बालकाण्ड

बंदउँ गुरु पद कंज श्लोक का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ 5 ॥


सरल हिन्दी अर्थ (Simple Meaning)

मैं अपने गुरु के चरणों के कमल को प्रणाम करता हूँ। वे कृपा के समुद्र हैं और मनुष्यों के रूप में अवतरित हुए भगवान हरि (विष्णु) ही हैं। उनके वचन अज्ञान रूपी गहरे अँधेरे को वैसे ही मिटा देते हैं, जैसे सूर्य की अनेक किरणें घने अँधेरे को समाप्त कर देती हैं।


शब्दार्थ (Word Meaning)


  • बंदउँ – मैं वंदन करता हूँ / प्रणाम करता हूँ

  • गुरु पद कंज – गुरु के कमल समान चरण

  • कृपा सिंधु – करुणा के समुद्र

  • नररूप हरि – मनुष्य रूप में भगवान हरि (विष्णु)

  • महामोह – बड़ा मोह, अज्ञान

  • तम पुंज – अंधकार का समूह

  • जासु बचन – जिनके वचन

  • रबि कर निकर – सूर्य की अनेक किरणें


भावार्थ (Bhavarth / Essence)


इस चौपाई में तुलसीदास जी अपने गुरु की महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि—

  • गुरु वास्तव में मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हैं।

  • उनकी कृपा असीम है, इसलिए उन्हें “कृपाओं का समुद्र” कहा गया है।

  • गुरु के वचन, उपदेश और ज्ञान में इतनी शक्ति है कि वे
    हमारे जीवन के अज्ञान, भ्रम, मोह और दुख के अंधकार को
    उसी प्रकार दूर कर देते हैं जैसे सुबह होते ही सूर्य की किरणें
    रात के अंधकार को समाप्त कर देती हैं।

इसमें गुरु की महिमा, उपदेश की शक्ति और आध्यात्मिक प्रकाश का वर्णन है।


FAQ in Hindi

1. ‘बंदउँ गुरु पद कंज’ का सरल अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है— मैं अपने गुरु के कमल समान चरणों को प्रणाम करता हूँ, जो कृपा के समुद्र हैं और मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हरि हैं।

2. तुलसीदास जी ने गुरु को ‘कृपा सिंधु’ क्यों कहा है?

क्योंकि गुरु अपनी अनंत कृपा और ज्ञान से भक्त के जीवन का अज्ञान, मोह और भ्रम दूर कर देते हैं।

3. ‘महामोह तम पुंज’ का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है— अत्यधिक मोह, अज्ञान और भ्रम का घना अंधकार।

4. ‘जासु बचन रबि कर निकर’ से क्या अभिप्राय है?

गुरु के वचन सूर्य की किरणों की तरह हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को पूरी तरह मिटा देते हैं।

5. यह चौपाई रामचरितमानस के किस भाग में आती है?

यह चौपाई बालकांड के मंगलाचरण (प्रारंभिक वंदना) में आती है।

6. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?

गुरु की महिमा, गुरु कृपा का महत्व और ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अंधकार का नाश होना।

बंदउँ गुरु पद कंज श्लोक का सरल हिंदी अर्थ

श्लोक

बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ 5 ॥


सरल हिन्दी अर्थ (Simple Meaning)

मैं अपने गुरु के चरणों के कमल को प्रणाम करता हूँ। वे कृपा के समुद्र हैं और मनुष्यों के रूप में अवतरित हुए भगवान हरि (विष्णु) ही हैं। उनके वचन अज्ञान रूपी गहरे अँधेरे को वैसे ही मिटा देते हैं, जैसे सूर्य की अनेक किरणें घने अँधेरे को समाप्त कर देती हैं।


शब्दार्थ (Word Meaning)


  • बंदउँ – मैं वंदन करता हूँ / प्रणाम करता हूँ

  • गुरु पद कंज – गुरु के कमल समान चरण

  • कृपा सिंधु – करुणा के समुद्र

  • नररूप हरि – मनुष्य रूप में भगवान हरि (विष्णु)

  • महामोह – बड़ा मोह, अज्ञान

  • तम पुंज – अंधकार का समूह

  • जासु बचन – जिनके वचन

  • रबि कर निकर – सूर्य की अनेक किरणें


भावार्थ (Bhavarth / Essence)


इस चौपाई में तुलसीदास जी अपने गुरु की महिमा का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि—

  • गुरु वास्तव में मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हैं।

  • उनकी कृपा असीम है, इसलिए उन्हें “कृपाओं का समुद्र” कहा गया है।

  • गुरु के वचन, उपदेश और ज्ञान में इतनी शक्ति है कि वे
    हमारे जीवन के अज्ञान, भ्रम, मोह और दुख के अंधकार को
    उसी प्रकार दूर कर देते हैं जैसे सुबह होते ही सूर्य की किरणें
    रात के अंधकार को समाप्त कर देती हैं।

इसमें गुरु की महिमा, उपदेश की शक्ति और आध्यात्मिक प्रकाश का वर्णन है।


FAQ in Hindi

1. ‘बंदउँ गुरु पद कंज’ का सरल अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है— मैं अपने गुरु के कमल समान चरणों को प्रणाम करता हूँ, जो कृपा के समुद्र हैं और मनुष्य रूप में स्वयं भगवान हरि हैं।

2. तुलसीदास जी ने गुरु को ‘कृपा सिंधु’ क्यों कहा है?

क्योंकि गुरु अपनी अनंत कृपा और ज्ञान से भक्त के जीवन का अज्ञान, मोह और भ्रम दूर कर देते हैं।

3. ‘महामोह तम पुंज’ का क्या मतलब है?

इसका अर्थ है— अत्यधिक मोह, अज्ञान और भ्रम का घना अंधकार।

4. ‘जासु बचन रबि कर निकर’ से क्या अभिप्राय है?

गुरु के वचन सूर्य की किरणों की तरह हैं, जो अज्ञान रूपी अंधकार को पूरी तरह मिटा देते हैं।

5. यह चौपाई रामचरितमानस के किस भाग में आती है?

यह चौपाई बालकांड के मंगलाचरण (प्रारंभिक वंदना) में आती है।

6. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?

गुरु की महिमा, गुरु कृपा का महत्व और ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान के अंधकार का नाश होना।