बालकाण्ड

बंदउँ संत असज्जन चरना दोहा अर्थ | सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और FAQs

दोहे:

“बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥२॥”

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। इसमें संत और असंत (दुष्ट) – दोनों के स्वभाव और उनसे होने वाले अनुभव बताए गए हैं।


सरल अर्थ (Simple Meaning in Hindi)

मैं संत और असंत – दोनों के चरणों को प्रणाम करता हूँ।
क्योंकि इनके बीच कोई तीसरी श्रेणी है ही नहीं।

संत से बिछड़ना प्राण ले लेता है,
और असंत से मिलना भी अत्यंत कष्ट देता है।

अर्थात –
संत का साथ न मिलना भी दुखद है
और असंत का साथ मिलना भी दुखद है।


शब्दार्थ (Word Meaning)

शब्दअर्थ
बंदउँमैं वंदन करता हूँ / प्रणाम करता हूँ
संतसज्जन, श्रेष्ठ गुणों वाले लोग
असज्जनअसंत, दुष्ट, गलत स्वभाव वाले लोग
चरणाचरणों को, उनके प्रति आदर
दुःखप्रददुख देने वाले
बिछुरतअलग होने पर
प्रान हरि लेहींप्राण ले लेता है, बहुत दुख देता है
मिलतमिलना
दारुनभयानक
देहींशरीर को, मन को

भावार्थ (Bhavarth in Simple Language)

इस दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं—

  • संसार में दो ही प्रकार के लोग होते हैं—संत और असंत

  • संतों के साथ रहना सुखद होता है, और उनसे दूर होना दुख देता है –
    इतना दुख कि जैसे प्राण ही निकल जाएँ।

  • दूसरी ओर, असंतों का संग मिलना ही इतना पीड़ादायक है कि
    उनके पास जाने से ही कष्ट होने लगता है।

इसलिए जीवन में संतों का संग पाना सबसे बड़ा सौभाग्य है और
असंतों से बचकर रहना ही बुद्धिमानी है।


FAQ – बंदऊँ संत असज्जन चरना दोहा से जुड़े सामान्य प्रश्न

1. यह दोहा किसने लिखा है?

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास ने रचा है। यह उनके संत-स्वभाव की प्रशंसा और असंतों से सावधान करने वाला सुंदर उपदेश है।


2. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश यह है कि—
संतों का साथ सुख देता है, उनसे दूर होना दुख देता है।
और असंतों का साथ दुख और पीड़ा से भरा होता है।

इसलिए जीवन में सही संगति चुनना अत्यंत जरूरी है।


3. संतों से बिछड़ने पर ‘प्राण हर लेना’ का क्या मतलब है?

इसका अर्थ यह है कि—
संतों का संग जीवन में शांति, प्रेम और सद्भाव लाता है।
उनसे दूर होने पर वही सुख और शांति खत्म हो जाती है,
जिससे मन में गहरा दु:ख पैदा होता है।


4. असंत से मिलने पर दुख क्यों होता है?

असंत (दुष्ट या गलत स्वभाव वाला व्यक्ति) अपने व्यवहार, वाणी और कर्म से दूसरों को परेशान करता है।
उसका संग मन, विचार और जीवन—सब पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।


5. तुलसीदासजी ने संत और असंत दोनों को क्यों प्रणाम किया?

क्योंकि संसार में दो ही प्रकार के लोग होते हैं—

  1. संत

  2. असंत


उनके अलावा कोई तीसरी श्रेणी नहीं।
लेकिन प्रणाम का भाव अलग-अलग कारणों से है—

  • संतों को उनके श्रेष्ठ गुणों के लिए।

  • असंतों को उनसे बचकर रहने की प्रेरणा देने के लिए।


6. इस दोहे का आधुनिक जीवन में क्या उपयोग है?

आज भी यह दोहा संगति (Company / Satsang) के महत्व को बताता है।

  • अच्छे लोगों के साथ रहें, आप भी अच्छे बनेंगे।

  • बुरे लोगों से दूरी रखें, नहीं तो उनका स्वभाव आपको भी प्रभावित करेगा।


7. ‘दारुण दुख देहीं’ का क्या आशय है?

इसका अर्थ है—
संत प्रकार के लोगों से दूरी और असंत प्रकार के लोगों का संग – दोनों ही शरीर और मन को भारी पीड़ा देते हैं।

बंदउँ संत असज्जन चरना दोहा अर्थ | सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और FAQs

दोहे:

“बंदउँ संत असज्जन चरना। दुःखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥२॥”

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित है। इसमें संत और असंत (दुष्ट) – दोनों के स्वभाव और उनसे होने वाले अनुभव बताए गए हैं।


सरल अर्थ (Simple Meaning in Hindi)

मैं संत और असंत – दोनों के चरणों को प्रणाम करता हूँ।
क्योंकि इनके बीच कोई तीसरी श्रेणी है ही नहीं।

संत से बिछड़ना प्राण ले लेता है,
और असंत से मिलना भी अत्यंत कष्ट देता है।

अर्थात –
संत का साथ न मिलना भी दुखद है
और असंत का साथ मिलना भी दुखद है।


शब्दार्थ (Word Meaning)

शब्दअर्थ
बंदउँमैं वंदन करता हूँ / प्रणाम करता हूँ
संतसज्जन, श्रेष्ठ गुणों वाले लोग
असज्जनअसंत, दुष्ट, गलत स्वभाव वाले लोग
चरणाचरणों को, उनके प्रति आदर
दुःखप्रददुख देने वाले
बिछुरतअलग होने पर
प्रान हरि लेहींप्राण ले लेता है, बहुत दुख देता है
मिलतमिलना
दारुनभयानक
देहींशरीर को, मन को

भावार्थ (Bhavarth in Simple Language)

इस दोहे में तुलसीदासजी कहते हैं—

  • संसार में दो ही प्रकार के लोग होते हैं—संत और असंत

  • संतों के साथ रहना सुखद होता है, और उनसे दूर होना दुख देता है –
    इतना दुख कि जैसे प्राण ही निकल जाएँ।

  • दूसरी ओर, असंतों का संग मिलना ही इतना पीड़ादायक है कि
    उनके पास जाने से ही कष्ट होने लगता है।

इसलिए जीवन में संतों का संग पाना सबसे बड़ा सौभाग्य है और
असंतों से बचकर रहना ही बुद्धिमानी है।


FAQ – बंदऊँ संत असज्जन चरना दोहा से जुड़े सामान्य प्रश्न

1. यह दोहा किसने लिखा है?

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास ने रचा है। यह उनके संत-स्वभाव की प्रशंसा और असंतों से सावधान करने वाला सुंदर उपदेश है।


2. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश यह है कि—
संतों का साथ सुख देता है, उनसे दूर होना दुख देता है।
और असंतों का साथ दुख और पीड़ा से भरा होता है।

इसलिए जीवन में सही संगति चुनना अत्यंत जरूरी है।


3. संतों से बिछड़ने पर ‘प्राण हर लेना’ का क्या मतलब है?

इसका अर्थ यह है कि—
संतों का संग जीवन में शांति, प्रेम और सद्भाव लाता है।
उनसे दूर होने पर वही सुख और शांति खत्म हो जाती है,
जिससे मन में गहरा दु:ख पैदा होता है।


4. असंत से मिलने पर दुख क्यों होता है?

असंत (दुष्ट या गलत स्वभाव वाला व्यक्ति) अपने व्यवहार, वाणी और कर्म से दूसरों को परेशान करता है।
उसका संग मन, विचार और जीवन—सब पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।


5. तुलसीदासजी ने संत और असंत दोनों को क्यों प्रणाम किया?

क्योंकि संसार में दो ही प्रकार के लोग होते हैं—

  1. संत

  2. असंत


उनके अलावा कोई तीसरी श्रेणी नहीं।
लेकिन प्रणाम का भाव अलग-अलग कारणों से है—

  • संतों को उनके श्रेष्ठ गुणों के लिए।

  • असंतों को उनसे बचकर रहने की प्रेरणा देने के लिए।


6. इस दोहे का आधुनिक जीवन में क्या उपयोग है?

आज भी यह दोहा संगति (Company / Satsang) के महत्व को बताता है।

  • अच्छे लोगों के साथ रहें, आप भी अच्छे बनेंगे।

  • बुरे लोगों से दूरी रखें, नहीं तो उनका स्वभाव आपको भी प्रभावित करेगा।


7. ‘दारुण दुख देहीं’ का क्या आशय है?

इसका अर्थ है—
संत प्रकार के लोगों से दूरी और असंत प्रकार के लोगों का संग – दोनों ही शरीर और मन को भारी पीड़ा देते हैं।