हाड़ी रानी (सहल कंवर)

हाड़ी रानी (सहल कंवर) जी के बारे मेंं

हाड़ी रानी (सहल कंवर)

हाड़ी रानी (सहल कंवर)

(सहल कंवर)

पिता संग्राम सिंह हाड़ा
जीवनसंगी रावत रतन सिंह चुंडावत
राष्ट्रीयता भारतीय
धर्म हिन्दू

जीवन परिचय --

हाड़ी रानी सहल कंवर राजस्थान की लोकगाथाओं में अंकित एक ऐसी वीरांगना हैं जिनका नाम सुनते ही आंखों में श्रद्धा और मन में गर्व की अनुभूति होती है। उनके बलिदान की गाथा केवल राजस्थान ही नहीं, अपितु समस्त भारत में साहस, प्रेम और देशभक्ति की मिसाल मानी जाती है। इतिहास उन्हें रानी पद से कहीं ऊपर भारत माता की वीर बेटी के रूप में देखता है।


वंश परिचय और जन्म--

नाम: सहल कंवर (लोकप्रिय नाम: हाड़ी रानी)

पिता: संग्राम सिंह हाड़ा (हाड़ा वंश के शासक)

वंश: हाड़ा चौहान राजवंश, बूंदी (राजस्थान)

समय: 17वीं शताब्दी (लगभग 1653–1680 के दौरान)

पति: रावत रतन सिंह चुंडावत (मेवाड़ के सलूंबर ठिकाने के सरदार)


हाड़ी रानी का जन्म राजस्थान के शूरवीर क्षत्रिय हाड़ा वंश में हुआ था। हाड़ा वंश को मेवाड़, मारवाड़, कोटा, बूंदी जैसे राज्यों में बहादुरी और पराक्रम के लिए जाना जाता है। वे बचपन से ही निडर, तेजस्वी और वीरता से भरपूर थीं। युद्ध, शस्त्र, नीति और धर्म की शिक्षा उन्हें राजपरिवार में मिली थी।


विवाह और दांपत्य जीवन--

उनका विवाह मेवाड़ के सलूंबर के ठाकुर रावत रतन सिंह चुंडावत से हुआ था। रावत रतन सिंह चुंडावत मेवाड़ रियासत के प्रमुख योद्धाओं में से एक थे और महाराणा राज सिंह के भरोसेमंद सरदार थे। विवाह के बाद दोनों ने कुछ ही समय एक-दूसरे के साथ बिताया।


मुगल संकट और युद्ध का आह्वान--

जब औरंगजेब का आतंक अपने चरम पर था, तो उसने राजस्थान की रियासतों पर लगातार हमले करना शुरू किया। ऐसे में महाराणा राज सिंह I ने अपने बहादुर सेनापतियों को युद्ध के लिए बुलाया। रावत रतन सिंह को भी तुरंत युद्ध के लिए जाना पड़ा।

चूंकि उनका विवाह नया-नया हुआ था, उनका मन युद्ध के लिए तैयार नहीं था। वे प्रेम और कर्तव्य के बीच उलझन में पड़ गए। जब यह बात रानी सहल कंवर को पता चली, तो उन्होंने एक ऐसा बलिदान किया, जो इतिहास में अमर हो गया।


बलिदान की अमर गाथा--

रानी ने अपने पति को यह दिखाने के लिए कि एक सच्चा क्षत्रिय मोह-माया से ऊपर होता है, और देश-धर्म की रक्षा सबसे बड़ा कर्तव्य है, अपने हाथों से अपनी गर्दन काट दी और वह शीश एक थाली में सजाकर अपने पति को भेंट के रूप में भेज दिया।

उनका संदेश था:

"यदि मैं तुम्हारे युद्ध में बाधा बन रही हूँ, तो मेरा यह शीश तुम्हारा मोह भंग करेगा और तुम्हें धर्मयुद्ध के लिए प्रेरित करेगा।"

यह दृश्य देखकर रावत रतन सिंह का मन भावनाओं से भर गया, पर उन्होंने तुरंत युद्ध के लिए अपने आप को समर्पित किया। युद्ध भूमि में उन्होंने अद्भुत वीरता दिखाई और कई मुगलों को मार गिराया। अंततः उन्होंने भी अपनी रानी के वियोग में अपना जीवन बलिदान कर दिया।


रानी सहल कंवर की विशेषताएँ--

बलिदान की देवी: उन्होंने अपने प्रेम और अपने जीवन का त्याग कर दिया, ताकि उनके पति अपने धर्म और देश के लिए समर्पित हो सकें।
प्रेरणादायी पत्नी: उन्होंने अपने पति को युद्ध की ओर प्रेरित किया, जो क्षत्राणी धर्म की सर्वोच्च मिसाल है।
सम्मान की प्रतीक: आज भी राजस्थान की लोकगाथाओं, गीतों, चित्रों और संस्कृतियों में उनकी वीरता गाई जाती है।


हाड़ी रानी की विरासत--

1. हाड़ी रानी की बावड़ी:

यह बावड़ी राजस्थान के टोंक जिले के टोडराईसिंह कस्बे में स्थित है।

यह बावड़ी हाड़ी रानी की स्मृति में बनवाई गई थी, और आज भी उनके बलिदान की गवाही देती है।


2. राजस्थान पुलिस की हाड़ी रानी महिला बटालियन:

राजस्थान पुलिस की एक महिला बटालियन का नाम "हाड़ी रानी महिला बटालियन" रखा गया है।

यह भारत की ऐसी महिला टुकड़ी है, जो साहस और नारी शक्ति का प्रतीक है।


3. लोकगीतों में अमर गाथा:

राजस्थान की महिलाओं द्वारा गाए जाने वाले कई गीतों में हाड़ी रानी का वर्णन मिलता है, जैसे:

"हाड़ी रानी सिर कटायो, रावत नै पठायो रे..."


साहित्य में योगदान--

"वीर विनोद" (कविराज श्यामलदास द्वारा रचित) में इस घटना का उल्लेख मिलता है।

लोक साहित्य, कहानियाँ, चित्रकथाएँ और फिल्में भी इस विषय पर आधारित हैं।

कई मंच नाटकों और झांकियों में हाड़ी रानी की झलक देखी जा सकती है।


लोककथाओं में हाड़ी रानी का स्वरूप--

लोकमान्यता अनुसार, जब रावत रतन सिंह को युद्ध का आदेश मिला, वे तैयार नहीं थे।

रानी ने उन्हें प्रेरित करने हेतु अलौकिक साहस का प्रदर्शन किया।

उस युग में नारी केवल सौंदर्य और गृह कार्य तक सीमित नहीं थी, अपितु धर्म, युद्ध और प्रेरणा की देवी थी।


 प्रेम और त्याग की कहानी--

यह केवल एक युद्ध या बलिदान की कहानी नहीं, बल्कि एक प्रेम कहानी भी है।

जहां रानी ने प्रेम को देश के लिए न्यौछावर कर दिया, वहीं पति ने उस प्रेम की याद में वीरगति को चुना।


प्रेरणा का स्रोत--

आज के युवाओं और खासकर महिलाओं के लिए रानी सहल कंवर एक उदाहरण हैं:

कैसे कर्तव्य को सर्वोपरि रखा जाए।

कैसे प्रेम में भी वीरता हो सकती है।

कैसे एक नारी अपने कर्तव्य से समाज को दिशा दे सकती है।


हाड़ी रानी की स्मृति से जुड़े स्थान--

टोडराईसिंह, टोंक हाड़ी रानी की बावड़ी

सलूंबर, उदयपुर रावत रतन सिंह का ठिकाना

बूंदी हाड़ा राजवंश का मूल स्थान

उदयपुर संग्रहालय लोककला व चित्र में हाड़ी रानी की छवियाँ


प्रश्न और उत्तर (FAQs)--

Q. हाड़ी रानी कौन थीं?

हाड़ी रानी राजस्थान की वीरांगना थीं जिन्होंने पति को युद्ध के लिए प्रेरित करने हेतु अपना शीश काटकर भेजा।


Q. हाड़ी रानी का संबंध किस वंश से था?

वे हाड़ा चौहान राजवंश से थीं, बूंदी के शासक संग्राम सिंह की पुत्री थीं।


Q. रावत रतन सिंह कौन थे?

 वे सलूंबर के ठाकुर थे और मेवाड़ के सेनापति।


Q. हाड़ी रानी का बलिदान किस कारण हुआ?

उन्होंने पति के मोह को दूर करने हेतु अपना सिर काटकर उन्हें भेंट किया, ताकि वे धर्मयुद्ध में संलग्न हो सकें।


Q. क्या हाड़ी रानी की कोई स्मृति आज भी है?

जी हां, "हाड़ी रानी की बावड़ी" और "हाड़ी रानी महिला बटालियन" उनके नाम से प्रसिद्ध हैं।


नारी शक्ति का प्रतीक--

हाड़ी रानी की यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय इतिहास केवल पुरुषों की वीरता से भरा नहीं, बल्कि नारियों के त्याग, बलिदान और प्रेरणा से भी समृद्ध है। रानी सहल कंवर एक ऐसी देवी समान नारी थीं जिन्होंने अपने जीवन को देश, धर्म और कर्तव्य के लिए अर्पित कर दिया।


निष्कर्ष--

रानी सहल कंवर का जीवन केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि नारी शक्ति, प्रेम, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति की जीवंत मूर्ति है। उन्होंने अपने अद्वितीय बलिदान से यह दिखा दिया कि भारत की बेटियाँ हर परिस्थिति में देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर सकती हैं।


हाड़ी रानी के बलिदान की पूरी कहानी --

हाड़ी रानी राजस्थान की एक रानी थीं। वह हाड़ा चौहान राजपूत की बेटी थीं और उनका ब्याह रतन सिंह चूड़ावत से हुआ था। रतन सिंह मेवाड़ के सलुम्बर के सरदार थे। हाड़ी रानी ने अपने पति को रणक्षेत्र में उत्साहित करने हेतु जीवन का उत्सर्ग कर दिया था।


किंवदन्तियों के अनुसार, मेवाड़ के राज सिंह प्रथम (1653–1680) ने जब रतन सिंह को मुगल गवर्नर अजमेर सुबह के विरुद्ध विद्रोह करने के लिये आह्वान किया, उस समय रतन सिंह का विवाह हुए कुछ ही दिन हुए थे। उन्हें कुछ हिचकिचाहट हुई। लेकिन राजपूतों की परम्परा का ध्यान रखते हुए वे रणक्षेत्र में जाने को तैयार हुए और अपनी हाड़ी रानी से कुछ ऐसा चिह्न माँगा जिसे लेकर वह रनक्षेत्र में जा सकें। रानी हाड़ी को लगा कि वे रतन सिंह के राजपूत धर्म के पालन में एक बाधा बन रहीं हैं, रानी ने अपना सिर एक प्लेट पर काटकर दे दिया। थाल में रखकर, कपड़े से ढककर जब सेवक वह सिर लेकर उपस्थित हुआ, तो रतन सिंह को बड़ी ग्लानि हुई। उन्होने उस सिर को उसके ही बालों से बांध लिया और लड़े। जब विद्रोह समाप्त हो गया तब रतन सिंह को जीवित रहने की इच्छा समाप्त हो चुकी थी। उन्होने अपना भी सिर काटकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर दी।


रतन सिंह स्वयं की शादी एक सप्ताह पूरा नहीं हुआ था और राजसिंह और चारूमती की शादी में ओरंगजेब कोई बाधा उत्पन्न न कर दे इसके लिए रतन सिंह ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए और हाडी रानी का भी क्षत्रीय चरित्र रहा होगा कि रतन सिंह के एक निशानी मांगने पर आपना सर काट के दे दिया शादी को महज एक सप्ताह हुआ था। न हाथों की मेहंदी छूटी थी और न ही पैरों का आलता। सुबह का समय था। हाड़ा सरदार गहरी नींद में थे। रानी सज धजकर राजा को जगाने आई। उनकी आखों में नींद की खुमारी साफ झलक रही थी। रानी ने हंसी ठिठोली से उन्हें जगाना चाहा। इस बीच दरबान आकर वहां खड़ा हो गया। राजा का ध्यान न जाने पर रानी ने कहा, महाराणा का दूत काफी देर से खड़ा है। वह ठाकुर से तुरंत मिलना चाहते हैं। आपके लिए कोई आवश्यक पत्र लाया है उसे अभी देना जरूरी है | असमय में दूत के आगमन का समाचार। ठाकुर हक्का बक्का रह गया। वे सोचने लगे कि अवश्य कोई विशेष बात होगी। राणा को पता है कि वह अभी ही ब्याह कर के लौटे हैं। आपात की घड़ी ही हो सकती है। उसने हाड़ी रानी को अपने कक्ष में जाने को कहा, दूत का तुरंत लाकर बिठाओ। मैं नित्यकर्म से शीघ्र ही निपटकर आता हूं, हाड़ा सरदार ने दरबान से कहा। सरदार जल्दी जल्दी में निवृत्त होकर बाहर आया। सहसा बैठक में बैठे राणा के दूत पर उसकी निगाह जा पड़ी। औपचारिकता के बाद ठाकुर ने दूत से कहा, अरे शार्दूल तू। इतनी सुबह कैसे? क्या भाभी ने घर से खदेड़ दिया है? सारा मजा फिर किरकिरा कर दिया। सरदार ने फिर दूत से कहा, तेरी नई भाभी अवश्य तुम पर नाराज होकर अंदर गई होगी। नई नई है न। इसलिए बेचारी कुछ नहीं बोली। ऐसी क्या आफत आ पड़ी थी। दो दिन तो चैन की बंसी बजा लेने देते। मियां बीवी के बीच में क्यों कबाब में हड्डी बनकर आ बैठे। अच्छा बोलो राणा ने मुझे क्यों याद किया है? वह ठहाका मारकर हंस पड़ा। दोनों में गहरी दोस्ती थी। सामान्य दिन अगर होते तो वह भी हंसी में जवाब देता। शार्दूल खुद भी बड़ा हंसोड़ था। वह हंसी मजाक के बिना एक क्षण को भी नहीं रह सकता था, लेकिन वह बड़ा गंभीर था। दोस्त हंसी छोड़ो। सचमुच बड़ी संकट की घड़ी आ गई है। मुझे भी तुरंत वापस लौटना है। यह कहकर सहसा वह चुप हो गया। अपने इस मित्र के विवाह में बाराती बनकर गया था। उसके चेहरे पर छाई गंभीरता की रेखाओं को देखकर हाड़ा सरदार का मन आशंकित हो उठा। सचमुच कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयीं है। दूत संकोच रहा था कि इस समय राणा की चिट्ठी वह मित्र को दे या नहीं। हाड़ा सरदार को तुरंत युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निर्देश लेकर वह लाया था। उसे मित्र के शब्द स्मरण हो रहे थे। हाड़ा के पैरों के नाखूनों में लगे महावर की लाली के निशान अभी भी वैसे के वैसे ही उभरे हुए थे। नव विवाहित हाड़ी रानी के हाथों की मेंहदी भी तो अभी सूखी न होगी। पति पत्नी ने एक दूसरे को ठीक से देखा पहचाना नहीं होगा। कितना दुखदायी होगा उनका बिछोह? यह स्मरण करते ही वह सिहर उठा। पता नहीं युद्ध में क्या हो? वैसे तो राजपूत मृत्यु को खिलौना ही समझता हैं। अंत में जी कड़ा करके उसने हाड़ा सरदार के हाथों में राणा राजसिंह का पत्र थमा दिया। राणा का उसके लिए संदेश था।


== क्या लिखा था पत्र मे

वीरवर। अविलंब अपनी सैन्य टुकड़ी को लेकर औरंगजेब की सेना को रोको। मुसलमान सेना उसकी सहायता को आगे बढ़ रही है। इस समय औरंगजेब को मैं घेरे हुए हूं। उसकी सहायता को बढ़ रही फौज को कुछ समय के लिए उलझाकर रखना है ताकि वह शीघ्र ही आगे न बढ़ सके तब तक मैं पूरा काम निपट लेता हूं। तुम इस कार्य को बड़ी कुशलता से कर सकते हो। यद्यपि यह बड़ा खतरनाक है। जान की बाजी भी लगानी पड़ सकती है। मुझे तुम पर भरोसा है। हाड़ा सरदार के लिए यह परीक्षा की घड़ी थी। एक ओर मुगलों की विपुल सेना और उसकी सैनिक टुकड़ी अति अल्प है। राणा राजसिंह ने मेवाड़ के छीने हुए क्षेत्रों को मुगलों के चंगुल से मुक्त करा लिया था। औरंगजेब के पिता शाहजहां ने अपनी एडी चोटी की ताकत लगा दी थी। वह चुप होकर बैठ गया था। अब शासन की बागडोर औरंगजेब के हाथों में आई थी। राणा से चारुमती के विवाह ने उसकी द्वेष भावना को और भी भड़का दिया था। इसी बीच में एक बात और हो गयीं थी जिसने राजसिंह और औरंगजेब को आमने सामने लाकर खड़ा कर दिया था। यह संपूर्ण हिन्दू जाति का अपमान था। इस्लाम को कुबूल करो या हिन्दू बने रहने का दंड भरो। यही कह कर हिन्दुओं पर उसने जजिया कर लगाया था।

राणा राजसिंह ने इसका विरोध किया था। उनका मन भी इसे सहन नहीं कर रहा था। इसका परिणाम यह हुआ कई अन्य हिन्दू राजाओं ने उसे अपने यहां लागू करने में आनाकानी की। उनका साहस बढ़ गया था। गुलामी की जंजीरों को तोड़ फेंकने की अग्नि जो मंद पड़ गयीं थी फिर से प्रज्ज्वलित हो गई थी। दक्षिण में शिवाजी, बुंदेलखंड में छत्रसाल, पंजाब में गुरु गोविंद सिंह, मारवाड़ में राठौड़ वीर दुर्गादास मुगल सल्तनत के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे। यहां तक कि आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह और मारवाड़ के जसवंत सिंह जो मुगल सल्तनत के दो प्रमुख स्तंभ थे। उनमें भी स्वतंत्रता प्रेमियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हो गई थी। मुगल बादशाह ने एक बड़ी सेना लेकर मेवाड़ पर आक्रमण कर दिया था। राणा राजसिंह ने सेना के तीन भाग किए थे। मुगल सेना के अरावली में न घुसने देने का दायित्व अपने बेटे जयसिंह को सौपा था। अजमेर की ओर से बादशाह को मिलने वाली सहायता को रोकने का काम दूसरे बेटे भीम सिंह का था। वे स्वयं अकबर और दुर्गादास राठौड़ के साथ औरंगजेब की सेना पर टूट पड़े थे। सभी मोर्चों पर उन्हें विजय प्राप्त हुई थी। बादशाह औरंगजेब की बड़ी प्रिय कॉकेशियन बेगम बंदी बना ली गयीं थी। बड़ी कठिनाई से किसी प्रकार औरंगजेब प्राण बचाकर निकल सका था। मेवाड़ के महाराणा की यह जीत ऐसी थी कि उनके जीवन काल में फिर कभी औरंगजेब उनके विरुद्ध सिर न उठा सका था।


लेकिन क्या इस विजय का श्रेय केवल राणा को था या किसी और को? हाड़ा रानी और हाड़ा सरदार को किसी भी प्रकार से गम नहीं था। मुगल बादशाह जब चारों ओर राजपूतों से घिर गए। उसकी जान के भी लाले पड़े थे। उसका बचकर निकलना मुश्किल हो गया था तब उसने दिल्ली से अपनी सहायता के लिए अतिरिक्त सेना बुलवाई थी। राणा को यह पहले ही ज्ञात हो चुका था। उन्होंने मुगल सेना के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करन के लिए हाड़ा सरदार को पत्र लिखा था। वही संदेश लेकर शार्दूल सिंह मित्र के पास पहुंचा था। एक क्षण का भी विलंब न करते हुए हाड़ा सरदार ने अपने सैनिकों को कूच करने का आदेश दे दिया था। अब वह पत्नी से अंतिम विदाई लेने के लिए उसके पास पहुंचा था।


केसरिया बाना पहने युद्ध वेष में सजे पति को देखकर हाड़ी रानी चौंक पड़ी वह अचंभित थी। कहां चले स्वामी? इतनी जल्दी। अभी तो आप कह रहे थे कि चार छह महीनों के लिए युद्ध से फुरसत मिली है आराम से कटेगी यह क्या? आश्चर्य मिश्रित शब्दों में हाड़ी रानी पति से बोली। प्रिय। पति के शौर्य और पराक्रम को परखने के लिए लिए ही तो क्षत्राणियां इसी दिन की प्रतीक्षा करती है। वह शुभ घड़ी अभी ही आ गई। देश के शत्रुओं से दो दो हाथ होने का अवसर मिला है। मुझे यहां से अविलंब निकलना है। हंसते-हंसते विदा दो। पता नहीं फिर कभी भेंट हो या न हो हाड़ा सरदार ने मुस्करा कर पत्नी से कहा। हाड़ा सरदार का मन आशंकित था। सचमुच ही यदि न लौटा तो। मेरी इस अर्धांगिनी का क्या होगा ? एक ओर कर्तव्य और दूसरी ओर था पत्नी का मोह। इसी अन्तर्द्वंद में उसका मन फंसा था। उसने पत्नी को राणा राजसिंह के पत्र के संबंध में पूरी बात विस्तार से बता दी थी। विदाई मांगते समय पति का गला भर आया है यह हाड़ी राजी की तेज आंखों से छिपा न रह सका। यद्यपि हाड़ा सरदार ने उसे भरसक छिपाने की कोशिश की। हताश मन व्यक्ति को विजय से दूर ले जाता है। उस वीर बाला को यह समझते देर न लगी कि पति रणभूमि में तो जा रहा है पर मोहग्रस्त होकर। पति विजयश्री प्राप्त करें इसके लिए उसने कर्तव्य की वेदी पर अपने मोह की बलि दे दी। वह पति से बोली स्वामी जरा ठहरिए। मैं अभी आई। वह दौड़ी-दौड़ी अंदर गयीं। आरती का थाल सजाया। पति के मस्तक पर टीका लगाया, उसकी आरती उतारी। वह पति से बोली। मैं धन्य हो गयीं, ऐसा वीर पति पाकर। हमारा आपका तो जन्म जन्मांतर का साथ है। राजपूत रमणियां इसी दिन के लिए तो पुत्र को जन्म देती हैं आप जाएं स्वामी। मैं विजय माला लिए द्वार पर आपकी प्रतीक्षा करूंगी। उसने अपने नेत्रों में उमड़ते हुए आंसुओं को पी लिया था। पति को दुर्बल नहीं करना चाहती थी। चलते चलते पति उससे बोला प्रिय। मैं तुमको कोई सुख न दे सका, बस इसका ही दुख है मुझे भूल तो नहीं जाओगी ? यदि मैं न रहा तो ............। उसके वाक्य पूरे भी न हो पाए थे कि हाड़ी रानी ने उसके मुख पर हथेली रख दी। न न स्वामी। ऐसी अशुभ बातें न बोलों। मैं वीर राजपूतनी हूं, फिर वीर की पत्नी भी हूं। अपना अंतिम धर्म अच्छी तरह जानती हूं आप निश्चित होकर प्रस्थान करें। देश के शत्रुओं के दांत खट्टे करें। यही मेरी प्रार्थना है। हाड़ा सरदार ने घोड़े को ऐड़ लगायी। रानी उसे एकटक निहारती रहीं जब तक वह आंखे से ओझल न हो गया। उसके मन में दुर्बलता का जो तूफान छिपा था जिसे अभी तक उसने बरबस रोक रखा था वह आंखों से बह निकला। हाड़ा सरदार अपनी सेना के साथ हवा से बाते करता उड़ा जा रहा था। किन्तु उसके मन में रह रह कर आ रहा था कि कही सचमुच मेरी पत्नी मुझे बिसार न दें? वह मन को समझाता पर उसक ध्यान उधर ही चला जाता। अंत में उससे रहा न गया। उसने आधे मार्ग से अपने विश्वस्त सैनिकों के रानी के पास भेजा। उसकों फिर से स्मरण कराया था कि मुझे भूलना मत। मैं जरूर लौटूंगा। संदेश वाहक को आश्वस्त कर रानी ने लौटाया। दूसर दिन एक और वाहक आया। फिर वही बात। तीसरे दिन फिर एक आया। इस बार वह पत्नी के नाम सरदार का पत्र लाया था। प्रिय मैं यहां शत्रुओं से लोहा ले रहा हूं। अंगद के समान पैर जमारक उनको रोक दिया है। मजाल है कि वे जरा भी आगे बढ़ जाएं। यह तो तुम्हारे रक्षा कवच का प्रताप है। पर तुम्हारे बड़ी याद आ रही है। पत्र वाहक द्वारा कोई अपनी प्रिय निशानी अवश्य भेज देना। उसे ही देखकर मैं मन को हल्का कर लिया करुंगा। हाड़ी रानी पत्र को पढ़कर सोच में पड़ गयीं। युद्धरत पति का मन यदि मेरी याद में ही रमा रहा उनके नेत्रों के सामने यदि मेरा ही मुखड़ा घूमता रहा तो वह शत्रुओं से कैसे लड़ेंगे। विजय श्री का वरण कैसे करेंगे? उसके मन में एक विचार कौंधा। वह सैनिक से बोली वीर ? मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशान दे रही हूं। इसे ले जाकर उन्हें दे देना। थाल में सजाकर सुंदर वस्त्र से ढककर अपने वीर सेनापति के पास पहुंचा देना। किन्तु इसे कोई और न देखे। वे ही खोल कर देखें। साथ में मेरा यह पत्र भी दे देना। हाड़ी रानी के पत्र में लिखा था प्रिय। मैं तुम्हें अपनी अंतिम निशानी भेज रही हूं। तुम्हारे मोह के सभी बंधनों को काट रही हूं। अब बेफ्रिक होकर अपने कर्तव्य का पालन करें मैं तो चली... स्वर्ग में तुम्हारी बाट जोहूंगी। पलक झपकते ही हाड़ी रानी ने अपने कमर से तलवार निकाल, एक झटके में अपने सिर को उड़ा दिया। वह धरती पर लुढ़क पड़ा। सिपाही के नेत्रो से अश्रुधारा बह निकली। कर्तव्य कर्म कठोर होता है सैनिक ने स्वर्ण थाल में हाड़ी रानी के कटे सिर को सजाया। सुहाग के चूनर से उसको ढका। भारी मन से युद्ध भूमि की ओर दौड़ पड़ा। उसको देखकर हाड़ा सरदार स्तब्ध रह गया उसे समझ में न आया कि उसके नेत्रों से अश्रुधारा क्यों बह रही है? धीरे से वह बोला क्यों यदुसिंह। रानी की निशानी ले आए? यदु ने कांपते हाथों से थाल उसकी ओर बढ़ा दिया। हाड़ा सरदार फटी आंखों से पत्नी का सिर देखता रह गया। उसके मुख से केवल इतना निकला उफ्‌ हाय रानी। तुमने यह क्या कर डाला। संदेही पति को इतनी बड़ी सजा दे डाली खैर। मैं भी तुमसे मिलने आ रहा हूं।


हाड़ा सरदार के मोह के सारे बंधन टूट चुके थे। वह शत्रु पर टूट पड़ा। इतना अप्रतिम शौर्य दिखाया था कि उसकी मिसाल मिलना बड़ा कठिन है। जीवन की आखिरी सांस तक वह लंड़ता रहा। औरंगजेब की सहायक सेना को उसने आगे नहीं ही बढऩे दिया, जब तक मुगल बादशाह मैदान छोड़कर भाग नहीं गया था। इस विजय को श्रेय किसको? राणा राजसिंहि को या हाड़ा सरदार को। हाड़ी रानी को अथवा उसकी इस अनोखी निशानी को?


यतेन्द्र सिंह हाड़ा, ठिकाना - पदमपुरा, कोटा राजस्थान।। सलुम्बर के राव चुण्डावत रतन सिंह के लिए हाड़ा शब्द का प्रयोग उचित प्रतित नहीं होता हैं। हाड़ी रानी को सम्भवत: बूंदी के हाड़ा शासकों की पुत्री होने के कारण हाड़ी रानी कहा गया।


 "चुण्डावत मांगी सैनाणी,
     सिर काट दे दियो क्षत्राणी"


सरदार चूंडावत थे, और रानी बूंदी के हाड़ा शासक की पुत्री थी, इसीलिए रानी को हाड़ी रानी कहा जाता है जबकि सरदार चूंडावत कहलाते हैं।

Biography – Hadi Rani (Sahal Kanwar)

Hadi Rani, also known as Sahal Kanwar, is one of the most revered and courageous women in Rajasthan’s folk history. The mere mention of her name evokes a sense of deep respect and pride. Her tale of supreme sacrifice is not just a part of Rajasthan’s legacy but a national symbol of bravery, love, and patriotism. History doesn’t just see her as a queen, but as a valiant daughter of Mother India.


Lineage and Birth

  • Name: Sahal Kanwar (Popularly known as Hadi Rani)

  • Father: Sangram Singh Hada (Ruler of the Hada clan)

  • Clan: Hada Chauhan Rajput Dynasty, Bundi (Rajasthan)

  • Era: 17th Century (Approx. 1653–1680)

  • Husband: Rawat Ratan Singh Chundawat (Commander of Mewar’s Salumber estate)

She was born into the Hada Rajput clan, known for its valor and honor, especially in regions like Mewar, Marwar, Kota, and Bundi. From childhood, she exhibited courage, wisdom, and strength. Being raised in a royal family, she was trained in weapons, warfare, policy, and dharma (righteousness).


Marriage and Married Life

She was married to Rawat Ratan Singh Chundawat, a chief commander of the Mewar Kingdom and a close and trusted aide of Maharana Raj Singh I. Their married life was brief, as the call of war soon interrupted their union.


Mughal Invasion and the Call to War

During the oppressive rule of Aurangzeb, the Mughal Empire began attacking various Rajput states. Maharana Raj Singh summoned his commanders for war. Rawat Ratan Singh was among those called to battle.

Being recently married, Ratan Singh was emotionally torn between love and duty. Upon learning this, Hadi Rani made an unimaginable sacrifice, which made her immortal in history.


The Immortal Tale of Sacrifice

To prove that a true Rajput warrior must rise above worldly attachments and uphold dharma and patriotism, Hadi Rani severed her own head, placed it on a plate, and sent it to her husband as a parting gift.

Her message was:

“If I am the reason you hesitate to fight, then may this severed head remove your attachment and inspire you to fulfill your duty.”

This profound act awakened Ratan Singh. Filled with emotion, he embraced his warrior spirit and entered the battlefield with unmatched valor. He fought bravely, killing many Mughals, and finally laid down his life, unable to bear the separation from his wife.


Attributes of Hadi Rani

  • Goddess of Sacrifice: She gave up her life and love for her husband's sense of duty and for the motherland.

  • Inspirational Wife: She motivated her husband to embrace war, exemplifying the highest Rajputani ideals.

  • Symbol of Honor: Even today, her courage is immortalized in songs, stories, and paintings throughout Rajasthan.


Hadi Rani’s Legacy

1. Hadi Rani ki Baori (Stepwell)

Located in Todaraisingh, Tonk District of Rajasthan, this stepwell was built in her memory. It stands as a silent witness to her great sacrifice.

2. Hadi Rani Women Battalion (Rajasthan Police)

A special women’s unit in Rajasthan Police has been named in her honor — the Hadi Rani Mahila Battalion, symbolizing courage and woman power.

3. Immortal in Folk Songs

Folk songs sung by Rajasthani women often reference her legendary act, such as:

"Hadi Rani sir katayo, Rawat nai pathayo re..."


Mention in Literature

Her tale is recorded in "Veer Vinod", a historical chronicle by Kaviraj Shyamaldas.
It also appears in folk tales, paintings, comics, and theatrical performances across Rajasthan.


Representation in Folklore

According to popular legends, when Ratan Singh hesitated to go to war, Hadi Rani inspired him through an act of supreme courage.
In that era, women were not confined to beauty and domesticity but were symbols of dharma, warfare, and moral strength.


A Story of Love and Sacrifice

This is not just a war story — it's also a profound love story.
Where the wife offered her love for the sake of the nation, and the husband embraced death in memory of that love.


Source of Inspiration

Hadi Rani serves as an inspiration especially for today’s youth and women:

  • How to prioritize duty above personal desires.

  • How courage can exist in love.

  • How a woman’s determination can guide a society.


Frequently Asked Questions (FAQs)

Q. Who was Hadi Rani?
She was a brave Rajput queen who cut off her own head to inspire her husband to fight for his land.

Q. Which dynasty did she belong to?
She belonged to the Hada Chauhan Rajput dynasty, daughter of Bundi’s ruler Sangram Singh.

Q. Who was Rawat Ratan Singh?
He was the Thakur of Salumber and a general in Mewar’s army.

Q. Why did Hadi Rani sacrifice herself?
To remove emotional attachment from her husband so he could fight with full dedication in the war.

Q. Are there any memorials to her today?
Yes, Hadi Rani Baori and the Hadi Rani Women Battalion honor her memory.


Symbol of Woman Power

Hadi Rani’s life is proof that Indian history isn’t only filled with brave kings and warriors but also valiant women whose sacrifices continue to inspire generations. She lived and died for duty, dharma, and the nation.