जड़ चेतन गुन दोषमय विश्व कीन्ह करतार – अर्थ और भावार्थ
दोहा:
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥
सरल हिंदी अर्थ:
सृष्टि का निर्माता (भगवान) ने यह संसार बनाया है, जिसमें जड़ (पृथ्वी, पदार्थ) और चेतन (जीव, आत्मा) सभी गुण और दोषों से भरे हैं।
संत, जैसे हंस (सादगी और शुद्धता का प्रतीक) अपने भीतर के अच्छे गुणों को पहचानते हैं और बुरे दोषों या विकारों से दूर रहते हैं।
भावार्थ:
-
इस संसार में हर चीज में गुण और दोष दोनों हैं।
-
भगवान ने सबको बनाया है, इसलिए कोई चीज पूर्ण रूप से अच्छी या बुरी नहीं है।
-
संत अपने अनुभव और ज्ञान से अच्छाई (गुण) को अपनाते हैं और बुराई (दोष, विकार) को त्यागते हैं।
-
हंस की तरह, जो दूध और पानी अलग कर लेता है, संत भी अपने जीवन में गुण और दोष की पहचान करके दोषों से दूर रहते हैं।
कहानी रूप में समझें:
एक गाँव में दो मित्र रहते थे – राम और श्याम।
-
राम हमेशा अच्छा सोचता और दूसरों की मदद करता।
-
श्याम कभी-कभी झूठ बोलता और दूसरों को धोखा देता।
एक दिन दोनों ने गाँव के तालाब में हंस देखा। हंस पानी में से दूध और पानी अलग कर रहा था।
राम ने श्याम से कहा – “देखो हंस कैसे साफ दूध को अलग करता है और पानी को छोड़ देता है। इसी तरह, हमें अपने जीवन में भी अच्छाई और बुराई अलग करनी चाहिए।”
राम ने जैसे हंस की तरह अपने गुणों (सच्चाई, दया, प्रेम) को अपनाया और दोषों (झूठ, क्रोध, लोभ) से दूर रहा। श्याम ने इसे नहीं समझा और बुरे कर्म करता रहा।
कहानी का भाव:
-
संसार में सब चीजों में गुण और दोष होते हैं।
-
संत और ज्ञानी लोग, हंस की तरह, अपने जीवन में अच्छाई को अपनाते हैं और बुराई से दूर रहते हैं।
-
यही संत का जीवन और शिक्षा है – गुण अपनाना और विकार त्यागना।
सरल सार:
संसार में सब चीज़ों में गुण और दोष हैं।
संत हंस की तरह अपने गुण को अपनाएँ और दोषों से दूर रहें।
बहुत सरल सार:
संसार में अच्छाई और बुराई दोनों हैं।
अच्छाई अपनाओ, बुराई छोड़ो।
दोहा FAQ – जड़ चेतन गुन दोषमय विश्व कीन्ह करतार
Q1: इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
A: संसार में हर चीज में गुण और दोष हैं। संत अपने जीवन में अच्छाई को अपनाते हैं और बुराई से दूर रहते हैं।
Q2: “हंस” का यहाँ क्या अर्थ है?
A: हंस का अर्थ है पवित्रता और विवेक। हंस दूध और पानी अलग कर देता है। इसी तरह संत भी अपने जीवन में गुण और दोष अलग करते हैं।
Q3: जड़ और चेतन का क्या अर्थ है?
A:
-
जड़: जिनमें जीवन चेतना नहीं है, जैसे पृथ्वी, पानी, पेड़।
-
चेतन: जिनमें आत्मा या जीवन है, जैसे इंसान, जीव-जंतु।
Q4: संतों का जीवन क्यों हंस की तरह बताया गया है?
A: हंस पानी और दूध अलग कर लेता है। इसी तरह संत अच्छाई और बुराई को अलग कर अपने जीवन को शुद्ध रखते हैं।
Q5: इस दोहे से हमें क्या सीख मिलती है?
A: हमें अपने जीवन में गुण अपनाने चाहिए और दोष/विकारों से दूर रहना चाहिए।
Q6: क्या यह दोहा भक्ति और ज्ञान का संदेश देता है?
A: हाँ, यह दोहा भक्ति और ज्ञान दोनों का संदेश देता है – भगवान ने संसार बनाया है और संत ज्ञान से जीवन को शुद्ध रखते हैं।
जड़ चेतन गुन दोषमय विश्व कीन्ह करतार – अर्थ और भावार्थ
दोहा:
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥6॥
सरल हिंदी अर्थ:
सृष्टि का निर्माता (भगवान) ने यह संसार बनाया है, जिसमें जड़ (पृथ्वी, पदार्थ) और चेतन (जीव, आत्मा) सभी गुण और दोषों से भरे हैं।
संत, जैसे हंस (सादगी और शुद्धता का प्रतीक) अपने भीतर के अच्छे गुणों को पहचानते हैं और बुरे दोषों या विकारों से दूर रहते हैं।
भावार्थ:
-
इस संसार में हर चीज में गुण और दोष दोनों हैं।
-
भगवान ने सबको बनाया है, इसलिए कोई चीज पूर्ण रूप से अच्छी या बुरी नहीं है।
-
संत अपने अनुभव और ज्ञान से अच्छाई (गुण) को अपनाते हैं और बुराई (दोष, विकार) को त्यागते हैं।
-
हंस की तरह, जो दूध और पानी अलग कर लेता है, संत भी अपने जीवन में गुण और दोष की पहचान करके दोषों से दूर रहते हैं।
कहानी रूप में समझें:
एक गाँव में दो मित्र रहते थे – राम और श्याम।
-
राम हमेशा अच्छा सोचता और दूसरों की मदद करता।
-
श्याम कभी-कभी झूठ बोलता और दूसरों को धोखा देता।
एक दिन दोनों ने गाँव के तालाब में हंस देखा। हंस पानी में से दूध और पानी अलग कर रहा था।
राम ने श्याम से कहा – “देखो हंस कैसे साफ दूध को अलग करता है और पानी को छोड़ देता है। इसी तरह, हमें अपने जीवन में भी अच्छाई और बुराई अलग करनी चाहिए।”
राम ने जैसे हंस की तरह अपने गुणों (सच्चाई, दया, प्रेम) को अपनाया और दोषों (झूठ, क्रोध, लोभ) से दूर रहा। श्याम ने इसे नहीं समझा और बुरे कर्म करता रहा।
कहानी का भाव:
-
संसार में सब चीजों में गुण और दोष होते हैं।
-
संत और ज्ञानी लोग, हंस की तरह, अपने जीवन में अच्छाई को अपनाते हैं और बुराई से दूर रहते हैं।
-
यही संत का जीवन और शिक्षा है – गुण अपनाना और विकार त्यागना।
सरल सार:
संसार में सब चीज़ों में गुण और दोष हैं।
संत हंस की तरह अपने गुण को अपनाएँ और दोषों से दूर रहें।
बहुत सरल सार:
संसार में अच्छाई और बुराई दोनों हैं।
अच्छाई अपनाओ, बुराई छोड़ो।
दोहा FAQ – जड़ चेतन गुन दोषमय विश्व कीन्ह करतार
Q1: इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
A: संसार में हर चीज में गुण और दोष हैं। संत अपने जीवन में अच्छाई को अपनाते हैं और बुराई से दूर रहते हैं।
Q2: “हंस” का यहाँ क्या अर्थ है?
A: हंस का अर्थ है पवित्रता और विवेक। हंस दूध और पानी अलग कर देता है। इसी तरह संत भी अपने जीवन में गुण और दोष अलग करते हैं।
Q3: जड़ और चेतन का क्या अर्थ है?
A:
-
जड़: जिनमें जीवन चेतना नहीं है, जैसे पृथ्वी, पानी, पेड़।
-
चेतन: जिनमें आत्मा या जीवन है, जैसे इंसान, जीव-जंतु।
Q4: संतों का जीवन क्यों हंस की तरह बताया गया है?
A: हंस पानी और दूध अलग कर लेता है। इसी तरह संत अच्छाई और बुराई को अलग कर अपने जीवन को शुद्ध रखते हैं।
Q5: इस दोहे से हमें क्या सीख मिलती है?
A: हमें अपने जीवन में गुण अपनाने चाहिए और दोष/विकारों से दूर रहना चाहिए।
Q6: क्या यह दोहा भक्ति और ज्ञान का संदेश देता है?
A: हाँ, यह दोहा भक्ति और ज्ञान दोनों का संदेश देता है – भगवान ने संसार बनाया है और संत ज्ञान से जीवन को शुद्ध रखते हैं।