भल अनभल निज निज करतूती चौपाई का अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ व FAQs
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥
शब्दार्थ (Word Meaning)
भल अनभल – अच्छा-बुरा
निज निज – अपना-अपना (प्रत्येक प्राणी)
करतूती – कर्म, आचरण
लहत – पाते हैं
सुजस – अच्छा यश (सम्मान)
अपलोक – अपयश, बदनामी
बिभूती – प्रभाव, फल
सुधा – अमृत
सुधाकर – चन्द्रमा
सुरसरि – गंगा नदी
साधू – संत
गरल – विष
अनल – अग्नि
कलिमल – पाप, अपशकुन
सरि – समान
ब्याधू – रोग, दुख
गुन अवगुन – गुण और दोष
भाव – भावनाएँ, दृष्टिकोण
नीक – अच्छी
तेहि – उसी
सोई – वही फल पाता है
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
(चौपाई 1)
हर व्यक्ति अपने-अपने अच्छे और बुरे कर्म करता है। उन्हीं के अनुसार वह अच्छा नाम, यश या फिर अपयश पाता है।
अमृत, चन्द्रमा, गंगा, और संत – ये सब शुभ और शीतलता देने वाले हैं।
वहीं विष, अग्नि, कलियुग के पाप और रोग – ये दुख और कष्ट देने वाले हैं।
(चौपाई 2)
दुनिया में हर कोई गुण और दोष को जानता है।
लेकिन जैसा भाव (दृष्टिकोण) व्यक्ति रखता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
जो जिस चीज़ को जैसे मन से देखता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है।
भावार्थ (Bhavarth / Deep Meaning)
इन पंक्तियों का मुख्य संदेश यह है कि—
1. कर्म का फल निश्चित है
हर व्यक्ति स्वयं अपने कर्मों से ही यश या अपयश, सुख या दुख पाता है।
अच्छे कर्म अच्छे फल लाते हैं और बुरे कर्म बुरा परिणाम देते हैं।
जैसे अमृत, चंद्रमा, गंगा और संत – सब शुभ हैं;
विष, अग्नि और पाप – सब अशुभ हैं।
यह प्रकृति का नियम है।
2. मन का भाव फल को बदल देता है
दुनिया वही दिखती है जैसा हमारा मन होता है।
अगर भाव अच्छा है, तो संसार भी अच्छा दिखेगा।
अगर भाव बुरा है, तो वही चीज़ बुरी लगने लगेगी।
हमारे विचार ही हमारे अनुभवों को अच्छा या बुरा बनाते हैं।
3. मनुष्य स्वयं अपना भविष्य बनाता है
कर्म और भाव—दोनों मिलकर मनुष्य का जीवन तय करते हैं।
इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह अच्छे कर्म करे और सकारात्मक भावना रखे।
FAQs – भल अनभल निज निज करतूती… (सरल हिन्दी में)
Q1. इन चौपाइयों का मुख्य संदेश क्या है?
Ans. मुख्य संदेश यह है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही फल पाता है। अच्छा करो तो अच्छा मिलेगा, बुरा करो तो बुरा फल अवश्य मिलेगा।
Q2. “भल अनभल निज निज करतूती” का सरल अर्थ क्या है?
Ans. हर मनुष्य अपने-अपने अच्छे या बुरे कर्म करता है और उन्हीं के अनुसार अच्छे या बुरे परिणाम प्राप्त करता है।
Q3. चौपाई में “सुधा, सुधाकर, सुरसरि, साधू” से क्या मतलब है?
Ans. ये सभी शुभ और कल्याणकारी चीज़ों का प्रतीक हैं —
-
सुधा = अमृत
-
सुधाकर = चन्द्रमा
-
सुरसरि = गंगा
-
साधू = संत
ये सभी शांति, सुख और पवित्रता देते हैं।
Q4. “गरल, अनल, कलिमल, ब्याधू” का क्या अर्थ है?
Ans. ये सभी दुख और कष्ट देने वाली चीज़ों के प्रतीक हैं—
-
गरल = विष
-
अनल = अग्नि
-
कलिमल = कलियुग के पाप
-
ब्याधू = रोग
ये जीवन में पीड़ा और कष्ट का कारण बनते हैं।
Q5. “गुन अवगुन जानत सब कोई” का क्या आशय है?
Ans. इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति गुण और दोष पहचान सकता है। हर कोई जानता है कि क्या सही है और क्या गलत।
Q6. “जो जेहि भाव नीक तेहि सोई” का अर्थ क्या है?
Ans. इसका अर्थ है: जिस व्यक्ति का जैसा भाव (दृष्टिकोण, सोच) होगा, उसे वैसा ही परिणाम मिलेगा।
अच्छी सोच से अच्छे अनुभव और बुरी सोच से बुरे अनुभव आते हैं।
Q7. क्या यह चौपाई कर्म के महत्व को बताती है?
Ans. हाँ, यह चौपाई स्पष्ट रूप से कहती है कि मनुष्य अपने कर्मों का ही फल भोगता है। यह कर्म सिद्धांत का सुंदर वर्णन है।
Q8. क्या इस चौपाई को जीवन में लागू किया जा सकता है?
Ans. बिल्कुल।
-
अच्छे कर्म करें
-
सकारात्मक भाव रखें
-
दोष और बुराई से बचें
-
संत और सद्गुणों के मार्ग पर चलें
तभी जीवन में सुख और यश मिलता है।
Q9. यह चौपाई किस ग्रंथ से ली गई है?
Ans. यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास की रचना से है, अक्सर रामचरितमानस और विनयपत्रिका के संदर्भों में उद्धृत होती है।
Q10. इस चौपाई का गूढ़ भावार्थ क्या है?
Ans. गूढ़ भावार्थ यह है कि दुनिया आपके कर्म और मन दोनों का प्रतिबिंब है।
आप जैसा सोचते हैं और जैसा आचरण करते हैं, संसार वैसा ही आपके सामने परिणाम देता है।
भल अनभल निज निज करतूती चौपाई का अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ व FAQs
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥4॥
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥5॥
शब्दार्थ (Word Meaning)
भल अनभल – अच्छा-बुरा
निज निज – अपना-अपना (प्रत्येक प्राणी)
करतूती – कर्म, आचरण
लहत – पाते हैं
सुजस – अच्छा यश (सम्मान)
अपलोक – अपयश, बदनामी
बिभूती – प्रभाव, फल
सुधा – अमृत
सुधाकर – चन्द्रमा
सुरसरि – गंगा नदी
साधू – संत
गरल – विष
अनल – अग्नि
कलिमल – पाप, अपशकुन
सरि – समान
ब्याधू – रोग, दुख
गुन अवगुन – गुण और दोष
भाव – भावनाएँ, दृष्टिकोण
नीक – अच्छी
तेहि – उसी
सोई – वही फल पाता है
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
(चौपाई 1)
हर व्यक्ति अपने-अपने अच्छे और बुरे कर्म करता है। उन्हीं के अनुसार वह अच्छा नाम, यश या फिर अपयश पाता है।
अमृत, चन्द्रमा, गंगा, और संत – ये सब शुभ और शीतलता देने वाले हैं।
वहीं विष, अग्नि, कलियुग के पाप और रोग – ये दुख और कष्ट देने वाले हैं।
(चौपाई 2)
दुनिया में हर कोई गुण और दोष को जानता है।
लेकिन जैसा भाव (दृष्टिकोण) व्यक्ति रखता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
जो जिस चीज़ को जैसे मन से देखता है, उसे वैसा ही अनुभव होता है।
भावार्थ (Bhavarth / Deep Meaning)
इन पंक्तियों का मुख्य संदेश यह है कि—
1. कर्म का फल निश्चित है
हर व्यक्ति स्वयं अपने कर्मों से ही यश या अपयश, सुख या दुख पाता है।
अच्छे कर्म अच्छे फल लाते हैं और बुरे कर्म बुरा परिणाम देते हैं।
जैसे अमृत, चंद्रमा, गंगा और संत – सब शुभ हैं;
विष, अग्नि और पाप – सब अशुभ हैं।
यह प्रकृति का नियम है।
2. मन का भाव फल को बदल देता है
दुनिया वही दिखती है जैसा हमारा मन होता है।
अगर भाव अच्छा है, तो संसार भी अच्छा दिखेगा।
अगर भाव बुरा है, तो वही चीज़ बुरी लगने लगेगी।
हमारे विचार ही हमारे अनुभवों को अच्छा या बुरा बनाते हैं।
3. मनुष्य स्वयं अपना भविष्य बनाता है
कर्म और भाव—दोनों मिलकर मनुष्य का जीवन तय करते हैं।
इसलिए व्यक्ति को चाहिए कि वह अच्छे कर्म करे और सकारात्मक भावना रखे।
FAQs – भल अनभल निज निज करतूती… (सरल हिन्दी में)
Q1. इन चौपाइयों का मुख्य संदेश क्या है?
Ans. मुख्य संदेश यह है कि हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार ही फल पाता है। अच्छा करो तो अच्छा मिलेगा, बुरा करो तो बुरा फल अवश्य मिलेगा।
Q2. “भल अनभल निज निज करतूती” का सरल अर्थ क्या है?
Ans. हर मनुष्य अपने-अपने अच्छे या बुरे कर्म करता है और उन्हीं के अनुसार अच्छे या बुरे परिणाम प्राप्त करता है।
Q3. चौपाई में “सुधा, सुधाकर, सुरसरि, साधू” से क्या मतलब है?
Ans. ये सभी शुभ और कल्याणकारी चीज़ों का प्रतीक हैं —
-
सुधा = अमृत
-
सुधाकर = चन्द्रमा
-
सुरसरि = गंगा
-
साधू = संत
ये सभी शांति, सुख और पवित्रता देते हैं।
Q4. “गरल, अनल, कलिमल, ब्याधू” का क्या अर्थ है?
Ans. ये सभी दुख और कष्ट देने वाली चीज़ों के प्रतीक हैं—
-
गरल = विष
-
अनल = अग्नि
-
कलिमल = कलियुग के पाप
-
ब्याधू = रोग
ये जीवन में पीड़ा और कष्ट का कारण बनते हैं।
Q5. “गुन अवगुन जानत सब कोई” का क्या आशय है?
Ans. इसका अर्थ है कि हर व्यक्ति गुण और दोष पहचान सकता है। हर कोई जानता है कि क्या सही है और क्या गलत।
Q6. “जो जेहि भाव नीक तेहि सोई” का अर्थ क्या है?
Ans. इसका अर्थ है: जिस व्यक्ति का जैसा भाव (दृष्टिकोण, सोच) होगा, उसे वैसा ही परिणाम मिलेगा।
अच्छी सोच से अच्छे अनुभव और बुरी सोच से बुरे अनुभव आते हैं।
Q7. क्या यह चौपाई कर्म के महत्व को बताती है?
Ans. हाँ, यह चौपाई स्पष्ट रूप से कहती है कि मनुष्य अपने कर्मों का ही फल भोगता है। यह कर्म सिद्धांत का सुंदर वर्णन है।
Q8. क्या इस चौपाई को जीवन में लागू किया जा सकता है?
Ans. बिल्कुल।
-
अच्छे कर्म करें
-
सकारात्मक भाव रखें
-
दोष और बुराई से बचें
-
संत और सद्गुणों के मार्ग पर चलें
तभी जीवन में सुख और यश मिलता है।
Q9. यह चौपाई किस ग्रंथ से ली गई है?
Ans. यह चौपाई गोस्वामी तुलसीदास की रचना से है, अक्सर रामचरितमानस और विनयपत्रिका के संदर्भों में उद्धृत होती है।
Q10. इस चौपाई का गूढ़ भावार्थ क्या है?
Ans. गूढ़ भावार्थ यह है कि दुनिया आपके कर्म और मन दोनों का प्रतिबिंब है।
आप जैसा सोचते हैं और जैसा आचरण करते हैं, संसार वैसा ही आपके सामने परिणाम देता है।