हरि हर जस राकेस राहु से — सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ, व्याख्या व FAQs
दोहे:
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी - 2
यह दोहा (या चौपाई) श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड से लिया गया है। इसमें तुलसीदास जी ने वैरभाव, परनिंदा और परहित की भावनाओं को सरल रूप में समझाया है।
शब्दार्थ (Simple Meaning Word-by-Word)
हरि हर जस राकेस राहु से।
– जैसे भगवान हरि (विष्णु) और हर (शिव) का यश-गान (महिमा) राहु को सहन नहीं होता।
पर अकाज भट सहसबाहु से॥
– और जैसे सहस्रार्जुन (सहसबाहु) दूसरों के अच्छे काम (पराक्रम) को पसंद नहीं करता था।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी।
– ऐसे लोग, जिनके मन में सैकड़ों आँखें हों परनिंदा देखने-ढूँढने के लिए… (अर्थात दूसरों की गलतियों को खोजने में लगे रहते हैं)
पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
– पर दूसरों के हित (भलाई) की बात उनके मन में घी लगाने जैसी चिकनी होकर फिसल जाती है (अर्थात उन्हें परहित पसंद ही नहीं आता)।
सरल हिंदी अर्थ (Easy Simple Hindi Translation)
जैसे राहु को भगवान शिव-विष्णु की महिमा अच्छी नहीं लगती,
और जैसे सहस्रार्जुन को दूसरों का अच्छा काम सहन नहीं होता,
उसी तरह कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की छोटी-सी गलती को भी बहुत बढ़ाकर देखते हैं,
लेकिन जब दूसरों की भलाई करने की बात आती है, तो वह उनके मन में टिकती ही नहीं—
जैसे घी चिकने बर्तन से फिसल जाता है।
भावार्थ (Bhavarth / Moral Explanation)
इस चौपाई में तुलसीदास जी बताते हैं कि:
-
कुछ लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे दूसरों की गलतियाँ ढूँढने में माहिर होते हैं।
-
उन्हें परनिंदा में बड़ा आनंद आता है।
-
लेकिन जब किसी का अच्छा करना, किसी की मदद करना या उसके गुणों को देखना होता है, तो उनसे सहा नहीं जाता।
-
ऐसे लोगों का मन ईर्ष्या और दुर्भावना से भरा होता है—वे स्वयं दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख पहुँचाते हैं।
संदेश:
परनिंदा छोड़कर परहित का मार्ग चुनना ही सच्ची मानवता है।
जो दूसरों के गुणों को देखकर खुश हो सके, वही वास्तव में महान है।
सुंदर व्याख्या (Heart-touching Explanation)
गोस्वामी तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से मनुष्य के स्वभाव का एक गहरा रहस्य बताते हैं।
वे कहते हैं कि संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं—
एक, जिनके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा, सरलता और परहित की भावना होती है;
और दूसरे, जिनके मन में ईर्ष्या, निंदा और दुर्भावना भरी रहती है।
तुलसीदास जी पहले उदाहरण के रूप में कहते हैं—
जैसे राहु को सूर्य और चंद्रमा की तेजोमयी आभा सहन नहीं होती,
वैसे ही कुछ लोगों को भगवान हरि और हर (विष्णु व शिव) की महिमा भी नहीं सुहाती।
दूसरों के गुण, दूसरों की सफलता, दूसरों की अच्छाई—
उन्हें जलन से भर देती है।
फिर वे कहते हैं—
दुनिया में सहस्रार्जुन जैसे लोग भी होते हैं,
जो स्वयं चाहे कितने ही बलशाली क्यों न हों,
पर दूसरों की अच्छाई और पराक्रम उन्हें रत्तीभर सहन नहीं होता।
दूसरों का अच्छा काम देखकर उनके भीतर की ईर्ष्या जाग उठती है।
ऐसे लोग दूसरों की गलती खोजने में बहुत समर्थ होते हैं—
जैसे उनके पास सैकड़ों आँखें हों।
छोटी-सी त्रुटि भी उन्हें पहाड़ की तरह दिखती है।
वे परनिंदा में आनंद पाते हैं,
दूसरों को गिरता देखकर संतोष पाते हैं।
लेकिन जब बात आती है परहित की—
दूसरों की मदद, दूसरों के हित की,
तो वह भावना उनके मन में टिकती ही नहीं।
जैसे घी चिकने बर्तन पर डालो तो टिकता नहीं,
वैसे ही परहित की भावना उनके भीतर टिकती नहीं,
फिसलकर निकल जाती है।
तुलसीदास जी का संकेत बहुत गहरा है—
वे मनुष्य को यह समझाना चाहते हैं कि
परनिंदा और ईर्ष्या का मन रखने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं रह सकता।
वह अपने ही भीतर की आग में जलता रहता है।
दूसरों का गुण देखने से जो आनंद मिलता है,
दूसरों की भलाई करने से जो पुण्य मिलता है—
वह आनंद और पुण्य उसे कभी प्राप्त नहीं होता।
इसके विपरीत, जो मनुष्य दूसरों के गुणों को देखकर खुशी महसूस करे,
जो परहित में आनंद पाए,
वही व्यक्ति वास्तव में ईश्वर का प्रिय और समाज का आदरणीय बनता है।
संदेश यही है—
दिल को इतना साफ रखो कि
किसी की अच्छाई देखकर ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा मिले।
किसी की गलती देखकर निंदा नहीं, समभाव हो।
और किसी का हित करने में तुम्हारा मन प्रसन्न हो—
तभी जीवन सफल होता है।
FAQs — हरि हर जस राकेस राहु से (प्रश्न–उत्तर)
1. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?
यह चौपाई बताती है कि कुछ लोगों को दूसरों की अच्छाई, गुण और सफलता सहन नहीं होती। वे हमेशा दोष ढूँढते हैं पर परहित की बातें उनके मन में नहीं टिकतीं। इसका संदेश है—परनिंदा छोड़ें, परहित अपनाएँ।
2. ‘राहु को हरि-हर का यश सहन न होना’ क्या दर्शाता है?
राहु का स्वभाव ही ऐसा है कि वह चंद्र और सूर्य का तेज सहन नहीं कर सकता। इसी प्रकार कुछ लोग स्वभावतः दूसरों की महानता देखकर दुखी होते हैं—यह ईर्ष्या का प्रतीक है।
3. सहस्रार्जुन (सहसबाहु) का उदाहरण क्यों दिया गया है?
सहस्रार्जुन शक्तिशाली था, पर दूसरों के श्रेष्ठ कार्य उसे बिल्कुल पसंद नहीं आते थे। इसलिए तुलसीदास जी उसे उन लोगों का उदाहरण बनाते हैं जो दूसरों की सफलता से जलते हैं।
4. “जे पर दोष लखहिं सहसाखी” का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है—कुछ लोग दूसरों की गलती खोजने में ऐसे माहिर होते हैं जैसे उनके पास सैकड़ों आँखें हों। वे हमेशा त्रुटियाँ ही देखते हैं, गुण नहीं।
5. “पर हित घृत जिन्ह के मन माखी” का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है—दूसरों के हित की बातें ऐसे लोगों के मन में नहीं टिकतीं, जैसे घी चिकने बर्तन पर नहीं टिकता। यह परहित से उदासीनता दिखाता है।
6. यह चौपाई हमें किस प्रकार का जीवन जीने की प्रेरणा देती है?
यह चौपाई हमें प्रेरणा देती है कि—
-
दूसरों की अच्छाई में आनंद महसूस करें।
-
परनिंदा और ईर्ष्या से दूर रहें।
-
दूसरों की भलाई करने में प्रसन्नता पाएं।
यही सच्ची मानवता है।
7. क्या यह चौपाई आधुनिक जीवन में भी लागू होती है?
हाँ, बिल्कुल। आज भी कई लोग दूसरों की सफलता देखकर जलते हैं और गलतियाँ खोजते हैं। यह चौपाई सिखाती है कि स्वच्छ हृदय, सकारात्मक दृष्टि और परहित हमेशा श्रेष्ठ हैं।
8. क्या यह चौपाई केवल धार्मिक संदेश देती है?
नहीं, इसका संदेश मानव व्यवहार और नैतिकता से जुड़ा है। यह हमें ईर्ष्या, द्वेष और परनिंदा से बचकर सद्भाव और उदारता अपनाने की सीख देती है।
9. इस चौपाई को किसने लिखा है और कहाँ मिलता है?
यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड में मिलती है।
10. इस चौपाई का अंतिम सार क्या है?
अंतिम सार यह है कि—
दूसरों की अच्छाई देखकर प्रेरित हों
दूसरों की गलती ढूँढने से बचें
परहित को जीवन का धर्म बनाएं
यही मनुष्यता की सर्वोत्तम पहचान है
हरि हर जस राकेस राहु से — सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ, व्याख्या व FAQs
दोहे:
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी - 2
यह दोहा (या चौपाई) श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड से लिया गया है। इसमें तुलसीदास जी ने वैरभाव, परनिंदा और परहित की भावनाओं को सरल रूप में समझाया है।
शब्दार्थ (Simple Meaning Word-by-Word)
हरि हर जस राकेस राहु से।
– जैसे भगवान हरि (विष्णु) और हर (शिव) का यश-गान (महिमा) राहु को सहन नहीं होता।
पर अकाज भट सहसबाहु से॥
– और जैसे सहस्रार्जुन (सहसबाहु) दूसरों के अच्छे काम (पराक्रम) को पसंद नहीं करता था।
जे पर दोष लखहिं सहसाखी।
– ऐसे लोग, जिनके मन में सैकड़ों आँखें हों परनिंदा देखने-ढूँढने के लिए… (अर्थात दूसरों की गलतियों को खोजने में लगे रहते हैं)
पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
– पर दूसरों के हित (भलाई) की बात उनके मन में घी लगाने जैसी चिकनी होकर फिसल जाती है (अर्थात उन्हें परहित पसंद ही नहीं आता)।
सरल हिंदी अर्थ (Easy Simple Hindi Translation)
जैसे राहु को भगवान शिव-विष्णु की महिमा अच्छी नहीं लगती,
और जैसे सहस्रार्जुन को दूसरों का अच्छा काम सहन नहीं होता,
उसी तरह कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की छोटी-सी गलती को भी बहुत बढ़ाकर देखते हैं,
लेकिन जब दूसरों की भलाई करने की बात आती है, तो वह उनके मन में टिकती ही नहीं—
जैसे घी चिकने बर्तन से फिसल जाता है।
भावार्थ (Bhavarth / Moral Explanation)
इस चौपाई में तुलसीदास जी बताते हैं कि:
-
कुछ लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे दूसरों की गलतियाँ ढूँढने में माहिर होते हैं।
-
उन्हें परनिंदा में बड़ा आनंद आता है।
-
लेकिन जब किसी का अच्छा करना, किसी की मदद करना या उसके गुणों को देखना होता है, तो उनसे सहा नहीं जाता।
-
ऐसे लोगों का मन ईर्ष्या और दुर्भावना से भरा होता है—वे स्वयं दुखी रहते हैं और दूसरों को भी दुख पहुँचाते हैं।
संदेश:
परनिंदा छोड़कर परहित का मार्ग चुनना ही सच्ची मानवता है।
जो दूसरों के गुणों को देखकर खुश हो सके, वही वास्तव में महान है।
सुंदर व्याख्या (Heart-touching Explanation)
गोस्वामी तुलसीदास जी इस चौपाई के माध्यम से मनुष्य के स्वभाव का एक गहरा रहस्य बताते हैं।
वे कहते हैं कि संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं—
एक, जिनके मन में ईश्वर के प्रति श्रद्धा, सरलता और परहित की भावना होती है;
और दूसरे, जिनके मन में ईर्ष्या, निंदा और दुर्भावना भरी रहती है।
तुलसीदास जी पहले उदाहरण के रूप में कहते हैं—
जैसे राहु को सूर्य और चंद्रमा की तेजोमयी आभा सहन नहीं होती,
वैसे ही कुछ लोगों को भगवान हरि और हर (विष्णु व शिव) की महिमा भी नहीं सुहाती।
दूसरों के गुण, दूसरों की सफलता, दूसरों की अच्छाई—
उन्हें जलन से भर देती है।
फिर वे कहते हैं—
दुनिया में सहस्रार्जुन जैसे लोग भी होते हैं,
जो स्वयं चाहे कितने ही बलशाली क्यों न हों,
पर दूसरों की अच्छाई और पराक्रम उन्हें रत्तीभर सहन नहीं होता।
दूसरों का अच्छा काम देखकर उनके भीतर की ईर्ष्या जाग उठती है।
ऐसे लोग दूसरों की गलती खोजने में बहुत समर्थ होते हैं—
जैसे उनके पास सैकड़ों आँखें हों।
छोटी-सी त्रुटि भी उन्हें पहाड़ की तरह दिखती है।
वे परनिंदा में आनंद पाते हैं,
दूसरों को गिरता देखकर संतोष पाते हैं।
लेकिन जब बात आती है परहित की—
दूसरों की मदद, दूसरों के हित की,
तो वह भावना उनके मन में टिकती ही नहीं।
जैसे घी चिकने बर्तन पर डालो तो टिकता नहीं,
वैसे ही परहित की भावना उनके भीतर टिकती नहीं,
फिसलकर निकल जाती है।
तुलसीदास जी का संकेत बहुत गहरा है—
वे मनुष्य को यह समझाना चाहते हैं कि
परनिंदा और ईर्ष्या का मन रखने वाला व्यक्ति कभी भी सुखी नहीं रह सकता।
वह अपने ही भीतर की आग में जलता रहता है।
दूसरों का गुण देखने से जो आनंद मिलता है,
दूसरों की भलाई करने से जो पुण्य मिलता है—
वह आनंद और पुण्य उसे कभी प्राप्त नहीं होता।
इसके विपरीत, जो मनुष्य दूसरों के गुणों को देखकर खुशी महसूस करे,
जो परहित में आनंद पाए,
वही व्यक्ति वास्तव में ईश्वर का प्रिय और समाज का आदरणीय बनता है।
संदेश यही है—
दिल को इतना साफ रखो कि
किसी की अच्छाई देखकर ईर्ष्या नहीं, प्रेरणा मिले।
किसी की गलती देखकर निंदा नहीं, समभाव हो।
और किसी का हित करने में तुम्हारा मन प्रसन्न हो—
तभी जीवन सफल होता है।
FAQs — हरि हर जस राकेस राहु से (प्रश्न–उत्तर)
1. इस चौपाई का मुख्य संदेश क्या है?
यह चौपाई बताती है कि कुछ लोगों को दूसरों की अच्छाई, गुण और सफलता सहन नहीं होती। वे हमेशा दोष ढूँढते हैं पर परहित की बातें उनके मन में नहीं टिकतीं। इसका संदेश है—परनिंदा छोड़ें, परहित अपनाएँ।
2. ‘राहु को हरि-हर का यश सहन न होना’ क्या दर्शाता है?
राहु का स्वभाव ही ऐसा है कि वह चंद्र और सूर्य का तेज सहन नहीं कर सकता। इसी प्रकार कुछ लोग स्वभावतः दूसरों की महानता देखकर दुखी होते हैं—यह ईर्ष्या का प्रतीक है।
3. सहस्रार्जुन (सहसबाहु) का उदाहरण क्यों दिया गया है?
सहस्रार्जुन शक्तिशाली था, पर दूसरों के श्रेष्ठ कार्य उसे बिल्कुल पसंद नहीं आते थे। इसलिए तुलसीदास जी उसे उन लोगों का उदाहरण बनाते हैं जो दूसरों की सफलता से जलते हैं।
4. “जे पर दोष लखहिं सहसाखी” का अर्थ क्या है?
इसका अर्थ है—कुछ लोग दूसरों की गलती खोजने में ऐसे माहिर होते हैं जैसे उनके पास सैकड़ों आँखें हों। वे हमेशा त्रुटियाँ ही देखते हैं, गुण नहीं।
5. “पर हित घृत जिन्ह के मन माखी” का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है—दूसरों के हित की बातें ऐसे लोगों के मन में नहीं टिकतीं, जैसे घी चिकने बर्तन पर नहीं टिकता। यह परहित से उदासीनता दिखाता है।
6. यह चौपाई हमें किस प्रकार का जीवन जीने की प्रेरणा देती है?
यह चौपाई हमें प्रेरणा देती है कि—
-
दूसरों की अच्छाई में आनंद महसूस करें।
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परनिंदा और ईर्ष्या से दूर रहें।
-
दूसरों की भलाई करने में प्रसन्नता पाएं।
यही सच्ची मानवता है।
7. क्या यह चौपाई आधुनिक जीवन में भी लागू होती है?
हाँ, बिल्कुल। आज भी कई लोग दूसरों की सफलता देखकर जलते हैं और गलतियाँ खोजते हैं। यह चौपाई सिखाती है कि स्वच्छ हृदय, सकारात्मक दृष्टि और परहित हमेशा श्रेष्ठ हैं।
8. क्या यह चौपाई केवल धार्मिक संदेश देती है?
नहीं, इसका संदेश मानव व्यवहार और नैतिकता से जुड़ा है। यह हमें ईर्ष्या, द्वेष और परनिंदा से बचकर सद्भाव और उदारता अपनाने की सीख देती है।
9. इस चौपाई को किसने लिखा है और कहाँ मिलता है?
यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना श्री रामचरितमानस – बालकाण्ड में मिलती है।
10. इस चौपाई का अंतिम सार क्या है?
अंतिम सार यह है कि—
दूसरों की अच्छाई देखकर प्रेरित हों
दूसरों की गलती ढूँढने से बचें
परहित को जीवन का धर्म बनाएं
यही मनुष्यता की सर्वोत्तम पहचान है