ज्ञानेश कुमार
(कहवा मैन)
| जन्म तिथि | 27 January 1964 |
| उम्र | 62 वर्ष (2026 तक) |
| राशि | कुंभ (Aquarius) |
| जन्म स्थान | मिधकुर, आगरा, उत्तर प्रदेश |
| निवास स्थान | दिल्ली, भारत |
| पिता | डॉ. सुभोद कुमार गुप्ता |
| माता | श्रीमती सत्यवती गुप्ता |
| भाई | उपेंद्र जैन — आईपीएस अधिकारी |
| बहिन | रोली जैन — पीएचडी धारक |
| कद | 5 फीट 8 इंच |
| वजन | लगभग 80 किलोग्राम |
| वैवाहिक हि. | विवाहित |
| जीवनसंगी | अनुराधा कुमार |
| बच्चे | पुत्र अर्णव कुमार, मेधा रूपम, अभिश्री कुमार |
| शिक्षा | क्वींस कॉलेज, वाराणसी — यूपी बोर्ड में टॉप किया (1979) |
| विश्वविद्यालय | हार्वर्ड विश्वविद्यालय (HIID) से पर्यावरण अर्थशास्त्र में पोस्टग्रेजुएट |
| योग्यता | आईआईटी कानपुर — सिविल इंजीनियरिंग (1985 बैच) |
| पेशा | भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त |
| राष्ट्रीयता | भारतीय |
| धर्म | हिंदू |
ज्ञानेश कुमार जीवनी ——
भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त
भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और इस लोकतंत्र की आधारशिला स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया की संरक्षक संस्था भारतीय निर्वाचन आयोग है, जिसका नेतृत्व मुख्य चुनाव आयुक्त करता है। ज्ञानेश कुमार भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में इस पद पर आसीन हुए हैं। उनका जीवन एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च प्रशासनिक और संवैधानिक पदों तक पहुँचने की प्रेरणादायक कहानी है। एक इंजीनियर से आईएएस अधिकारी बने ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक सफर पाँच दशकों में फैला हुआ है, जिसमें उन्होंने केरल में जिला प्रशासन से लेकर केंद्र सरकार के सबसे संवेदनशील मंत्रालयों तक में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावीकरण, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन, इराक में फँसे भारतीयों को वापस लाना, और अब मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में देश के चुनावी तंत्र का संचालन — उनके करियर के कुछ ऐसे पड़ाव हैं जो उन्हें एक असाधारण प्रशासक के रूप में चिह्नित करते हैं। प्रस्तुत जीवनी में ज्ञानेश कुमार के जीवन, शिक्षा, प्रशासनिक करियर, उपलब्धियों, विवादों और मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनके योगदान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि——
ज्ञानेश कुमार का जन्म 27 जनवरी 1964 को उत्तर प्रदेश के आगरा शहर में हुआ था। उनका परिवार मूल रूप से आगरा के मीडकुर निवासी था, लेकिन उनके पिता की नौकरी के कारण परिवार आगरा में बस गया। उनके पिता डॉ. सुभोद कुमार गुप्ता एक चिकित्सक थे, जो मुख्य चिकित्सा अधिकारी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी माता श्रीमती सत्यवती गुप्ता हैं। ज्ञानेश कुमार का परिवार शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में गहराई से जुड़ा रहा है। उनके परिवार में 28 सदस्य डॉक्टर हैं, जो चिकित्सा के पेशे से जुड़े हुए हैं। हालाँकि, ज्ञानेश कुमार ने पारिवारिक परंपरा को तोड़ते हुए इंजीनियरिंग और प्रशासनिक सेवा का मार्ग चुना।
ज्ञानेश कुमार का विवाह हुआ और उनके तीन संतानें हैं। उनकी बड़ी बेटी मेधा रूपम उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले की जिलाधिकारी (डीएम) हैं। उनकी दूसरी बेटी अभिषर्पि भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) की अधिकारी हैं, और उनके पति अक्षय लाबरू आईएएस अधिकारी हैं। उनके दामाद मनीष बंसल भी आईएएस अधिकारी हैं। उनके पुत्र अर्णव कुमार अभी अपनी पढ़ाई कर रहे हैं। उनके भाई मनीष कुमार आईआरएस अधिकारी हैं, और उनकी बहन रोली इंदौर (मध्य प्रदेश) में एक विद्यालय चलाती हैं। रोली के पति उपेंद्र जैन आईपीएस अधिकारी हैं। इस प्रकार, ज्ञानेश कुमार का परिवार प्रशासनिक सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में गहराई से जुड़ा हुआ है।
शिक्षा का सफर: यूपी बोर्ड से हार्वर्ड तक——
ज्ञानेश कुमार की शैक्षणिक यात्रा असाधारण प्रतिभा और परिश्रम का प्रतीक है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गोरखपुर, लखनऊ और कानपुर के विद्यालयों में हुई। उन्होंने उत्तर प्रदेश बोर्ड की हाई स्कूल (कक्षा 10) परीक्षा वर्ष 1979 में और इंटरमीडिएट (कक्षा 12) परीक्षा वर्ष 1981 में उत्तीर्ण की, और दोनों परीक्षाओं में उन्होंने टॉप किया। उन्होंने लखनऊ के प्रतिष्ठित कॉल्विन तालुकदार कॉलेज में अध्ययन किया, जहाँ उन्हें उनकी शैक्षणिक प्रतिभा के लिए जाना जाता था।
इंटरमीडिएट के बाद ज्ञानेश कुमार ने संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई) उत्तीर्ण की और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, कानपुर (आईआईटी कानपुर) में प्रवेश लिया। उन्होंने वहाँ से सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक की डिग्री प्राप्त की। आईआईटी कानपुर के आधिकारिक पूर्व छात्र प्रोफाइल के अनुसार, वे बीटी/सीई स्नातक वर्ग 1985 से संबद्ध हैं। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू की। इस बीच, उन्होंने हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (हुडको) में भी कुछ समय तक काम किया।
ज्ञानेश कुमार की शिक्षा इंजीनियरिंग तक सीमित नहीं रही। उन्होंने इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड फाइनेंशियल एनालिस्ट्स ऑफ इंडिया (आईसीएफएआई) से बिजनेस फाइनेंस का अध्ययन किया और हार्वर्ड विश्वविद्यालय के हार्वर्ड इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (एचआईआईडी) से पर्यावरण अर्थशास्त्र में अध्ययन किया। इस प्रकार, उनकी शिक्षा में तीन अलग-अलग विषयों — सिविल इंजीनियरिंग, बिजनेस फाइनेंस और पर्यावरण अर्थशास्त्र — का समावेश है, जो उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाता है।
नवंबर 2025 में, आईआईटी कानपुर ने अपने 66वें स्थापना दिवस समारोह के दौरान ज्ञानेश कुमार को प्रतिष्ठित पूर्व छात्र पुरस्कार (डिस्टिंग्विश्ड एलुमनाई अवार्ड) से सम्मानित किया। यह पुरस्कार 1989 में स्थापित किया गया था और यह समाज और राष्ट्र के प्रति उत्कृष्ट उपलब्धियों और योगदान को मान्यता देता है।
प्रशासनिक करियर: आईएएस अधिकारी के रूप में पदार्पण——
ज्ञानेश कुमार ने वर्ष 1988 में भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) परीक्षा उत्तीर्ण की और केरल कैडर के आईएएस अधिकारी बने। उनके प्रशासनिक करियर की शुरुआत केरल से हुई, जहाँ उन्होंने उप कलेक्टर के रूप में पदभार संभाला। उन्हें पथनमथिट्टा में सब कलेक्टर के रूप में नियुक्त किया गया। इसके बाद उन्होंने केरल में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें कोच्चि नगर निगम के नगर आयुक्त, केरल राज्य सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक, एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर, गोश्री आइलैंड्स डेवलपमेंट अथॉरिटी के सचिव, त्रिवेंद्रम हवाई अड्डा विकास सोसाइटी के प्रबंध निदेशक और नई दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर के पद शामिल हैं। केरल में अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने वामपंथी और कांग्रेस दोनों सरकारों के अधीन कार्य किया, जो उनकी राजनीतिक तटस्थता और पेशेवर दक्षता को दर्शाता है।
केरल में अपने कार्यकाल के दौरान ज्ञानेश कुमार ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की — वर्ष 2014 में इराक में आईएसआईएस संकट के दौरान फँसे 183 भारतीयों को सुरक्षित वापस लाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इनमें 83 मलयाली नर्सें भी शामिल थीं। यह उनकी संकट प्रबंधन क्षमता और भारतीय नागरिकों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है।
केंद्रीय स्तर पर प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ——
ज्ञानेश कुमार ने केंद्र सरकार में भी कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उन्होंने रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव के रूप में वर्ष 2007 से 2017 तक कार्य किया, जो संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार के कार्यकाल के दौरान था। इसके अलावा, उन्होंने गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ निभाईं।
अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावीकरण और जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन——
ज्ञानेश कुमार के करियर का सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्याय उनके गृह मंत्रालय में कार्यकाल के दौरान सामने आया। वर्ष 2018 से 2021 तक गृह मंत्रालय में अपनी तैनाती के दौरान, उन्होंने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी करने और जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में पुनर्गठित करने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे उस 'क्रैक टीम' का हिस्सा थे जिसे कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाने के लिए कानूनी और प्रशासनिक रास्ता खोजने का काम सौंपा गया था। उन्होंने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक का मसौदा तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह भारत के संवैधानिक इतिहास का एक ऐतिहासिक निर्णय था, जिसने जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति को समाप्त कर दिया।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन——
गृह मंत्रालय में अपने कार्यकाल के दौरान, ज्ञानेश कुमार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण से जुड़ी संस्था — श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट — के गठन की जिम्मेदारी भी सौंपी गई। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस ट्रस्ट का गठन किया गया था, और ज्ञानेश कुमार ने इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिका निभाई। उन्हें इस ट्रस्ट के गठन से जुड़े प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं को संभालने की जिम्मेदारी दी गई थी।
संसदीय कार्य मंत्रालय और सहकारिता मंत्रालय——
गृह मंत्रालय के बाद, ज्ञानेश कुमार ने संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव के रूप में कार्य किया। इसके बाद वे सहकारिता मंत्रालय के सचिव के रूप में नियुक्त हुए, जहाँ उन्होंने मई 2022 से जनवरी 2024 तक कार्य किया। सहकारिता मंत्रालय का गठन वर्ष 2021 में किया गया था, और ज्ञानेश कुमार इस मंत्रालय के शुरुआती सचिवों में से एक थे। उन्होंने 31 जनवरी 2024 को सहकारिता मंत्रालय के सचिव के पद से सेवानिवृत्ति प्राप्त की।
चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति (मार्च 2024)——
ज्ञानेश कुमार की सेवानिवृत्ति के बाद उनका सार्वजनिक जीवन समाप्त नहीं हुआ, बल्कि एक नए और अधिक महत्वपूर्ण अध्याय की शुरुआत हुई। सेवानिवृत्ति के केवल दो महीने बाद, 14 मार्च 2024 को उन्हें भारतीय निर्वाचन आयोग में चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्त किया गया। उन्होंने 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला। यह नियुक्ति उस समय की गई जब देश में 18वीं लोकसभा के चुनाव की घोषणा होने वाली थी। उनके साथ डॉ. सुखबीर सिंह संधू को भी चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था। चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभालने के दूसरे ही दिन, 16 मार्च 2024 को निर्वाचन आयोग ने 2024 के लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम जारी कर दिया।
चुनाव आयुक्त के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, ज्ञानेश कुमार ने 18वीं लोकसभा के चुनाव और जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और दिल्ली विधानसभा चुनावों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह भारत के चुनावी इतिहास का एक व्यस्त और चुनौतीपूर्ण दौर था, जिसमें विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव का संचालन शामिल था।
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में नियुक्ति (फरवरी 2025)——
17 फरवरी 2025 को, विधि एवं न्याय मंत्रालय ने ज्ञानेश कुमार को भारत का अगला मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त करने की अधिसूचना जारी की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 17 फरवरी 2025 को उनकी नियुक्ति को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया। उन्होंने 19 फरवरी 2025 को निर्वाचन सदन, नई दिल्ली में भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला। उन्होंने राजीव कुमार का स्थान लिया, जिनका कार्यकाल 18 फरवरी 2025 को समाप्त हो गया था।
ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के तहत नियुक्त होने वाले पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। यह अधिनियम 2023 में पारित किया गया था, जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव किए। इस अधिनियम के तहत, तीन सदस्यीय चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया, जिससे सरकार को तीन सदस्यीय समिति में दो सदस्य हो गए।
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभालने के बाद, ज्ञानेश कुमार ने अपने पहले संदेश में कहा कि "राष्ट्र निर्माण का पहला कदम मतदान है" और "भारत का प्रत्येक नागरिक जिसने 18 वर्ष की आयु पूरी कर ली है, उसे मतदाता बनना चाहिए और सदैव मतदान करना चाहिए।" उन्होंने यह भी कहा कि "भारत के संविधान, निर्वाचन कानूनों, नियमों और उनके अंतर्गत जारी निर्देशों के अनुसार, निर्वाचन आयोग मतदाताओं के साथ था, है और सदैव रहेगा"। यह संदेश उनकी संवैधानिक प्रतिबद्धता और मतदाताओं के प्रति उनकी जिम्मेदारी को दर्शाता है।
उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक निर्धारित है, जो अगले लोकसभा चुनावों की घोषणा से कुछ महीने पहले समाप्त होगा। यदि वे अपना पूरा कार्यकाल पूरा करते हैं, तो वे भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्य चुनाव आयुक्तों में से एक होंगे।
मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल और निर्णय——
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर)——
ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल का सबसे विवादास्पद और चर्चित पहलू विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन — एसआईआर) रहा है। यह मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की एक प्रक्रिया है, जिसे दो दशकों से अधिक समय के बाद देश में फिर से लागू किया गया था। एसआईआर के तहत, देश भर में 12 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूचियों से हटाए जाने की सूचना मिली। इसका प्रभाव कई राज्यों के चुनावों में देखा गया। महाराष्ट्र में नाम जोड़े गए, जबकि बंगाल में कुल 92 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए, जिनमें मृत या अनुपस्थित के रूप में चिह्नित लोग भी शामिल थे।
एसआईआर प्रक्रिया में "तार्किक विसंगति" (लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी) श्रेणी का उपयोग किया गया, जिसकी विपक्षी दलों और चुनाव पर्यवेक्षकों ने कड़ी आलोचना की। उनका तर्क था कि यह श्रेणी बंगाल में पहले इस्तेमाल की गई, लेकिन महाराष्ट्र और हरियाणा में नहीं, जहाँ 2024 में विधानसभा चुनाव हुए थे। बंगाल चुनाव परिणामों की घोषणा के लगभग एक महीने बाद, ज्ञानेश कुमार ने दिल्ली में एक सम्मेलन में दावा किया कि "यह दुनिया में सबसे शुद्ध और सबसे सटीक मतदाता सूची है, जो यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक पात्र मतदाता सूची में है और प्रत्येक अपात्र नाम हटा दिया गया है"।
चुनाव आयुक्तों के आपत्ति——
एसआईआर प्रक्रिया के दौरान, निर्वाचन आयोग के अन्य दो चुनाव आयुक्तों — सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी — ने औपचारिक रूप से कम से कम 14 बार आपत्ति जताई। उनका कहना था कि ये निर्णय उनकी जानकारी के बिना लिए गए। इन आपत्तियों में वैधानिक मतदाता पंजीकरण फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची डेटाबेस पर केंद्रीकृत नियंत्रण जैसे मुद्दे शामिल थे। निर्वाचन आयोग ने कहा कि मतभेद विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं और एसआईआर सहित सभी अंतिम निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। हालाँकि, इन खुलासों ने ज्ञानेश कुमार के कार्यकाल की जाँच को तेज कर दिया है।
"वोट चोरी" के आरोप——
लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने 1 अगस्त 2025 को पहली बार "वोट चोरी" का आरोप लगाया। छह दिन बाद, उन्होंने बेंगलुरु सेंट्रल लोकसभा क्षेत्र के महादेवपुरा विधानसभा क्षेत्र का उदाहरण देते हुए एक विस्तृत प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें डुप्लिकेट मतदाताओं, अवैध पतों और एक ही पते से बड़ी संख्या में मतदाताओं के पंजीकरण का उल्लेख किया गया। ज्ञानेश कुमार ने राहुल गांधी के आरोपों को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में खारिज कर दिया और सुझाव दिया कि विपक्ष के नेता को शपथ पत्र दाखिल करना चाहिए या माफी मांगनी चाहिए।
पारदर्शिता पर सवाल——
संयुक्त विपक्ष की मशीन-रीडेबल मतदाता सूचियों और मतदान केंद्रों से सीसीटीवी फुटेज तक पहुँच की मांग को ज्ञानेश कुमार ने महिला मतदाताओं की निजता के उल्लंघन का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। इस निर्णय की विपक्षी दलों और नागरिक समाज संगठनों ने आलोचना की, जिनका मानना था कि यह पारदर्शिता को कमजोर करता है।
महाभियोग की मांग——
मार्च 2026 में, 130 लोकसभा सदस्यों और 63 राज्यसभा सदस्यों ने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का समर्थन किया। यह भारत के इतिहास में पहली बार हुआ जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग की मांग की गई। हालाँकि, यह प्रस्ताव संसद में पारित नहीं हो सका। इसके अलावा, केरल विधानसभा ने अक्टूबर 2026 में एक प्रस्ताव पारित कर ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग की, जिसमें एसआईआर प्रक्रिया में अनियमितताओं और निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर चिंता व्यक्त की गई। यह प्रस्ताव मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन द्वारा प्रस्तुत किया गया था और इसे संशोधनों के साथ पारित किया गया।
अंतर्राष्ट्रीय भूमिका: अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए की अध्यक्षता——
ज्ञानेश कुमार को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली है। 3 दिसंबर 2025 को, उन्होंने स्टॉकहोम, स्वीडन में अंतर्राष्ट्रीय लोकतंत्र और चुनाव सहायता संस्थान (इंटरनेशनल आईडीईए) की सदस्य राज्यों की परिषद की अध्यक्षता संभाली। यह पहली बार है जब भारत को इस संस्था की अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया है। भारत इंटरनेशनल आईडीईए का संस्थापक सदस्य है और इसके शासन प्रक्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग लेता रहा है। 35 सदस्य देशों वाले इस संगठन में भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ 90 करोड़ से अधिक मतदाता हैं। अध्यक्षता के दौरान, भारत चुनाव प्रबंधन निकायों को मजबूत करने और वैश्विक स्तर पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को बढ़ावा देने में अपने व्यापक अनुभव का उपयोग करेगा।
अपनी अध्यक्षता के तहत, ज्ञानेश कुमार ने लोकतंत्र और पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़े विषयों पर भारत का ध्यान केंद्रित किया है। उन्होंने 4 दिसंबर 2025 को स्टॉकहोम के स्वीडिश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स (यूआई) में एक संबोधन भी दिया। यह अंतर्राष्ट्रीय मान्यता भारत के चुनावी तंत्र की विश्वसनीयता और ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व कौशल का प्रमाण है।
व्यक्तिगत विशेषताएँ और कार्यशैली——
ज्ञानेश कुमार को उनके सहकर्मियों और परिचितों द्वारा एक मेहनती, अनुशासित और विवरण-उन्मुख अधिकारी के रूप में जाना जाता है। उनके पड़ोसी डॉ. सुभोद गुप्ता ने उनके बारे में कहा था कि "ज्ञानेश पढ़ाई में अच्छे थे। वे हाई स्कूल और इंटरमीडिएट परीक्षाओं में टॉपर थे। वे आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियर बने और आईएएस परीक्षा पास करने से पहले एक साल तक दिल्ली में हुडको में काम किया"। उन्हें "कहवा मैन" (Kahwa Man) के उपनाम से भी जाना जाता है, जो उनके दिल्ली के नॉर्थ ब्लॉक में कार्यकाल के दौरान मिला था। यह उपनाम उनके सादे और मिलनसार व्यक्तित्व को दर्शाता है।
उनकी कार्यशैली में विवरण पर ध्यान, प्रक्रियात्मक सटीकता और संवैधानिक प्रक्रियाओं के प्रति सम्मान प्रमुख है। यही कारण है कि उन्हें अनुच्छेद 370 और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे संवेदनशील मामलों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। एक पूर्व सहयोगी ने उनके बारे में कहा था कि "वे जो भी काम करते हैं, उसकी गहराई में जाते हैं"।
विरासत और प्रभाव——
ज्ञानेश कुमार का प्रशासनिक करियर पाँच दशकों में फैला हुआ है, जिसमें उन्होंने जिला स्तर से लेकर केंद्र सरकार के सचिव स्तर तक की जिम्मेदारियाँ निभाई हैं। उनकी सबसे उल्लेखनीय उपलब्धियों में अनुच्छेद 370 का निष्प्रभावीकरण, राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन, इराक से भारतीयों की वापसी, और अब मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में देश के चुनावी तंत्र का संचालन शामिल है। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल विवादों से घिरा रहा है, विशेष रूप से एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयुक्तों के भीतर मतभेदों के कारण। हालाँकि, उन्होंने अपने फैसलों का बचाव करते हुए कहा है कि निर्वाचन आयोग संविधान और निर्वाचन कानूनों के अनुसार कार्य कर रहा है और मतदाताओं के साथ खड़ा है।
उनका कार्यकाल 2029 तक चलने की संभावना है, और इस दौरान वे कई महत्वपूर्ण चुनावों का संचालन करेंगे। उनके नेतृत्व में निर्वाचन आयोग की भूमिका और कार्यशैली भारत के लोकतांत्रिक तंत्र के भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण साबित होगी। अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए की अध्यक्षता के माध्यम से उन्होंने भारत के चुनावी अनुभव को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर भी प्राप्त किया है।
50 रोचक जानकारियाँ——
ज्ञानेश कुमार भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
उन्होंने 19 फरवरी 2025 को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला।
उनका जन्म 27 जनवरी 1964 को आगरा, उत्तर प्रदेश में हुआ।
उनके पिता डॉ. सुभोद कुमार गुप्ता मुख्य चिकित्सा अधिकारी से सेवानिवृत्त हुए थे।
उनकी माता श्रीमती सत्यवती गुप्ता हैं।
उनके परिवार में 28 सदस्य डॉक्टर हैं।
उन्होंने यूपी बोर्ड हाई स्कूल 1979 में टॉप किया।
इंटरमीडिएट 1981 में भी टॉप किया।
उन्होंने लखनऊ के कॉल्विन तालुकदार कॉलेज में पढ़ाई की।
वे आईआईटी कानपुर से सिविल इंजीनियरिंग में बी.टेक हैं।
वे आईआईटी कानपुर के 1985 बैच के पूर्व छात्र हैं।
आईएएस से पहले उन्होंने हुडको में काम किया।
उन्होंने आईसीएफएआई से बिजनेस फाइनेंस पढ़ा।
उन्होंने हार्वर्ड के एचआईआईडी से पर्यावरण अर्थशास्त्र पढ़ा।
वे 1988 बैच के आईएएस अधिकारी हैं।
उनका कैडर केरल है।
वे पथनमथिट्टा में सब कलेक्टर रहे।
वे कोच्चि नगर निगम के नगर आयुक्त रहे।
वे केरल राज्य सहकारी बैंक के प्रबंध निदेशक रहे।
वे एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर रहे।
वे गोश्री आइलैंड्स डेवलपमेंट अथॉरिटी के सचिव रहे।
वे त्रिवेंद्रम हवाई अड्डा विकास सोसाइटी के एमडी रहे।
वे नई दिल्ली में केरल हाउस के रेजिडेंट कमिश्नर रहे।
उन्होंने केरल में वामपंथी और कांग्रेस दोनों सरकारों के साथ काम किया।
2014 में इराक से 183 भारतीयों को निकालने में भूमिका निभाई।
इनमें 83 मलयाली नर्सें भी शामिल थीं।
वे रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे।
वे गृह मंत्रालय में संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव रहे।
अनुच्छेद 370 हटाने की कानूनी राह खोजने वाली टीम का हिस्सा थे।
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक के मसौदे में भूमिका निभाई।
राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में जिम्मेदारी संभाली।
वे संसदीय कार्य मंत्रालय के सचिव रहे।
वे सहकारिता मंत्रालय के सचिव रहे।
उन्होंने 31 जनवरी 2024 को सेवानिवृत्ति ली।
सेवानिवृत्ति के दो महीने बाद चुनाव आयुक्त बने।
उन्होंने 15 मार्च 2024 को चुनाव आयुक्त के रूप में पदभार संभाला।
16 मार्च 2024 को लोकसभा चुनाव कार्यक्रम घोषित हुआ।
2024 लोकसभा चुनाव के संचालन में प्रमुख भूमिका निभाई।
जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड, दिल्ली चुनावों में भूमिका रही।
17 फरवरी 2025 को सीईसी नियुक्ति की अधिसूचना जारी हुई।
वे 2023 अधिनियम के तहत नियुक्त पहले मुख्य चुनाव आयुक्त हैं।
उनका कार्यकाल 26 जनवरी 2029 तक है।
उन्होंने कहा—“राष्ट्र निर्माण का पहला कदम मतदान है।”
उन्होंने कहा—“निर्वाचन आयोग मतदाताओं के साथ था, है और रहेगा।”
एसआईआर को लेकर उनका कार्यकाल विवादों में रहा।
राहुल गांधी के “वोट चोरी” आरोपों को उन्होंने खारिज किया।
सीसीटीवी फुटेज और एमआरएम पहुँच की मांग महिला मतदाताओं की निजता के आधार पर खारिज की।
रिपोर्टों के अनुसार मार्च 2026 में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव को 130 लोकसभा और 63 राज्यसभा सदस्यों का समर्थन मिला।
दिसंबर 2025 में उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए की अध्यक्षता संभाली।
नवंबर 2025 में आईआईटी कानपुर ने उन्हें डिस्टिंग्विश्ड एलुमनाई अवार्ड दिया; उन्हें “कहवा मैन” भी कहा जाता है।
50 FAQ——
ज्ञानेश कुमार कौन हैं?
भारत के 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त।
उनका जन्म कब हुआ?
27 जनवरी 1964।
जन्म स्थान क्या है?
आगरा, उत्तर प्रदेश।
उनके पिता कौन थे?
डॉ. सुभोद कुमार गुप्ता।
उनकी माता कौन हैं?
श्रीमती सत्यवती गुप्ता।
परिवार में कितने डॉक्टर हैं?
28 सदस्य।
स्कूली शिक्षा कहाँ हुई?
यूपी बोर्ड; 1979 और 1981 में टॉप किया।
कॉलेज कौन सा था?
कॉल्विन तालुकदार कॉलेज, लखनऊ।
इंजीनियरिंग कहाँ से की?
आईआईटी कानपुर, सिविल इंजीनियरिंग।
अन्य शिक्षा क्या है?
आईसीएफएआई से बिजनेस फाइनेंस; हार्वर्ड एचआईआईडी से पर्यावरण अर्थशास्त्र।
आईएएस बैच कौन सा है?
1988।
उनका कैडर क्या है?
केरल।
पहली पोस्टिंग क्या रही?
पथनमथिट्टा में सब कलेक्टर।
कोच्चि में क्या पद रहा?
नगर आयुक्त।
बैंकिंग क्षेत्र में क्या भूमिका रही?
केरल राज्य सहकारी बैंक के एमडी।
जिला कलेक्टर कहाँ रहे?
एर्नाकुलम।
केरल हाउस में क्या पद रहा?
रेजिडेंट कमिश्नर।
इराक evacuation में क्या भूमिका थी?
2014 में 183 भारतीयों को सुरक्षित निकाला।
रक्षा मंत्रालय में क्या पद रहा?
संयुक्त सचिव।
गृह मंत्रालय में क्या पद रहे?
संयुक्त सचिव और अतिरिक्त सचिव।
अनुच्छेद 370 में उनकी भूमिका क्या थी?
निष्प्रभावीकरण की कानूनी/प्रशासनिक प्रक्रिया में।
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन में?
विधेयक के मसौदे में भूमिका।
राम मंदिर ट्रस्ट में?
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के गठन में।
संसदीय कार्य मंत्रालय में?
सचिव।
सहकारिता मंत्रालय में?
सचिव।
सेवानिवृत्ति कब हुई?
31 जनवरी 2024।
चुनाव आयुक्त कब बने?
15 मार्च 2024।
लोकसभा चुनाव कार्यक्रम कब आया?
16 मार्च 2024।
कौन से चुनाव कराए?
2024 लोकसभा और कई विधानसभा चुनाव।
मुख्य चुनाव आयुक्त कब बने?
19 फरवरी 2025।
वे कौन से सीईसी हैं?
26वें।
किस अधिनियम के तहत नियुक्त हुए?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023।
उनका कार्यकाल कब तक है?
26 जनवरी 2029 तक।
उनका प्रसिद्ध नारा क्या है?
“राष्ट्र निर्माण का पहला कदम मतदान है।”
मतदाताओं के लिए उनका संदेश?
आयोग मतदाताओं के साथ था, है और रहेगा।
एसआईआर क्या है?
विशेष गहन पुनरीक्षण।
एसआईआर विवाद क्यों हुआ?
नाम हटाने और “तार्किक विसंगति” श्रेणी को लेकर।
अन्य चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई?
रिपोर्टों के अनुसार संधू और जोशी ने कई बार आपत्ति जताई।
आयोग का रुख क्या रहा?
मतभेद सामान्य; निर्णय सर्वसम्मत बताए गए।
राहुल गांधी के आरोप क्या थे?
“वोट चोरी” के आरोप।
ज्ञानेश कुमार ने क्या कहा?
आरोप खारिज किए; शपथ पत्र दें या माफी मांगें।
सीसीटीवी/एमआरएम मांग पर क्या हुआ?
निजता के आधार पर खारिज की गई।
महाभियोग की मांग हुई?
रिपोर्टों के अनुसार मार्च 2026 में समर्थन मिला।
केरल विधानसभा ने क्या किया?
अक्टूबर 2026 में हटाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया।
अंतर्राष्ट्रीय भूमिका क्या है?
दिसंबर 2025 में अंतर्राष्ट्रीय आईडीईए की अध्यक्षता।
आईआईटी कानपुर ने क्या सम्मान दिया?
नवंबर 2025 में डिस्टिंग्विश्ड एलुमनाई अवार्ड।
उनका उपनाम क्या है?
“कहवा मैन”।
परिवार में प्रशासनिक अधिकारी कौन हैं?
बेटी, दामाद, भाई आदि कई प्रशासनिक सेवाओं में हैं।
क्या वे पहले सीईसी हैं जिनके खिलाफ महाभियोग की चर्चा हुई?
रिपोर्टों के अनुसार ऐसा पहली बार हुआ।
उनकी विरासत क्या मानी जाती है?
विवादों और ऐतिहासिक निर्णयों के बीच चुनावी तंत्र का नेतृत्व।
निष्कर्ष——
ज्ञानेश कुमार का जीवन एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने अपनी मेहनत, बुद्धिमत्ता और समर्पण के बल पर देश के सर्वोच्च प्रशासनिक और संवैधानिक पदों तक पहुँच प्राप्त की। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर से निकलकर आईआईटी कानपुर, हार्वर्ड विश्वविद्यालय और फिर भारतीय प्रशासनिक सेवा तक का उनका सफर युवाओं के लिए प्रेरणादायक है। एक इंजीनियर से आईएएस अधिकारी बने ज्ञानेश कुमार ने अपने करियर में कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील जिम्मेदारियाँ निभाईं। अनुच्छेद 370 और राम मंदिर ट्रस्ट जैसे ऐतिहासिक मामलों में उनकी भूमिका ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल चुनौतियों और विवादों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने संवैधानिक प्रक्रियाओं और मतदाताओं के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी। भारत के लोकतंत्र की मजबूती और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए उनका योगदान ऐतिहासिक महत्व का है। उनकी जीवनी यह सिद्ध करती है कि दृढ़ संकल्प, शिक्षा और नैतिकता के बल पर कोई भी व्यक्ति राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।