पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं—सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और महत्वपूर्ण FAQs
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं।
जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
जब शरीर पर कोई बुरा और हानिकारक काम लग जाता है (अर्थात कोई संकट, आघात या चोट पहुँचती है), तब शरीर उसे खुद ही छोड़ देता है—जैसे बर्फ की ओट में रखा दाना (बीज) गलकर नष्ट हो जाता है और मिट जाता है।
बंदउँ खल जस सेष सरोषा।
सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥
मैं दुष्टों को उसी प्रकार नमस्कार करता हूँ जैसे क्रोधित शेषनाग करते हैं—जिनके हजार मुख हैं और वे भी उनके दोषों का वर्णन करने लगें, तो भी पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
शब्दार्थ (Word Meanings)
-
पर अकाजु – बुरा काम, अनर्थ
-
तनु परिहरहीं – शरीर छोड़ देता है, समाप्त हो जाता है
-
जिमि – जैसे
-
हिम – बर्फ
-
उपल – कंकड़, पत्थर (यहाँ बीज/दाना अर्थ में भी)
-
कृषी दलि – खेती का दाना/बीज
-
गरहीं – गल जाना, नष्ट हो जाना
-
खल – दुष्ट व्यक्ति
-
शेष – शेषनाग
-
सरोषा – क्रोधित होकर
-
सहस बदन – हजार मुख
-
दोषा – दोष, बुराइयाँ
भावार्थ (Bhavarth / Inner Message)
पहली पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे बर्फ में पड़ा बीज गलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही बुरे और अनर्थकारी कार्यों का परिणाम अंत में खुद व्यक्ति के शरीर और जीवन को नुकसान पहुँचाता है। बुराई अंततः स्वयं नष्ट हो जाती है।
दूसरी पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि दुष्टों के दोष इतने अधिक हैं कि यदि शेषनाग जैसे सहस्रमुख देवता भी उन्हें गिनाने बैठें, तो भी उनके दोषों का अंत नहीं होगा। यह दुष्टों की प्रकृति और उनकी बुराइयों की अनंतता को दिखाता है।
संदेश:
-
बुरा कर्म अंततः स्वयं को ही नष्ट करता है।
-
दुष्टों की बुराइयाँ इतनी अधिक होती हैं कि उनका पूरा वर्णन संभव नहीं।
-
इसलिए उनसे दूर रहना ही अच्छा है।
FAQ – पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं… दोहे के संबंध में
1. यह दोहा किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड से लिया गया है।
2. “पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि बुरे, अनर्थकारी काम का परिणाम व्यक्ति को स्वयं ही नष्ट कर देता है, जैसे बर्फ में पड़ा बीज गलकर नष्ट हो जाता है।
3. “जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं” का क्या संकेत है?
बर्फ में पड़े दाने का गलना यह बताता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों और बुरे कार्यों का परिणाम अंततः विनाश ही होता है।
4. “बंदउँ खल जस सेष सरोषा” का क्या मतलब है?
यहाँ कवि कहता है—मैं दुष्टों को उसी प्रकार नमस्कार करता हूँ जैसे क्रोधित शेषनाग करते हैं। यह व्यंग्यात्मक नमस्कार
5. तुलसीदास जी दुष्टों की तुलना शेषनाग से क्यों करते हैं?
क्योंकि शेषनाग के हजार मुख हैं, फिर भी यदि वे दुष्टों के दोष गिनाएँ, तो भी वे समाप्त नहीं होंगे। यह दुष्टता की अनंतता दिखाने के लिए कहा गया है।
6. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि—
-
बुरे कार्य का फल अंततः व्यक्ति को ही नष्ट करता है।
-
दुष्टों की बुराइयों का कोई अंत नहीं है, इसलिए उनसे दूरी रखना ही बुद्धिमानी है।
7. क्या यहाँ नमस्कार सच में किया गया है?
नहीं, यह व्यंग्यात्मक ‘नमस्कार’ है। यह दुष्टों की प्रकृति पर कटाक्ष है कि उनके दोष इतने अधिक हैं कि उनका वर्णन असंभव है।
8. इस दोहे से क्या सीख मिलती है?
-
दुष्कर्म का फल अवश्य मिलता है।
-
दुष्ट व्यक्ति का कोई अंत नहीं होता, इसलिए उनके साथ संगति नहीं करनी चाहिए।
-
सज्जनता और सद्कार्यों का महत्व समझ में आता है।
9. क्या यह दोहा नैतिक शिक्षा भी देता है?
हाँ, यह दोहा नैतिकता का संदेश देता है—
बुराई स्वयं ही अपने विनाश का कारण बनती है।
10. क्या यह दोहा बच्चों को समझाया जा सकता है?
हाँ, सरल भाषा में यह बताया जा सकता है कि—
"जैसे ठंड में बीज गल जाता है, वैसे ही बुरे काम अपने आप बिगड़ जाते हैं और करने वाले को भी नुकसान पहुँचाते हैं।"
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं—सरल अर्थ, शब्दार्थ, भावार्थ और महत्वपूर्ण FAQs
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥
सरल हिंदी अर्थ (Simple Meaning)
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं।
जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
जब शरीर पर कोई बुरा और हानिकारक काम लग जाता है (अर्थात कोई संकट, आघात या चोट पहुँचती है), तब शरीर उसे खुद ही छोड़ देता है—जैसे बर्फ की ओट में रखा दाना (बीज) गलकर नष्ट हो जाता है और मिट जाता है।
बंदउँ खल जस सेष सरोषा।
सहस बदन बरनइ पर दोषा॥4॥
मैं दुष्टों को उसी प्रकार नमस्कार करता हूँ जैसे क्रोधित शेषनाग करते हैं—जिनके हजार मुख हैं और वे भी उनके दोषों का वर्णन करने लगें, तो भी पूरा वर्णन नहीं कर सकते।
शब्दार्थ (Word Meanings)
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पर अकाजु – बुरा काम, अनर्थ
-
तनु परिहरहीं – शरीर छोड़ देता है, समाप्त हो जाता है
-
जिमि – जैसे
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हिम – बर्फ
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उपल – कंकड़, पत्थर (यहाँ बीज/दाना अर्थ में भी)
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कृषी दलि – खेती का दाना/बीज
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गरहीं – गल जाना, नष्ट हो जाना
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खल – दुष्ट व्यक्ति
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शेष – शेषनाग
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सरोषा – क्रोधित होकर
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सहस बदन – हजार मुख
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दोषा – दोष, बुराइयाँ
भावार्थ (Bhavarth / Inner Message)
पहली पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि जैसे बर्फ में पड़ा बीज गलकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही बुरे और अनर्थकारी कार्यों का परिणाम अंत में खुद व्यक्ति के शरीर और जीवन को नुकसान पहुँचाता है। बुराई अंततः स्वयं नष्ट हो जाती है।
दूसरी पंक्ति में तुलसीदास जी कहते हैं कि दुष्टों के दोष इतने अधिक हैं कि यदि शेषनाग जैसे सहस्रमुख देवता भी उन्हें गिनाने बैठें, तो भी उनके दोषों का अंत नहीं होगा। यह दुष्टों की प्रकृति और उनकी बुराइयों की अनंतता को दिखाता है।
संदेश:
-
बुरा कर्म अंततः स्वयं को ही नष्ट करता है।
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दुष्टों की बुराइयाँ इतनी अधिक होती हैं कि उनका पूरा वर्णन संभव नहीं।
-
इसलिए उनसे दूर रहना ही अच्छा है।
FAQ – पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं… दोहे के संबंध में
1. यह दोहा किस ग्रंथ से लिया गया है?
यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड से लिया गया है।
2. “पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि बुरे, अनर्थकारी काम का परिणाम व्यक्ति को स्वयं ही नष्ट कर देता है, जैसे बर्फ में पड़ा बीज गलकर नष्ट हो जाता है।
3. “जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं” का क्या संकेत है?
बर्फ में पड़े दाने का गलना यह बताता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों और बुरे कार्यों का परिणाम अंततः विनाश ही होता है।
4. “बंदउँ खल जस सेष सरोषा” का क्या मतलब है?
यहाँ कवि कहता है—मैं दुष्टों को उसी प्रकार नमस्कार करता हूँ जैसे क्रोधित शेषनाग करते हैं। यह व्यंग्यात्मक नमस्कार
5. तुलसीदास जी दुष्टों की तुलना शेषनाग से क्यों करते हैं?
क्योंकि शेषनाग के हजार मुख हैं, फिर भी यदि वे दुष्टों के दोष गिनाएँ, तो भी वे समाप्त नहीं होंगे। यह दुष्टता की अनंतता दिखाने के लिए कहा गया है।
6. इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
मुख्य संदेश यह है कि—
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बुरे कार्य का फल अंततः व्यक्ति को ही नष्ट करता है।
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दुष्टों की बुराइयों का कोई अंत नहीं है, इसलिए उनसे दूरी रखना ही बुद्धिमानी है।
7. क्या यहाँ नमस्कार सच में किया गया है?
नहीं, यह व्यंग्यात्मक ‘नमस्कार’ है। यह दुष्टों की प्रकृति पर कटाक्ष है कि उनके दोष इतने अधिक हैं कि उनका वर्णन असंभव है।
8. इस दोहे से क्या सीख मिलती है?
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दुष्कर्म का फल अवश्य मिलता है।
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दुष्ट व्यक्ति का कोई अंत नहीं होता, इसलिए उनके साथ संगति नहीं करनी चाहिए।
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सज्जनता और सद्कार्यों का महत्व समझ में आता है।
9. क्या यह दोहा नैतिक शिक्षा भी देता है?
हाँ, यह दोहा नैतिकता का संदेश देता है—
बुराई स्वयं ही अपने विनाश का कारण बनती है।
10. क्या यह दोहा बच्चों को समझाया जा सकता है?
हाँ, सरल भाषा में यह बताया जा सकता है कि—
"जैसे ठंड में बीज गल जाता है, वैसे ही बुरे काम अपने आप बिगड़ जाते हैं और करने वाले को भी नुकसान पहुँचाते हैं।"