पृथुराज और सक्र का प्रणाम | तुलसीदास के दोहे का अर्थ
दोहे:
“पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥५॥”
यह पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा कही गई हैं। यहाँ वे दो महान व्यक्तियों को प्रणाम कर रहे हैं।
सरल भाषा में अर्थ (Simple Meaning)
“फिर मैं पृथु-राज जैसे राजा को प्रणाम करता हूँ, जो दूसरों के छोटे से छोटे कष्ट और पाप को भी बहुत ध्यान से सुनते हैं।
फिर मैं इंद्र देव (सकंन्द्र) जैसे उस पुरुष को प्रणाम करता हूँ, जो हमेशा देवताओं की सेना यानी अच्छे लोगों के हित (भलाई) में लगा रहता है।”
शब्दार्थ (Word Meaning)
-
पुनि – फिर, दोबारा
-
प्रनवउँ – मैं प्रणाम करता हूँ
-
पृथुराज समाना – राजा पृथु के समान
-
पर अघ – दूसरों का दुख, पाप या कष्ट
-
सुनइ – सुनते हैं
-
सहस दस काना – बहुत ध्यान से, हजार कानों की तरह
-
बहुरि – फिर
-
सक्र – इंद्र देव
-
बिनवउँ – प्रणाम करता हूँ
-
तेही – उसी पुरुष को
-
संतत – हमेशा, निरंतर
-
सुर-आनीक – देवताओं की सेना, अच्छे लोगों का समुदाय
-
हित – भलाई, कल्याण
भावार्थ (Bhavarth – भावछाया, गूढ़ अर्थ)
इन पंक्तियों में कवि कहते हैं—
मैं पहले राजा पृथु की तरह महान व्यक्तियों को प्रणाम करता हूँ। पृथु अपने प्रजाजनों के दुखों को बड़े ध्यान से सुनते थे। यह जीवन में संवेदनशीलता और न्यायप्रियता का संकेत है।
फिर मैं उन व्यक्तित्वों को प्रणाम करता हूँ जो देवताओं की तरह हमेशा अच्छे लोगों, समाज और धर्म की रक्षा में लगे रहते हैं।
अर्थात्, जो दूसरों का दुख समझता है और जो समाज की रक्षा व भलाई में लगा रहता है—वही वास्तव में प्रणाम करने योग्य है।
1. और भी सरल सार (सबसे आसान भाषा में)
कवि कहता है—
मैं उन महान लोगों को प्रणाम करता हूँ जो दूसरों की छोटी-सी परेशानी भी दिल से सुनते हैं, जैसे राजा पृथु।
और मैं उन लोगों को भी प्रणाम करता हूँ जो हमेशा अच्छे लोगों और समाज की भलाई में जुटे रहते हैं, जैसे इंद्र।
यानी, सच्चे महान वही हैं जो दूसरों का दुख समझें और समाज का भला करें।
2. काव्यात्मक व्याख्या (Poetic Interpretation)
जहाँ कान हजार हों,
वहाँ एक भी आह अनसुनी नहीं रहती।
राजा पृथु-से वे लोग,
जो जन-जन की पीड़ा अपने हृदय में उतार लेते हैं—
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।
और फिर झुकता हूँ उन वीरों के आगे
जो इंद्र समान,
सदा सज्जनों, धर्म और सच्चाई की रक्षा में
अडिग खड़े रहते हैं।
जो दुख सुन सके,
और जो समाज की ढाल बन सके—
कवि कहता है,
वही वास्तव में प्रणाम के योग्य हैं।
FAQs (सवाल-जबाब)
Q1: यह दोहा किसने लिखा है?
A: यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है। यह रामचरितमानस या उनके भक्ति ग्रंथों के संदर्भ में आता है।
Q2: इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
A: सच्चे महान वही हैं जो दूसरों के दुखों को सुनें और समाज/धर्म की भलाई में लगे रहें।
Q3: 'पृथुराज' का अर्थ क्या है?
A: पृथुराज एक आदर्श राजा हैं, जो जनता का दुख समझता और दूर करने की कोशिश करता है।
Q4: 'सहस दस काना' का क्या मतलब है?
A: इसका अर्थ है बहुत ध्यान और संवेदनशीलता से सुनना, जैसे हजार कानों वाले।
Q5: 'संतत सुरानीक हित' का भाव क्या है?
A: इसका अर्थ है हमेशा देवताओं और अच्छों के हित के लिए कार्य करना।
Q6: इस दोहे से हम जीवन में क्या सीख सकते हैं?
A: दूसरों की पीड़ा को महसूस करना और समाज/सच्चाई की भलाई में कार्य करना ही सच्ची महानता है।
पृथुराज और सक्र का प्रणाम | तुलसीदास के दोहे का अर्थ
दोहे:
“पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥५॥”
यह पंक्तियाँ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा कही गई हैं। यहाँ वे दो महान व्यक्तियों को प्रणाम कर रहे हैं।
सरल भाषा में अर्थ (Simple Meaning)
“फिर मैं पृथु-राज जैसे राजा को प्रणाम करता हूँ, जो दूसरों के छोटे से छोटे कष्ट और पाप को भी बहुत ध्यान से सुनते हैं।
फिर मैं इंद्र देव (सकंन्द्र) जैसे उस पुरुष को प्रणाम करता हूँ, जो हमेशा देवताओं की सेना यानी अच्छे लोगों के हित (भलाई) में लगा रहता है।”
शब्दार्थ (Word Meaning)
-
पुनि – फिर, दोबारा
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प्रनवउँ – मैं प्रणाम करता हूँ
-
पृथुराज समाना – राजा पृथु के समान
-
पर अघ – दूसरों का दुख, पाप या कष्ट
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सुनइ – सुनते हैं
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सहस दस काना – बहुत ध्यान से, हजार कानों की तरह
-
बहुरि – फिर
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सक्र – इंद्र देव
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बिनवउँ – प्रणाम करता हूँ
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तेही – उसी पुरुष को
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संतत – हमेशा, निरंतर
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सुर-आनीक – देवताओं की सेना, अच्छे लोगों का समुदाय
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हित – भलाई, कल्याण
भावार्थ (Bhavarth – भावछाया, गूढ़ अर्थ)
इन पंक्तियों में कवि कहते हैं—
मैं पहले राजा पृथु की तरह महान व्यक्तियों को प्रणाम करता हूँ। पृथु अपने प्रजाजनों के दुखों को बड़े ध्यान से सुनते थे। यह जीवन में संवेदनशीलता और न्यायप्रियता का संकेत है।
फिर मैं उन व्यक्तित्वों को प्रणाम करता हूँ जो देवताओं की तरह हमेशा अच्छे लोगों, समाज और धर्म की रक्षा में लगे रहते हैं।
अर्थात्, जो दूसरों का दुख समझता है और जो समाज की रक्षा व भलाई में लगा रहता है—वही वास्तव में प्रणाम करने योग्य है।
1. और भी सरल सार (सबसे आसान भाषा में)
कवि कहता है—
मैं उन महान लोगों को प्रणाम करता हूँ जो दूसरों की छोटी-सी परेशानी भी दिल से सुनते हैं, जैसे राजा पृथु।
और मैं उन लोगों को भी प्रणाम करता हूँ जो हमेशा अच्छे लोगों और समाज की भलाई में जुटे रहते हैं, जैसे इंद्र।
यानी, सच्चे महान वही हैं जो दूसरों का दुख समझें और समाज का भला करें।
2. काव्यात्मक व्याख्या (Poetic Interpretation)
जहाँ कान हजार हों,
वहाँ एक भी आह अनसुनी नहीं रहती।
राजा पृथु-से वे लोग,
जो जन-जन की पीड़ा अपने हृदय में उतार लेते हैं—
मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ।
और फिर झुकता हूँ उन वीरों के आगे
जो इंद्र समान,
सदा सज्जनों, धर्म और सच्चाई की रक्षा में
अडिग खड़े रहते हैं।
जो दुख सुन सके,
और जो समाज की ढाल बन सके—
कवि कहता है,
वही वास्तव में प्रणाम के योग्य हैं।
FAQs (सवाल-जबाब)
Q1: यह दोहा किसने लिखा है?
A: यह दोहा गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है। यह रामचरितमानस या उनके भक्ति ग्रंथों के संदर्भ में आता है।
Q2: इस दोहे का मुख्य संदेश क्या है?
A: सच्चे महान वही हैं जो दूसरों के दुखों को सुनें और समाज/धर्म की भलाई में लगे रहें।
Q3: 'पृथुराज' का अर्थ क्या है?
A: पृथुराज एक आदर्श राजा हैं, जो जनता का दुख समझता और दूर करने की कोशिश करता है।
Q4: 'सहस दस काना' का क्या मतलब है?
A: इसका अर्थ है बहुत ध्यान और संवेदनशीलता से सुनना, जैसे हजार कानों वाले।
Q5: 'संतत सुरानीक हित' का भाव क्या है?
A: इसका अर्थ है हमेशा देवताओं और अच्छों के हित के लिए कार्य करना।
Q6: इस दोहे से हम जीवन में क्या सीख सकते हैं?
A: दूसरों की पीड़ा को महसूस करना और समाज/सच्चाई की भलाई में कार्य करना ही सच्ची महानता है।