कबीरदास दोहा अर्थ: भलो भलाइहि पै | सरल अर्थ, भावार्थ व FAQ
दोहा
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
अच्छा व्यक्ति हमेशा अच्छे कर्मों से ही फल प्राप्त करता है, और नीच (बुरे) व्यक्ति अपनी नीच प्रवृत्ति के कारण बुरा ही पाता है।
जैसे अमृत का गुण है कि वह जीवन देता है, इसलिए उसकी प्रशंसा होती है; और ज़हर का स्वभाव है नष्ट करने का, इसलिए वह निंदनीय है।
शब्दार्थ (Word Meaning)
-
भलो – अच्छा
-
भलाइहि पै – अच्छाई के कारण
-
लहइ – प्राप्त करता है
-
निचाइहि नीचु – नीच व्यक्ति नीचता ही
-
सुधा – अमृत
-
सराहिअ – प्रशंसित, सराहना करना
-
गरल – ज़हर
-
मीचु – निंदा या बुरा कहना
भावार्थ (Bhavarth)
इस दोहे में बताया गया है कि व्यक्ति का व्यवहार ही उसके मिलने वाले फल का कारण होता है।
अच्छा व्यक्ति अपनी भलाई के कारण सम्मान पाता है और बुरे व्यक्ति को उसकी बुराई ही वापस मिलती है।
जैसे अमृत अपने गुणों के कारण सराहा जाता है और ज़हर अपने नाशकारी स्वभाव के कारण बुरा कहा जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्मों और स्वभाव के अनुसार ही आदर या तिरस्कार पाता है।
संदेश:
जो जैसा करता है, वैसा ही पाता है। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म और अच्छा स्वभाव रखना चाहिए।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह दोहा किसका है?
यह दोहा कबीरदास जी के दोहों में से एक माना जाता है, जो मनुष्य के स्वभाव और कर्मों पर आधारित है।
2. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
दोहा बताता है कि अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा ही मिलता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार, हर व्यक्ति उसी के अनुसार फल पाता है जैसा वह करता है।
3. दोहे में अमृत और ज़हर का उदाहरण क्यों दिया गया है?
अमृत और ज़हर प्रकृति के स्पष्ट उदाहरण हैं —
-
अमृत जीवन देने वाला है, इसलिए प्रशंसनीय है।
-
ज़हर विनाशकारी है, इसलिए निंदनीय है।
इसी प्रकार अच्छे और बुरे व्यक्तियों की पहचान उनके गुणों से होती है।
4. “निचाइहि नीचु” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि नीच (बुरा) व्यक्ति बुराई ही करता है और बुरा ही फल पाता है, क्योंकि उसकी प्रवृत्ति ही नीच होती है।
5. इस दोहे का जीवन में क्या उपयोग है?
यह दोहा सिखाता है कि—
-
हमेशा अच्छे कर्म,
-
सहयोग, सद्भाव,
-
और सकारात्मकता
अपनानी चाहिए।
क्योंकि हमारे व्यवहार और कर्म ही हमारी प्रतिष्ठा और परिणाम तय करते हैं।
6. क्या यह दोहा कर्म सिद्धांत से सम्बंधित है?
हाँ, यह दोहा कर्म सिद्धांत पर आधारित है —
“जैसा कर्म, वैसा फल।
कबीरदास दोहा अर्थ: भलो भलाइहि पै | सरल अर्थ, भावार्थ व FAQ
दोहा
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
अच्छा व्यक्ति हमेशा अच्छे कर्मों से ही फल प्राप्त करता है, और नीच (बुरे) व्यक्ति अपनी नीच प्रवृत्ति के कारण बुरा ही पाता है।
जैसे अमृत का गुण है कि वह जीवन देता है, इसलिए उसकी प्रशंसा होती है; और ज़हर का स्वभाव है नष्ट करने का, इसलिए वह निंदनीय है।
शब्दार्थ (Word Meaning)
-
भलो – अच्छा
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भलाइहि पै – अच्छाई के कारण
-
लहइ – प्राप्त करता है
-
निचाइहि नीचु – नीच व्यक्ति नीचता ही
-
सुधा – अमृत
-
सराहिअ – प्रशंसित, सराहना करना
-
गरल – ज़हर
-
मीचु – निंदा या बुरा कहना
भावार्थ (Bhavarth)
इस दोहे में बताया गया है कि व्यक्ति का व्यवहार ही उसके मिलने वाले फल का कारण होता है।
अच्छा व्यक्ति अपनी भलाई के कारण सम्मान पाता है और बुरे व्यक्ति को उसकी बुराई ही वापस मिलती है।
जैसे अमृत अपने गुणों के कारण सराहा जाता है और ज़हर अपने नाशकारी स्वभाव के कारण बुरा कहा जाता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी अपने कर्मों और स्वभाव के अनुसार ही आदर या तिरस्कार पाता है।
संदेश:
जो जैसा करता है, वैसा ही पाता है। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म और अच्छा स्वभाव रखना चाहिए।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह दोहा किसका है?
यह दोहा कबीरदास जी के दोहों में से एक माना जाता है, जो मनुष्य के स्वभाव और कर्मों पर आधारित है।
2. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
दोहा बताता है कि अच्छे कर्मों का फल अच्छा और बुरे कर्मों का फल बुरा ही मिलता है।
प्रकृति के नियम के अनुसार, हर व्यक्ति उसी के अनुसार फल पाता है जैसा वह करता है।
3. दोहे में अमृत और ज़हर का उदाहरण क्यों दिया गया है?
अमृत और ज़हर प्रकृति के स्पष्ट उदाहरण हैं —
-
अमृत जीवन देने वाला है, इसलिए प्रशंसनीय है।
-
ज़हर विनाशकारी है, इसलिए निंदनीय है।
इसी प्रकार अच्छे और बुरे व्यक्तियों की पहचान उनके गुणों से होती है।
4. “निचाइहि नीचु” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि नीच (बुरा) व्यक्ति बुराई ही करता है और बुरा ही फल पाता है, क्योंकि उसकी प्रवृत्ति ही नीच होती है।
5. इस दोहे का जीवन में क्या उपयोग है?
यह दोहा सिखाता है कि—
-
हमेशा अच्छे कर्म,
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सहयोग, सद्भाव,
-
और सकारात्मकता
अपनानी चाहिए।
क्योंकि हमारे व्यवहार और कर्म ही हमारी प्रतिष्ठा और परिणाम तय करते हैं।
6. क्या यह दोहा कर्म सिद्धांत से सम्बंधित है?
हाँ, यह दोहा कर्म सिद्धांत पर आधारित है —
“जैसा कर्म, वैसा फल।