी अनेक प्रकार से की गई विनती को समझकर।
4. “खोरी देना” का मतलब क्या होता है?
"खोरी देना" का अर्थ है — दोष निकालना, गलती बताना या निंदा करना।
5. यहाँ “जड़ मति रंका” किसके लिए कहा गया है?
यह कहा गया है उन लोगों के लिए जो पवित्र कथा में भी शंका करते हैं — यानी जिनकी बुद्धि कमजोर है।
6. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?
धार्मिक और पवित्र ग्रंथों को विनम्रता और आस्था से सुनना चाहिए, उनमें दोष और शंका नहीं निकालनी चाहिए।
7. क्या इस चौपाई में तुलसीदास जी अपने बारे में भी कहते हैं?
हाँ, वे कहते हैं कि जो शंका करेगा, वह मुझसे भी अधिक मूर्ख है। यानी वे खुद को भी साधारण और विनम्र दिखा रहे हैं।
8. “असंका” और “शंका” में क्या अंतर है?
दोनों का मतलब संदेह है, पर असंका ज़्यादा पुराना और काव्यात्मक शब्द है।
9. इस चौपाई का भावार्थ क्यों महत्वपूर्ण है?
भावार्थ से हमें पता चलता है कि कवि की भावना क्या थी, और हमें कथा किस भाव से सुननी चाहिए।
10. क्या इस चौपाई को पढ़कर कुछ सीख मिलती है?
हाँ, सीख मिलती है कि ज्ञान प्राप्त करने के समय विनम्रता, आस्था और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी – सरल अर्थ, शब्दार्थ और भावार्थ
चौपाई :
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी॥
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥4॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
मेरी अलग-अलग तरीकों से की गई विनती को समझकर, कोई भी इस कथा को सुनकर कोई दोष नहीं लगाएगा। फिर भी अगर कोई शंका करेगा, तो वह मुझसे भी ज़्यादा मूर्ख और कम बुद्धि वाला है।
शब्दार्थ (Word Meaning)
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समुझि – समझकर
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बिबिधि बिधि – कई प्रकार से
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बिनती मोरी – मेरी विनती / प्रार्थना
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कोउ – कोई
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न कथा सुनि – यह कथा सुनकर
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देइहि खोरी – दोष देगा / गलती निकालेगा
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असंका – शंका, संदेह
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जड़ मति – मूर्ख बुद्धि
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रंका – गरीब, कंगाल (यहाँ बुद्धि का कंगाल)
भावार्थ (भावनात्मक अर्थ / Explanation)
कवि (या कथाकार) विनम्र होकर कह रहा है कि मैंने कितने ही तरीकों से सबको यह विनती कर दी है कि इस पवित्र कथा को सुनकर कोई भी दोष न बताए और न ही कोई गलती निकाले। फिर भी जो लोग इसमें संदेह करेंगे या बुराई ढूँढेंगे, वे वास्तव में ज्ञानहीन हैं। उनकी बुद्धि गरीब है और वे मुझसे भी ज़्यादा मूर्ख कहलाएँगे।
यहाँ मूल भावना यह है कि पवित्र धार्मिक कथा को शुद्ध भाव से सुनना चाहिए। उसमें दोष ढूँढना या शंका करना अज्ञानता की निशानी है।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह चौपाई किस ग्रंथ से ली गई है?
यह चौपाई रामचरितमानस से ली गई है, जिसे गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है।
2. इस चौपाई में कवि क्या कहना चाहता है?
कवि कह रहा है कि उसकी बहुत बार की विनती के बाद भी यदि कोई कथा में दोष ढूँढेगा, तो वह मूर्खता होगी।
3. “समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी” का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है — मेरी अनेक प्रकार से की गई विनती को समझकर।
4. “खोरी देना” का मतलब क्या होता है?
"खोरी देना" का अर्थ है — दोष निकालना, गलती बताना या निंदा करना।
5. यहाँ “जड़ मति रंका” किसके लिए कहा गया है?
यह कहा गया है उन लोगों के लिए जो पवित्र कथा में भी शंका करते हैं — यानी जिनकी बुद्धि कमजोर है।
6. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?
धार्मिक और पवित्र ग्रंथों को विनम्रता और आस्था से सुनना चाहिए, उनमें दोष और शंका नहीं निकालनी चाहिए।
7. क्या इस चौपाई में तुलसीदास जी अपने बारे में भी कहते हैं?
हाँ, वे कहते हैं कि जो शंका करेगा, वह मुझसे भी अधिक मूर्ख है। यानी वे खुद को भी साधारण और विनम्र दिखा रहे हैं।
8. “असंका” और “शंका” में क्या अंतर है?
दोनों का मतलब संदेह है, पर असंका ज़्यादा पुराना और काव्यात्मक शब्द है।
9. इस चौपाई का भावार्थ क्यों महत्वपूर्ण है?
भावार्थ से हमें पता चलता है कि कवि की भावना क्या थी, और हमें कथा किस भाव से सुननी चाहिए।
10. क्या इस चौपाई को पढ़कर कुछ सीख मिलती है?
हाँ, सीख मिलती है कि ज्ञान प्राप्त करने के समय विनम्रता, आस्था और सकारात्मक सोच रखनी चाहिए।