बालकाण्ड

देव दनुज नर नाग दोहा: सरल अर्थ, भावार्थ, शब्दार्थ और FAQ

दोहा :

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७ (घ)


सरल हिन्दी अर्थ (शब्दार्थ सहित)

  • देव — देवता

  • दनुज — दैत्य, राक्षस

  • नर — मनुष्य

  • नाग — सर्प जाति

  • खग — पक्षी

  • प्रेत — भूत

  • पितर — पूर्वज

  • गंधर्ब — गंधर्व (स्वर्ग के गायक)

  • किंनर — दिव्य संगीतकार/अन्य दिव्य जाति

  • रजनिचर — रात में विचरण करने वाले राक्षस

  • सर्ब — सभी

  • बंदउँ — मैं प्रणाम करता हूँ

  • करहु कृपा — कृपा करें


सरल अर्थ:

मैं देवताओं, दैत्यों, मनुष्यों, नागों, पक्षियों, प्रेतों, पितरों, गंधर्वों, किन्नरों और रात्रि में विचरण करने वाले राक्षसों — सभी को प्रणाम करता हूँ। हे सब, अब मुझ पर कृपा करें।


भावार्थ (भक्ति और काव्य का गूढ़ अर्थ)

कवि विनम्र भाव से कहता है कि संसार में जहाँ-जहाँ भी कोई शक्ति, सत्ता या अस्तित्व है — देव, दैत्य, मानव, पशु-पक्षी, प्रेत-पितर, गंधर्व, किन्नर या राक्षस — मैं सबके आगे नतमस्तक हूँ।
वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रखता, सबको समान मानकर विनम्रता से नमस्कार करता है। यह विनम्रता और समभाव का प्रतीक है।

कवि इस दोहे के माध्यम से जगत की समस्त शक्तियों से आशीर्वाद माँगता है —

“मेरे कार्य को सफल करने के लिए आप सब कृपा करें।”


1. बहुत ही सरल, बच्चों जैसा अर्थ

इस दोहे में कवि कहता है—
मैं देवता, राक्षस, मनुष्य, साँप, पक्षी, भूत, पितरों, गंधर्वों, किन्नरों और रात में घूमने वाले राक्षसों—सबको नमस्ते करता हूँ।
आप सब मेरी मदद करें और मुझ पर कृपा करें।


2. परीक्षा/नोट्स के लिए छोटा और सरल अर्थ

कवि जगत की सभी जातियों—देव, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और राक्षस—को प्रणाम करता है।
वह कहता है कि सभी शक्तियाँ उस पर कृपा करें। यह विनम्रता और समभाव का भाव प्रकट करता है।


3. फेसबुक पोस्ट के लिए छोटा भावार्थ

कवि पूरे संसार की हर शक्ति—देव हो या दैत्य, मानव हो या पशु-पक्षी—सबको प्रणाम करता है।
वह कहता है, “सबकी कृपा मिले तो कोई काम असम्भव नहीं।”


FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह दोहा किसका है?

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड में आता है।


2. इस दोहे में किन-किन का उल्लेख किया गया है?

देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस (रजनिचर)।


3. कवि ने इतना विस्तृत सूची क्यों दी है?

कवि यह दिखाना चाहता है कि सृष्टि में जो भी शक्तियाँ हैं—सबको वह समान मानता है और प्रणाम करता है।


4. दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश है विनम्रता (humility) और समभाव (equality of all beings)
कवि कहता है कि सभी शक्तियों की कृपा से कार्य सफल होते हैं।


5. ‘रजनिचर’ का क्या अर्थ है?

रजनिचर = रात में विचरण करने वाले राक्षस।


6. ‘सर्ब’ का अर्थ क्या है?

सर्ब = सभी / सब लोग / सब प्रकार के प्राणी।


7. इस दोहे का भक्ति से क्या संबंध है?

यह दोहा भक्ति का प्रारंभिक भाव दर्शाता है, जहाँ भक्त स्वयं को छोटा मानकर पूरे ब्रह्मांड के सामने नतमस्तक होता है।


8. क्या यह दोहा किसी विशेष प्रसंग से जुड़ा है?

हाँ, यह रामचरितमानस के आरंभ में आता है, जहाँ तुलसीदास जी पूरी सृष्टि का स्मरण कर आशीर्वाद माँगते हैं, ताकि वे रामकथा रचना में सफल हों।


9. क्या यह दोहा ध्यान या पाठ में उपयोग किया जाता है?

हाँ, रामायण पाठ से पहले बहुत से लोग इसे मंगलाचरण (शुभारम्भ) के रूप में पढ़ते हैं।


10. इस दोहे से हमें क्या सीख मिलती है?

हमें यह सीख मिलती है कि
जो व्यक्ति सभी का सम्मान करता है, उसे सबकी कृपा और सहयोग मिलता है।

देव दनुज नर नाग दोहा: सरल अर्थ, भावार्थ, शब्दार्थ और FAQ

दोहा :

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब।
बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब॥७ (घ)


सरल हिन्दी अर्थ (शब्दार्थ सहित)

  • देव — देवता

  • दनुज — दैत्य, राक्षस

  • नर — मनुष्य

  • नाग — सर्प जाति

  • खग — पक्षी

  • प्रेत — भूत

  • पितर — पूर्वज

  • गंधर्ब — गंधर्व (स्वर्ग के गायक)

  • किंनर — दिव्य संगीतकार/अन्य दिव्य जाति

  • रजनिचर — रात में विचरण करने वाले राक्षस

  • सर्ब — सभी

  • बंदउँ — मैं प्रणाम करता हूँ

  • करहु कृपा — कृपा करें


सरल अर्थ:

मैं देवताओं, दैत्यों, मनुष्यों, नागों, पक्षियों, प्रेतों, पितरों, गंधर्वों, किन्नरों और रात्रि में विचरण करने वाले राक्षसों — सभी को प्रणाम करता हूँ। हे सब, अब मुझ पर कृपा करें।


भावार्थ (भक्ति और काव्य का गूढ़ अर्थ)

कवि विनम्र भाव से कहता है कि संसार में जहाँ-जहाँ भी कोई शक्ति, सत्ता या अस्तित्व है — देव, दैत्य, मानव, पशु-पक्षी, प्रेत-पितर, गंधर्व, किन्नर या राक्षस — मैं सबके आगे नतमस्तक हूँ।
वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रखता, सबको समान मानकर विनम्रता से नमस्कार करता है। यह विनम्रता और समभाव का प्रतीक है।

कवि इस दोहे के माध्यम से जगत की समस्त शक्तियों से आशीर्वाद माँगता है —

“मेरे कार्य को सफल करने के लिए आप सब कृपा करें।”


1. बहुत ही सरल, बच्चों जैसा अर्थ

इस दोहे में कवि कहता है—
मैं देवता, राक्षस, मनुष्य, साँप, पक्षी, भूत, पितरों, गंधर्वों, किन्नरों और रात में घूमने वाले राक्षसों—सबको नमस्ते करता हूँ।
आप सब मेरी मदद करें और मुझ पर कृपा करें।


2. परीक्षा/नोट्स के लिए छोटा और सरल अर्थ

कवि जगत की सभी जातियों—देव, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और राक्षस—को प्रणाम करता है।
वह कहता है कि सभी शक्तियाँ उस पर कृपा करें। यह विनम्रता और समभाव का भाव प्रकट करता है।


3. फेसबुक पोस्ट के लिए छोटा भावार्थ

कवि पूरे संसार की हर शक्ति—देव हो या दैत्य, मानव हो या पशु-पक्षी—सबको प्रणाम करता है।
वह कहता है, “सबकी कृपा मिले तो कोई काम असम्भव नहीं।”


FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह दोहा किसका है?

यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित रामचरितमानस के बालकांड में आता है।


2. इस दोहे में किन-किन का उल्लेख किया गया है?

देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गंधर्व, किन्नर और रात्रि में विचरण करने वाले राक्षस (रजनिचर)।


3. कवि ने इतना विस्तृत सूची क्यों दी है?

कवि यह दिखाना चाहता है कि सृष्टि में जो भी शक्तियाँ हैं—सबको वह समान मानता है और प्रणाम करता है।


4. दोहे का मुख्य संदेश क्या है?

मुख्य संदेश है विनम्रता (humility) और समभाव (equality of all beings)
कवि कहता है कि सभी शक्तियों की कृपा से कार्य सफल होते हैं।


5. ‘रजनिचर’ का क्या अर्थ है?

रजनिचर = रात में विचरण करने वाले राक्षस।


6. ‘सर्ब’ का अर्थ क्या है?

सर्ब = सभी / सब लोग / सब प्रकार के प्राणी।


7. इस दोहे का भक्ति से क्या संबंध है?

यह दोहा भक्ति का प्रारंभिक भाव दर्शाता है, जहाँ भक्त स्वयं को छोटा मानकर पूरे ब्रह्मांड के सामने नतमस्तक होता है।


8. क्या यह दोहा किसी विशेष प्रसंग से जुड़ा है?

हाँ, यह रामचरितमानस के आरंभ में आता है, जहाँ तुलसीदास जी पूरी सृष्टि का स्मरण कर आशीर्वाद माँगते हैं, ताकि वे रामकथा रचना में सफल हों।


9. क्या यह दोहा ध्यान या पाठ में उपयोग किया जाता है?

हाँ, रामायण पाठ से पहले बहुत से लोग इसे मंगलाचरण (शुभारम्भ) के रूप में पढ़ते हैं।


10. इस दोहे से हमें क्या सीख मिलती है?

हमें यह सीख मिलती है कि
जो व्यक्ति सभी का सम्मान करता है, उसे सबकी कृपा और सहयोग मिलता है।