बंदउँ प्रथम महीसुर चरना — सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और FAQ | रामचरितमानस बालकाण्ड
???? पंक्तियाँ
“बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥२॥”
???? शब्दार्थ (Word Meaning)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बंदउँ | वंदना करता हूँ / प्रणाम करता हूँ |
| प्रथम | सबसे पहले |
| महीसुर | देवता / विद्वान / श्रेष्ठ जन |
| चरना | चरणों को / पाँव को |
| मोह | भ्रम, आसक्ति |
| जनित | से उत्पन्न |
| संसय | संदेह |
| हरना | दूर करना |
| सुजन | सज्जन लोग |
| समाज | समूह, सभा |
| सकल | सभी |
| गुन खानी | गुणों की खान, गुणों से भरपूर |
| सप्रेम | प्रेम सहित |
| सुबानी | अच्छी वाणी से / मधुर शब्दों में |
???? सरल हिन्दी अर्थ (Simple Meaning)
“मैं सबसे पहले देवताओं (विद्वानों/श्रेष्ठ सज्जनों) के चरणों की वंदना करता हूँ, जो मेरे मोह से उत्पन्न सभी संदेहों को दूर कर दें।
सज्जनों का समूह गुणों की खान है—मैं उन्हें प्रेमपूर्वक नमस्कार करता हूँ।”
???? भावार्थ (Bhavarth)
इन पंक्तियों में गोस्वामी तुलसीदास जी अपने ग्रंथ की शुरुआत में विनम्रता प्रकट करते हैं।
वे कहते हैं कि—
-
किसी भी शुभ कार्य से पहले हमें श्रेष्ठ जनों और देवतुल्य लोगों का सम्मान करना चाहिए।
-
ऐसा सम्मान हमारे भीतर के अज्ञान, भ्रम और संदेह को मिटाता है।
-
सज्जन लोग गुणों से परिपूर्ण होते हैं, इसलिए उनकी वंदना करने से मन निर्मल होता है और विचार शुद्ध होते हैं।
अर्थात, ज्ञान, विनम्रता और श्रेष्ठ प्रेरणाओं से भरा वातावरण किसी भी महान कार्य की शुरुआत के लिए आवश्यक है।
FAQ – “बंदउँ प्रथम महीसुर चरना…” दोहों से संबंधित
1️⃣ प्रश्न: “बंदउँ प्रथम महीसुर चरना” का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है — “मैं पहले देवताओं/श्रेष्ठ जनों के चरणों की वंदना करता हूँ।”
यह विनम्रता और आदर का सूचक है।
2️⃣ प्रश्न: यहाँ ‘महीसुर’ किसे कहा गया है?
उत्तर: ‘महीसुर’ का मतलब है — देवता, विद्वान, या श्रेष्ठ गुण वाले सज्जन।
तुलसीदास जी ने यह शब्द आदर के रूप में प्रयोग किया है।
3️⃣ प्रश्न: कवि ‘संसय’ हरने की बात क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: क्योंकि आध्यात्मिक मार्ग में भ्रम, मोह और संदेह बाधा बनते हैं।
श्रेष्ठ गुरुओं और सज्जनों की कृपा से ये संदेह दूर हो सकते हैं।
4️⃣ प्रश्न: “सुजन समाज सकल गुन खानी” का अर्थ क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ है — “सज्जनों का समाज गुणों की खान है।”
अर्थात, अच्छे लोगों में हर तरह के श्रेष्ठ गुण मौजूद होते हैं।
5️⃣ प्रश्न: तुलसीदास जी शुरुआत में वंदना क्यों करते हैं?
उत्तर: भारतीय परंपरा में किसी भी पवित्र कार्य की शुरुआत विनम्रता, आशीर्वाद और सत्पुरुषों की वंदना से होती है।
इससे मन निर्मल होता है और कार्य में सफलता मिलती है।
6️⃣ प्रश्न: “सप्रेम सुबानी” का क्या भाव है?
उत्तर: इसका भाव है—प्रेमपूर्ण और मधुर वाणी से प्रणाम करना।
यह दर्शाता है कि वंदना केवल शब्दों से नहीं, भाव से भी होनी चाहिए।
7️⃣ प्रश्न: ये दोहे कहाँ से लिए गए हैं?
उत्तर: ये दोहे गोस्वामी तुलसीदास की रचना श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड के मंगलाचरण का भाग हैं।
8️⃣ प्रश्न: इन पंक्तियों में मुख्य शिक्षा (संदेश) क्या है?
उत्तर:
-
विनम्रता रखना
-
श्रेष्ठ और सत्पुरुषों का आदर करना
-
संदेह और भ्रम दूर कर ज्ञान के मार्ग पर चलना
यही इन पंक्तियों का मूल संदेश है।
9️⃣ प्रश्न: क्या ये पंक्तियाँ दैनिक जीवन में लागू होती हैं?
उत्तर: हाँ।
हम भी अपने जीवन में बड़ों, शिक्षकों, ज्ञानी लोगों का सम्मान करें, उनकी संगति प्राप्त करें—इससे हमारा भ्रम और गलतफहमियाँ दूर होती हैं।
बंदउँ प्रथम महीसुर चरना — सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और FAQ | रामचरितमानस बालकाण्ड
???? पंक्तियाँ
“बंदउँ प्रथम महीसुर चरना। मोह जनित संसय सब हरना॥
सुजन समाज सकल गुन खानी। करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी॥२॥”
???? शब्दार्थ (Word Meaning)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बंदउँ | वंदना करता हूँ / प्रणाम करता हूँ |
| प्रथम | सबसे पहले |
| महीसुर | देवता / विद्वान / श्रेष्ठ जन |
| चरना | चरणों को / पाँव को |
| मोह | भ्रम, आसक्ति |
| जनित | से उत्पन्न |
| संसय | संदेह |
| हरना | दूर करना |
| सुजन | सज्जन लोग |
| समाज | समूह, सभा |
| सकल | सभी |
| गुन खानी | गुणों की खान, गुणों से भरपूर |
| सप्रेम | प्रेम सहित |
| सुबानी | अच्छी वाणी से / मधुर शब्दों में |
???? सरल हिन्दी अर्थ (Simple Meaning)
“मैं सबसे पहले देवताओं (विद्वानों/श्रेष्ठ सज्जनों) के चरणों की वंदना करता हूँ, जो मेरे मोह से उत्पन्न सभी संदेहों को दूर कर दें।
सज्जनों का समूह गुणों की खान है—मैं उन्हें प्रेमपूर्वक नमस्कार करता हूँ।”
???? भावार्थ (Bhavarth)
इन पंक्तियों में गोस्वामी तुलसीदास जी अपने ग्रंथ की शुरुआत में विनम्रता प्रकट करते हैं।
वे कहते हैं कि—
-
किसी भी शुभ कार्य से पहले हमें श्रेष्ठ जनों और देवतुल्य लोगों का सम्मान करना चाहिए।
-
ऐसा सम्मान हमारे भीतर के अज्ञान, भ्रम और संदेह को मिटाता है।
-
सज्जन लोग गुणों से परिपूर्ण होते हैं, इसलिए उनकी वंदना करने से मन निर्मल होता है और विचार शुद्ध होते हैं।
अर्थात, ज्ञान, विनम्रता और श्रेष्ठ प्रेरणाओं से भरा वातावरण किसी भी महान कार्य की शुरुआत के लिए आवश्यक है।
FAQ – “बंदउँ प्रथम महीसुर चरना…” दोहों से संबंधित
1️⃣ प्रश्न: “बंदउँ प्रथम महीसुर चरना” का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है — “मैं पहले देवताओं/श्रेष्ठ जनों के चरणों की वंदना करता हूँ।”
यह विनम्रता और आदर का सूचक है।
2️⃣ प्रश्न: यहाँ ‘महीसुर’ किसे कहा गया है?
उत्तर: ‘महीसुर’ का मतलब है — देवता, विद्वान, या श्रेष्ठ गुण वाले सज्जन।
तुलसीदास जी ने यह शब्द आदर के रूप में प्रयोग किया है।
3️⃣ प्रश्न: कवि ‘संसय’ हरने की बात क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: क्योंकि आध्यात्मिक मार्ग में भ्रम, मोह और संदेह बाधा बनते हैं।
श्रेष्ठ गुरुओं और सज्जनों की कृपा से ये संदेह दूर हो सकते हैं।
4️⃣ प्रश्न: “सुजन समाज सकल गुन खानी” का अर्थ क्या है?
उत्तर: इसका अर्थ है — “सज्जनों का समाज गुणों की खान है।”
अर्थात, अच्छे लोगों में हर तरह के श्रेष्ठ गुण मौजूद होते हैं।
5️⃣ प्रश्न: तुलसीदास जी शुरुआत में वंदना क्यों करते हैं?
उत्तर: भारतीय परंपरा में किसी भी पवित्र कार्य की शुरुआत विनम्रता, आशीर्वाद और सत्पुरुषों की वंदना से होती है।
इससे मन निर्मल होता है और कार्य में सफलता मिलती है।
6️⃣ प्रश्न: “सप्रेम सुबानी” का क्या भाव है?
उत्तर: इसका भाव है—प्रेमपूर्ण और मधुर वाणी से प्रणाम करना।
यह दर्शाता है कि वंदना केवल शब्दों से नहीं, भाव से भी होनी चाहिए।
7️⃣ प्रश्न: ये दोहे कहाँ से लिए गए हैं?
उत्तर: ये दोहे गोस्वामी तुलसीदास की रचना श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड के मंगलाचरण का भाग हैं।
8️⃣ प्रश्न: इन पंक्तियों में मुख्य शिक्षा (संदेश) क्या है?
उत्तर:
-
विनम्रता रखना
-
श्रेष्ठ और सत्पुरुषों का आदर करना
-
संदेह और भ्रम दूर कर ज्ञान के मार्ग पर चलना
यही इन पंक्तियों का मूल संदेश है।
9️⃣ प्रश्न: क्या ये पंक्तियाँ दैनिक जीवन में लागू होती हैं?
उत्तर: हाँ।
हम भी अपने जीवन में बड़ों, शिक्षकों, ज्ञानी लोगों का सम्मान करें, उनकी संगति प्राप्त करें—इससे हमारा भ्रम और गलतफहमियाँ दूर होती हैं।